Saturday, April 19, 2025
प्रगतिशील ‘इंतजाम’ और ‘ग्वाले का तबेला’ : एक आत्मचिंतन
*चिन्मय-भारत*
कुछ दिन पहले हमारे एक सहकर्मी ने किसी संदर्भ में ‘तद्भव’ पत्रिका (अंक-49) में प्रकाशित सिद्धार्थ सिंह के काशी-संस्मरण की चर्चा की थी । वे बनारस से पढ़े हैं और अपने को ‘काशी-शिष्य’ कहते हुए अपना सीना 56 तक ले जाने की कोशिश भी करते हैं। मैंने भी बचपन में ढेरों नाटक,कहानी,उपन्यास और संस्मरण आदि पढ़े हैं । पर समय के साथ अदृश्य कारणों से कथा-साहित्य में रुचि घटती गई। इस प्रकार हिन्दी साहित्य से बादरायण संबंध ही बन पाया। लेकिन जब कभी कोई बढ़िया सामग्री कहीं से भी उपलब्ध करा देता है तो आज भी पढ़ने से गुरेज नहीं है । सहकर्मी ने गुरु-पुत्र द्वारा अपने पिता पर लिखा संस्मरण-‘ले दे के अपने पास फकत इक नजर तो है’ को पढ़ने को कहा और ‘तद्भव’ का वह अंक मुझे थमा गए। पत्रिका को मैंने झोले में रखा और घर चला आया। दूसरे दिन चाय पर चर्चा के दौरान एक और पत्रिका–‘इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022’-एक दूसरे मित्र ने पकड़ा दी । संयोग देखिये कि इस अंक में भी सिद्धार्थ सिंह के नायक द्वय-‘नामवर-काशी’ पर अशोक वाजपेयी का एक संस्मरण (इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022, पृ.58) और व्योमकेश शुक्ल और चंद्राली के साथ एक बातचीत ((इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022, पृ.116) प्रकाशित है । हिंदी साहित्य के सगे ‘हीरा-मोती’ एक ही साथ मेरे समक्ष । तीव्र-क्षिप्र गति से दोनों लेखों/संस्मरणों को उलटने-पुलटने लगा। जब मैं इन लेखों/संस्मरणों को उलट/पुलट रहा था तो मेरे सामने हिन्दी साहित्य के एक भारी-भरकम आचार्य ‘लेटे हुए हनुमान आसन’ में थे। यह दृश्य लगभग प्रतिदिन का है। जब कभी कोई अर्थ-संदर्भ मुझे समझ में नहीं आता है तो उनसे पूछ लेता हूँ और वे शंका का मुंहजबानी या कोश के माध्यम से समाधान कर देते हैं। यह सिलसिला पिछले डेढ़ दशक से चलता आ रहा है बिना भाषाई मर्यादा को तोड़े।
तद्भव के संस्मरण-लेख ‘ले दे के अपने पास फकत इक नजर तो है’ के ‘ग्वाले का तबेला’ पैरा पर जाकर मेरी नजर टिक गई और मैंने उसे ज़ोर से पढ़ते हुए सामने सोफ़े पर लेटे हुए हिन्दी साहित्य के आचार्य को सुनाया। उनकी स्मृति आज भी बहुत शानदार है। स्मृति के सहारे तलाश हुई उस आचार्य की जिसके घर को संस्मरण में ‘ग्वाले का तबेला... ’ संज्ञा से नवाजा गया है। थोड़ी मेहनत के बाद हम-दोनों फ्लैश-बैक के सहारे उस प्रोफेसर के घर पहुँच ही गए जहां उन्होंने तीन दशक पहले अपना ‘ग्वाले का तबेला...’ बसाया था- केंद्रीय विद्यालय, बीएचयू से सटे ‘तुलसीदास कालोनी,क्वार्टर नं -20’ । अब तो उस कालोनी का ढांचा ही बदल गया है। ‘ग्वाले का तबेला...’ से सदा की मुक्ति के लिए मैदान में मल्टी स्टोरी बना दी गई है। आजू-बाजू के सड़कों पर कई दशकों से सीना तानकर खड़े सागौन के वृक्षों को बीएचयू के कुलपति सुधीर जैन के आदेश से काट दिया गया है। कुलपति के इस कृत्य पर किसी विद्वान के मुंह से कोई आवाज आई हो,ऐसा सुनने में भी नहीं आया। अश्वथ-वृक्ष तले ज्ञान प्राप्त करने वाले सनातन/हिन्दू धर्म के ‘रेडिकल ब्वाय’ भगवान बुद्ध के नाम पर संचालित विभाग के किसी आचार्य ने कभी कोई आलेख आदि लिखा हो तो नहीं कह सकता।
वर्ष तो मुझे याद नहीं है। शायद 1984-86 के आसपास का समय रहा होगा। तब भाभा हॉस्टल के नजदीक बने वार्डेन फ्लैट में ही डॉ काशीनाथ सिंह रहते थे। मुझे किसी का घर पूछने के लिए उनके घर का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। दरवाजा तो नहीं खुला,पर अंदर से एक बच्चे की आवाज सुनाई दी जो अपनी माँ के यह पूछने पर कि कौन है, का जबाव यह कहकर दे रहा था कि कोई पागल (या बेवकूफ जैसा कोई शब्द रहा होगा) था। आधा दर्जन भाई-बहनों में से ही कोई रहा होगा। उसके बाद फिर उनके ‘किसी घर’ में जाना नहीं हुआ । जरूरत भी नहीं थी। बिरला छात्रावास में हिन्दी के शोधार्थियों से प्राप्त विभागीय सूचना ही पर्याप्त थी। वैसे भी ‘आचार्यों’ के बारे में कोई नई जानकारी होती भी नहीं थी। लगभग सभी एक ही जैसे होते थे। शेड्स का अंतर जरूर होता था/है ।
सिद्धार्थ सिंह पालि/बौद्ध साहित्य के विद्वान हैं। बौद्ध साहित्य में ‘सम्यक दृष्टि’ की बात की गई है। संस्मरण-लेखक की सम्यक दृष्टि की एक बानगी देखने लायक है। वे लिखते हैं -“दूसरे थे बी. एच. यू के हिंदी विभाग के एक प्रोफेसर। सुना था कि विद्वान थे और अच्छे अध्यापक भी । उनका घर देखिए तो प्रोफेसर का घर कम, ग्वाले का तबेला ज्यादा लगता था, गाय, भैंस, सानी भूसा तथा गोबर से परिपूर्ण।” (तद्भव,अंक 49,पृ.203) संस्मरण-लेखक जब इतने ‘बल/ज़ोर’ देकर लिख/कह रहे हैं तो जाहिर है कि वे उनके घर अवश्य ही गए होंगे। पता नहीं संस्मरण-लेखक को याद है या नहीं कि उस दौर में अनेक ऐसे आचार्य थे जो गाय पालते थे।(पालि/बौद्ध विभाग के एक आचार्य हरिशंकर शुक्ल भी गाय रखते थे। जिनका आवास पोस्ट ऑफिस के पास ही था और आजकल संस्मरण लेखक भी उसी के सामने के मल्टी स्टोरी किसी के तल्ले पर रह रहे हैं।) दरअसल उस समय के आचार्य गण गाँव-घर की पहली पीढ़ी से थे जो शहरों में पढ़ने और नौकरी/चाकरी करने आए थे। कृषि-संस्कार में दीक्षित होने के कारण दूध-दही का शौक तो था ही गोपालन उनके लिए पुण्य का भी कार्य था। कुबेरनाथ राय का मानना है कि ‘भारतीयों की गौ-उपासना सूर्योपासना की तरह उनकी प्राग्-भारतीय आनुवंशिकता या उत्तराधिकार का अंग है और यह उन दिनों की स्मृति वहन करती है’ जब आर्य कवि, धनुर्धर और घुमक्कड़ थे। कृषि-क्रान्ति में गाय के अपूर्व योगदान से हम सब परिचित हैं । राजा दिलीप से लेकर गांधी और ‘उस’ हिन्दी के प्रोफेसर तक यह परंपरा चलती रही है। यहाँ मैं एक भारतीय मनीषी के कथन को उद्धृत करना चाहूँगा जिसके बारे में डॉ नामवर की टिप्पणी मानीखेज है- ‘ज्ञानपीठ उसे छाप रहा है, धर्मयुग प्रसारित कर रहा है और सबसे बड़े निबंधकार ... हो गये हैं। (हमारा समय संवाद,आडियो ,इन्दिरा गांधी मानव संग्रहालय, भोपाल) वे लिखते हैं-“नेताओं में गांधीजी, किताबों में रामचरितमानस, वनस्पतियों में हरी-हरी दूब, पशुओं में गाय, रसों में करुण रस, ये सब मुझे एक ही किस्म के भाव-संकुल या बोध प्रदान करते हैं। इन सबमें शांति है, निष्कपटता है, विनय और सेवा धर्म है, साथ-ही-साथ महिमा और त्याग भी है।” (कुनारा,कामधेनु, पृ.6) ध्यान दीजिये कि ‘इन सबमें’ वह सब कुछ (शांति, निष्कपटता, विनय,सेवा धर्म,महिमा और त्याग) है जो एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है। लेकिन सिद्धार्थ सिंह की टिप्पणी/भाषा से तो ‘गोपालन’ हिकारत भरा कार्य जैसा लगता है।
अब तो सिद्धार्थ सिंह स्वयं बीएचयू में अध्यापक हैं और मल्टी स्टोरी के किसी तल्ले पर रहते भी हैं। वहाँ गोपालन की सुविधा अवश्य नहीं होगी, लेकिन जो गोपालन करे उसके घर को ‘गाय, भैंस, सानी भूसा तथा गोबर से परिपूर्ण’ कहना तो कहीं से भी बौद्धिक/सांस्कृतिक ईमानदारी नहीं है। जिस ‘उस प्रोफेसर’ की सिद्धार्थ सिंह अपने पिता-संस्मरण में चर्चा कर रहे हैं, उनके घर के पीछे गाय बंधी रहती थी । हाँ कभी कोई आधुनिक दिलीप गाय देखने को कहता होगा तो अवश्य ही पीछे ले जाते होंगे। पर उसे तबेला कहना तो न केवल जातीय अहंकार है अपितु संस्कृति की अवहेलना का परिचायक है। ऋग्वेद में यहाँ तक कहा गया है कि ‘जहां गायें है वहीं विष्णु का परम-पद है’। हम सब चरणामृत/पंचामृत पीकर ही बड़े हुए हैं और इसे बनाने में प्रयुक्त होने वाले पांच द्रव्यों में से तीन द्रव्य -‘दूध-दही और घृत’-तो गाय से ही प्राप्त होते हैं। । कितनी मजेदार बात है कि घर में घुसकर उसके ‘तबेला’ के रूप को पहचान लिया पर गुण के बारे में ‘सुना था कि विद्वान थे और अच्छे अध्यापक भी ।’ जो चीज जानने लायक थी उसे नहीं जान पाये पर जो नहीं देखना था उसे देख लिए। आचार्य बुद्ध ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कोई अध्येता उनकी ‘सम्यक दृष्टि’ के साथ ऐसा न्याय करेगा। कुबेरनाथ राय ने सच ही लिखा है-“व्यक्ति हो, पुस्तक हो अथवा कोई जनसमूह हो, उसे समझने के लिए प्रथम उसकी परंपरा और तत्कालीन परिपार्श्व को समझना होता है, तब उसके मर्म में उतरकर उसकी सार्थकता या निरर्थकता का उद्घाटन किया जाता है।” संस्मरण-लेखक को पढ़ते किसी का कथन याद आ रहा है-
कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए
ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए।
हम सबने अपने बचपन में गाय पर निबंध अवश्य ही लिखा है । मेरा मानना है कि जिन लोगों ने गाय पर निबंध नहीं लिखा होगा वह शर्तिया ही भैंस,बकरी या ‘मदर-फादर’ डेयरी का दूध पीकर बड़े हुए होंगे । यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि भारतीय परंपरा और संस्कृति से परिचित अथवा आस्थावान व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी कत्तई नहीं कर सकता है। मालवीय जी भी गोपालन पर ज़ोर देते थे। हम सब उनकी गाय के साथ फोटो और कविता-‘दूध पियो कसरत करो... ’ से परिचित हैं । कुबेरनाथ जी लिखते हैं-“दुनिया में बड़े-बड़े मंदिर-मस्जिद उठा देने वाले धनी-मानी पड़े हैं। परंतु स्वयं में मंदिर बन जाने की क्षमता उन्हीं में होती है जो गाय जैसे हैं। गांधीजी एक ऐसे पुरुष थे जिनकी अनेक अंतर्निहित क्षमताओं का प्रतीक गाय हो सकती है। इसी से गांधी जी स्वयं एक मंदिर बन गये,उनके जीवन का प्रत्येक क्षण एक दिव्य अस्तित्व बन गया ।” (कामधेनु,पृ. 6)अपनी परंपरा में तो यह भी मान्यता है कि घर पर आने वाली विपत्ति को सबसे पहले गाय ही अपने ऊपर ओढ़ लेती है। मेरा वैज्ञानिक मन भी इसे अस्वीकार कर पाने में असमर्थ है।
दरअसल यह हम सबका अपना दोष है। हम सब हैं असली वाले शुतुरमुर्ग जो अपनी गर्दन बालू में घुसाकर सोचता है कि उसे कोई देख नहीं रहा है। लेकिन सच तो कुछ और ही होता है। संस्मरण एक अच्छी विधा है। लेकिन तब जब उसमें ईमानदारी हो। गलती से ही मनुष्य सीखता है। पर अपने को आदर्श रूप में दिखाना किसी भी संस्मरण के लिए आत्मघाती होता है। खासतौर से सोशल मीडिया के युग में जब सब कुछ अनावृत्त है । इसलिए लिखते समय सावधान रहना चाहिये। इस बात से तो हम सब वाकिफ ही हैं कि डॉ नामवर प्रतिभाशाली होने के बावजूद वाचिक परंपरा में ही भरोसा करते रहे। बक़ौल अशोक वाजपेयी-‘वे एक वर्ष में पाँच-सात अवसर [को] ऐतिहासिक बता देते थे।’(इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022,पृ 65 ) जब ऐसी स्थिति हो तो डॉ नामवर के इस कथन से कि -‘बोलने से जबान नहीं कटती लेकिन लिखने से हाथ कटता है,’ (तद्भव, अंक 43,पृ 214 ) जैसे बावन तोले पाव रत्ती सही बात को कौन अस्वीकार करेगा ! सूचना-विस्फोट के युग में किसके पास इतना समय है कि वह तथ्यों की जांच करे। ताली बजी और जनता फिर किसी दूसरे कार्यक्रम की ओर बढ़ गई। श्री अशोक वाजपेयी ने एक साहित्यकार के बारे में डॉ नामवर का एक कथन उद्धृत किया है-"गद्य का पतन जिनके कारण हुआ है वे इतने गंभीर आदमी हैं। अज्ञेय चिड़ियाघर के किसी चिम्पांजी के समान गंभीर व मनहूस दिखायी देते हैं। अज्ञेय,निर्मल,रमेशचंद्र शाह जिन्हें सही गद्य तो लिखना आता नहीं पर भारी चिंतन की बात करते हैं।” (इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022,पृ 62) जब साहित्य जगत के एक खास दौर के शीर्षस्थ सिंह का यह विचार हो (हालांकि अवसर पाकर बदल जाने की कला में माहिर शीर्षस्थ सिंह बहुत बाद में बदल भी गए जिसके कारणों से हिंदी जगत भलीभाँति परिचित है ) तो ‘कलमी आम’ में भी यदि वैसा ही कुछ – ‘ग्वाले का तबेला’- दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
संस्मरण-लेखक के सम्यक दृष्टि-वाक्य -“हिंदी विभाग के एक प्रोफेसर । ... साहित्य से ज्यादा दूध, दही, राबड़ी और दंड-बैठक के महत्व पर चर्चा करना उनको प्रिय था,” (तद्भव अंक-49, पृ. 203) पर तो मुझे भी एक शेर याद आ रहा है-‘इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा’। मुकेश-स्वर में एक गाना है जिसका बदला रूप कुछ इस प्रकार का है -‘जो हमको है पसंद वही बात करेंगे’। तो संस्मरण-लेखक को जो पसंद है वैसी ही बात करेंगे,लिखेंगे और तर्क रखेंगे। ममता कालिया की कुछ चटपटी बातें ‘वृत्तांत’ के रूप में ‘तद्भव’ (अंक-40) में छपा है। वह भी ‘जिन’ की शौकीन हैं। ऐसा उनके लेखन से लगता है। (नहीं होंगी तो और अच्छी बात) खैर ! उन्होंने लिखा है किसी समय उनके प्रयाग आवास पर हिन्दी साहित्य के सगे ‘दो भाई’ पहुंचे। ‘दिन ढल जाये हाय शाम न जाये’ वाली स्थिति बन रही थी। काशीनाथ सिंह बड़े भोले मन से मेजबान से पूछते हैं-‘कालिया कुछ इंतजाम रखे हो कि नहीं’। (तद्भव अंक-40, पृ. 189) ‘इंतजाम’ तो था ही। ‘ग्वाले का तबेला’ रूपी पवित्र रसाल पर उगी वंध्या मंजरी ‘इंतजाम’ के बिना भारतीय प्रगतिशील कैसे रह सकते हैं । सगे भाइयों ने मेजबान कालिया दंपति के साथ ‘इंतजाम’ को अनुशासित ढंग से तहस-नहस किया । इंतजाम-ध्वंस के बाद की शाश्वत दशा-दिशा को समझने के लिए टॉलस्टाय की कहानी पढ़नी होगी जिसमें उन्होने बताया है कि ‘इंतजाम’ के फलस्वरूप व्यक्ति के खून में सोई लोमड़ी, भेड़िया और वाराह बारी-बारी कैसे प्रकट होते हैं। गांधीजी कहते थे कि ‘संचय नहीं अपरिग्रह करो; क्योंकि संचय में ही मद है। जो जरूरत से ज्यादा लेता है, वह संचित करता है। संचित तत्त्व सड़कर मद का खमीर उठाता है, लोभ का खमीर या अहंकार का खमीर या वासना का खमीर’। (कुबेरनाथ राय,पत्र मणि पुतुल के नाम,पृ. 89-90) तो गांधी से प्रभावित ‘हिंदी विभाग के उस एक प्रोफेसर’ के घर में कभी शुद्ध चावल या गेहूँ आदि को सड़ाकर तैयार होने वाली वस्तु विशेष जिसे प्रगतिशील ‘इंतजाम’ या ‘रस-रंजन’ कहते हैं, रहता ही नहीं था। (किसी ने बताया एक दो बार काशी-शुक ने उनके व्रत को तोड़ने की कोशिश की थी, पर शुद्ध वैष्णव प्रोफेसर ने अपने घर में बाहर से लाये गए ‘इंतजाम’ की भी इजाजत नहीं दी।) उस प्रोफेसर के घर ‘इंतजाम’ के नाम पर वही ‘दूध, दही, राबड़ी’ मिलती थी जिसके दीवाने सिद्धार्थ के शब्दों में ‘नागार्जुन’ जैसे लोग होते थे। हालांकि हिन्दी विभाग से पढ़े लिखे और बाद में किसी कॉलेज से अवकाश प्राप्त एक-दो अध्यापकों ने पूछने पर बताया कि हिंदी विभाग का ‘वह पढ़ाकू प्रोफेसर’ सिंह-द्वय से वायवीय निकटता को असली निकटता मानते हुए उनकी सेवा में ‘तबेले’ से निकले ‘दूध, दही, राबड़ी’ के साथ अतिथि गृह तक दौड़ जाते थे। मुझे लगता है कि इसमें उनकी सदाशयता के साथ-साथ हिन्दी साहित्य जगत में चतुर्दिक फैले अदृश्य भय का भी कुछ योग अवश्य ही रहता होगा। क्योंकि, बक़ौल श्री अशोक वाजपेयी ‘डॉ नामवर जी ... कई संस्थानों में निर्णायक रूप से काबिज या दाखिल हुए ... और उसका उपयोग उन्होंने साहित्य की राजनीति में अपने वर्चस्व को पुष्ट और सशक्त करने के लिए किया।’(इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022, पृ.64) तो नौकरी,तरक्की,पुरस्कार के लिए लोग यथाशक्ति और श्रद्धा अनुसार ‘इंतजाम’ लिए गणेश परिक्रमा करते ही थे- ‘बहुरि बंदि खल गन सति भाएं। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएं॥’ ‘दशकों का इंतजामी इश्क’ कैसे ‘तबेले के ग्वाले’ को या ‘एकांत सेवी’ लोगों को अलग-थलग कर सकता है, इसका उदाहरण है अशोक वाजपेयी का यह कथन कि डॉ नामवर ‘साहित्य अकादेमी के वार्षिक पुरस्कारों में गहरी दिलचस्पी लेते थे और उनके वहां रहते मुझे [अशोक वाजपेयी को] छोड़कर किसी गैर प्रगतिशील को शायद पुरस्कार नहीं दिया गया।’(इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-2022, पृ.65) अशोक वाजपेयी को भी पुरस्कार इसलिए मिला कि उन्होंने पूर्व में डॉ नामवर को आरआरएलएफ़,कोलकाता का अध्यक्ष बनवाया था। होगी प्रतिभा लोगों के पास । लेकिन उनका गिरिधर गोपाल तो प्रगतिशील ‘इंतजाम’ ही था। इस पर बहुत कुछ कहा-सुना गया है। यहाँ दुहराने की कोई जरूरत नहीं है।
‘ग्वाले का तबेला’ वाले प्रोफेसर भी अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। पुराने छात्रों का कहना है कि पढ़ने/पढ़ाने में उनकी कोई सानी नहीं थी। कुश्ती-कला का प्रेमी वह ‘तबेले वाला प्रोफेसर’ निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ का कायल था। लोग बताते हैं कि यदि कभी-कभार बनारसी गाली उनके जिह्वा पर तबीयत से आ जाती थी तो वे दानवीर भी कम नहीं थे। यदि कभी कोई ‘तीरे-नजर’ या ‘मार कन्याएं’ दिखी भी तो उसे गुडाकेश भाव में ‘माते प्रणाम’ कहकर तीर-वेग से अपने घर की ओर साइकिल मोड़ देते थे। जबकि ‘इंतजामी’ जन तो महा ‘गुहा’ के संगम पर आवेष्टित ‘रोहित मछली’ को फाँसने के लिए कभी ‘वंशी’ फेंकते थे तो कभी अजय-‘व्याल’ के ‘चुन-मुने खरगोशों’ की आशा में देर शाम तक मैदान में दौड़ते-हाँफते रहते थे। उधर ‘ग्वाले का तबेला’ वाला प्रोफेसर जिसने उच्छिष्ट अपावन भोग की धूलि मात्र को भी अपने शरीर में कभी लिपटने नहीं दिया था, जाँघों पर ताल ठोंककर साइकिल पर सवार हो जाता था ; क्योंकि उसे केवल भौतिक रूप में ही नहीं अपितु अपने मानसलोक में भी रँभाती हुई ‘कामधेनु’ का स्वर सुनाई दे जाता था और वह सब कुछ छोड़कर ऋतबद्ध अपने घर पहुंच जाते थे। वहाँ ‘सानी-भूसा’ के लिये कामधेनु अपने गौ-वत्स का इंतजार कर रही होती थी । निजी तौर पर मैंने भी जीवन में कभी गो-पूजा नहीं की है । गाँव पर एक-दो गायें और बैल सदैव दरवाजे की शोभा बढ़ाते रहे हैं। बचपन में तो उनका गोबर भी उठाना पड़ा है। गोबर उठाना मुझे कभी गर्हित कर्म नहीं लगा। कृषक संतान और कृषि-संस्कृति में पला-बढ़ा होने के कारण मैं भी ‘गाय को सर्वदा ही सौम्य और उपकारी जीव मानता हूँ ।’(कामधेनु, पृ.6) संस्कार वश ही सही, मैं भी इसके प्रति की जाने वाली हिंसा चाहे वह वाक हिंसा हो या किसी और प्रकार का, उसका विरोधी हूँ और रहूँगा भी ।
महाभारत के भीष्म-चरित्र से हम सब परिचित हैं । अन्न और मन के आपसी रिश्ते को अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। जब हम ग्वाल-बाल रहते हैं या बड़े होकर ‘ग्वाले का तबेला’ का गो-दुग्ध पान करते हैं तो हमारा मन और शरीर दोनों पुष्ट होता है और हम सब संयुक्त परिवार के आग्रही होते हैं । माता-पिता, बहू-बेटा, नाती-पोता आदि सब एक साथ रहते हैं। घर भले ही छोटा हो,दिल बड़ा होता था । इसलिए सब कुछ सहज ही रहता था। जबसे ‘मदर-फादर डेयरी’ या ‘अमूल’ का चलन बढ़ा, परिवार बंटे और ‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा’ गाने वाला वृद्ध पिता कुछ ही दूरी पर अकेला रहने के लिए बाध्य हो जाता है। जबकि ‘ग्वाले का तबेला’ वाले राम मड़ैया में आज भी एक साथ रह रहे हैं। न केवल साथ रहते हैं अपितु मूसलाधार वर्षा के समय भी अपनी टूटी मड़ैया में उसका पूरा परिवार समवेत स्वर में गा उठता है:
"सावन गरजै, भादों बरसै, पवन चलै पुरवाई।
कौन बिरिछ तर भींगत होइ हैं, राम-लखन दोऊ भाई?"
आधुनिकता को ‘फैशन या मौज-शौक’ मानने वाले तथा गो पालन को “प्रोफेसर का घर कम, ग्वाले का तबेला ज्यादा लगता था, गाय, भैंस, सानी भूसा तथा गोबर से परिपूर्ण” मानने वाले आचार्य हिन्दुस्तानी मन को भला कैसे समझ पाएंगे!
तैत्तरीय उपनिषद् में आया है-“हम अन्न खा रहे हैं और अन्न हमें खा रहा है।” गांधीजी इससे बखूबी परिचित थे। उनकी भोजन दृष्टि भी उनके शील दर्शन का एक अंग थी। गांधीजी स्वाद के लिए नहीं, जीवन-शक्ति की आराधना के लिए खाने के पक्षपाती थे। स्वाद पर उनका अद्भुत नियंत्रण था। इसका जिक्र योगी परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक ‘योगी कथामृत : एक योगी की आत्मकथा’ में विस्तार से बताया है। ऐसा कहा जाता है कि ‘रोमन सभ्यता के अन्तिम दिनों में भोजन, पान और स्नान एक सर्वग्रासी विलास के रूप में परिणत हो गये।’ ‘ग्वाले का तबेला’ से जब-जब हम विरत हो तथाकथित प्रगतिशील ‘इंतजाम’ की ओर बढ़ेंगे गार्हस्थ्य जीवन की सुघड़ता खत्म होती जाएगी। महाभारत को टुकड़ों में ही सही, हम सबने पढ़ा है। उसके पीछे के अनेक कारणों से भी हम परिचित हैं। पर एक महत्वपूर्ण ‘कारण’ ‘ग्वाले का तबेला’ भी है, प्राय: इससे हम सब अपरिचित हैं। जबकि यह एक भारी और प्रामाणिक तथ्य है। हम सब जानते हैं कि जब अश्वत्थामा दूध के लिए रोता था तो उसकी माँ उसे क्या पिलाती थी? और उसका फल क्या हुआ ? काश राजा द्रुपद ने अपने क्लास फ़ेलो द्रोणाचार्य के लिये ‘ग्वाले का तबेला’ की व्यवस्था कर दिये होते तो जो ‘भारत व्यापी रुधिर और रुदन की सरिता बही थी’ वह न बहती। पर होनी को कौन टाल सकता है। धरती के श्रेष्ठ महाकाव्य ‘महाभारत’ की रचना जो होनी थी और इसके मूल में वही था ‘ग्वाले का तबेला’ का ‘ग्वाला’ ।
पुनश्च: एक सवाल यह उठ सकता है कि आखिर मुझे यह सब लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? एक गुमनाम मनीषी के शब्दों में कहूँ तो उनके/इनके या ऐसे/वैसों के ‘विकट बांसुरी की अनुगूंज को मैं महत्त्वपूर्ण इसलिए मानता हूं कि वे संयोगवश 'माइक' के पास हैं।’ आजकल बाजार में अनेक ऐसी पत्रिकायें ‘इंतजाम’ के प्लेटफॉर्म के रूप में उपलब्ध हैं जहां विकट बांसुरी वाले क्रमचय-संचय सिद्धान्त का पालन करते हुए मनमानी चीजों को बेसुरा-स्वर देते रहते हैं । यदि किसी को विश्वास न हो तो बाजार में उपलब्ध पत्रिकाओं के पुराने अंकों को उठाकर देख सकता है। ध्यान रहे कि यहाँ किसी के निजी जीवन पर प्रकाश डालना मेरा उद्देश्य नहीं है। (ये पब्लिक है सब जानती है।) तो मैं क्यों उसके जीवन के स्याह पक्ष को अनावृत्त करने का पंड श्रम करूँ। लेकिन किसी गलत टिप्पणी को बरदाश्त करना मेरे स्वभाव का अंग नहीं है। जब जो चीज सही लगी उसे वहीं उसी प्लेटफॉर्म पर सुना देने में विश्वास रखता/करता हूँ। तद्भव के इस संस्मरण-लेख के एक पैरा में एक ऐसे अध्यापक पर अनावश्यक टिप्पणी की गई है जिसने ‘पठन-पाठन’ और ‘नोट-लंगोट’ के मामले में लगभग आदर्श मानदंड स्थापित किया था। मैंने अपने लेख में यह कोशिश की है कि तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो। इसके लिए कुछ पुराने लोगों से दूरभाष पर संपर्क कर जानकारी भी ली। आप भी पढ़िये और आनंद लीजिये।
विश्वनाथ त्रिपाठी का सोवियत-प्यार और कुबेरनाथ राय का भारत-प्रेम
मनोज कुमार राय
सयाजीराव गायकवाड़ ग्रंथालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी के जर्नल स्टैक के एकांत में पड़ी मेरी रुचि की अनेक पुरानी पत्रिकाएं प्राय: मेरी राह देखा करती हैं। मैं भी उन्हें निराश नहीं करता। जब-जब काशी-यात्रा होती है, मेरे कदम अपने-आप उधर बढ़ जाते हैं। पिछले दिनों ग्रीष्मावकाश (मई-जून 2023) में काशी आया तो ग्रंथालय जाना हुआ। भयानक गर्मी और पंखा विहीन गलियारे में खड़े-खड़े बेतरतीब पड़ी कुछ पत्रिकाओं के अंकों को उलट-पुलट रहा था। अचानक ‘आलोचना’ पत्रिका के अक्तूबर-दिसंबर 1974 के अंक में कुबेरनाथ राय के निबंध-संग्रह ‘विषाद-योग’ पर आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा शीर्षक-पैरोडी के साथ लिखी गई समीक्षा ‘विषाद-रोग’ पर मेरी नजर पड़ी। इस आलेख के बारे में कभी किसी ने चर्चा भी की थी। प्रत्यक्ष लेख और कुबेर-साहित्य में रुचि होने के कारण इसे पढ़ गया। पढ़ क्या गया, फोटो भी ले लिया।
उम्र में कुबेरनाथ राय से लगभग दो वर्ष बड़े श्री विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित और खेमेबाज अध्यापक के रूप में समादृत तो रहे ही हैं उन्नीस सौ सत्तर के दशक में साहित्य जगत के मजबूत और एकाधिकारवादी वामपंथी-मार्क्सवादी खेमे के सक्रिय सदस्य भी रहे हैं। ‘आलोचना’ पत्रिका अपनी ना-धर्मी वामपंथी रुझान के लिए जानी जाती रही है। स्वाभाविक है कि श्री त्रिपाठी को इस पत्रिका में जल्दी ही लिखने की जगह मिल गई (इसे उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में स्वीकार भी किया है) और वे इस पत्रिका के स्थापित लेखक/समीक्षक बन गए।
कुबेरनाथ राय एक कृति की समीक्षा करते हुए लिखते हैं-“पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ... के अनुसार आलोचना का मतलब होता है कृति के अंतर्निहित सौंदर्य का उद्घाटन और पाठक का उसके रस बोध के लिए प्रशिक्षण। वे स्वयं किसी कृति में मौज लेते थे और वे उस मौज को औरों में बाँटते थे। इसी से उनकी आलोचना में कहीं भी साँढ़-भैंसे नहीं हँकड़ते हैं।” मेरी भी निजी मान्यता है कि समीक्षक का मूल धर्म है रचना और रचनाकार की समीक्ष्य कृति से ईमानदारी से पेश आना । खास तौर से यह तब और जरूरी हो जाता है जब वह अध्यापन कर्म से जुड़ा हो। इसके साथ ही उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि आलोचना करते समय न केवल आलोच्य कृति अपितु लेखक की अन्य कृतियों और उस विषय पर लिखे गए दूसरे समकालीन लेखकों की रचनाओं से भी वह अवश्य परिचित हो । कुबेरनाथ राय भी ‘रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए भाव के स्पष्ट बोध अर्थात् भाव को उसके सारे कोणों, कटावों, नोकों के साथ खूब स्पष्टतः अनुभूत कर लेने को प्राथमिक आवश्यकता’ के रूप में देखते हैं। यहाँ मेरी भी कोशिश है कि कृति,कृतिकार और ‘विषाद-योग’ की समीक्षा को सिलसिलेवार उसकी समग्रता में देखूँ।
किसी कृति पर लिखी गई समीक्षा पर टिप्पणी लिखना अपने आप में एक पंड-श्रम है। लेकिन कई बार यह जरूरी भी हो जाता है। यह कार्य प्राय: लेखक या उसके पाठक द्वारा किया जाता है। बतौर पाठक मेरे लिए यह कर्तव्य-श्रम इसलिए भी जरूरी है कि 21वीं सदी की पीढ़ी यह जान ले कि आजादी के कुछ ही वर्षों बाद कैसे गिरोह बनाकर किसी लेखक को हाशिये पर डालने की कोशिश शुरू हो गई थी। मार्क्सवादी-मकबरे पर उगा हिन्दी साहित्य जगत का एक खास कुनबा अपनी इस शकुनि-सोच के लिए विख्यात रहा है। विश्वनाथ त्रिपाठी भी उसी कुनबे से संबंध रखते हैं। उनके द्वारा ‘विषाद-योग’ पुस्तक पर लिखी गई समीक्षा पर आगे बढ़ने से पहले श्री राय और श्री त्रिपाठी की व्यक्तित्व-निर्मिति को भी संक्षेप में जान लेना जरूरी है।
श्री राय और श्री त्रिपाठी दोनों का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संबंध रहा है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने जहां स्नातक के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के श्री हजारी से ‘प्रसाद और आशीर्वाद’(पीएच.डी.) ग्रहण किया वहीं कुबेरनाथ राय ने स्नातक (बनारस) के बाद स्नातकोत्तर (अंग्रेजी में) के लिए कोलकाता का रुख किया और वहाँ ‘श्री हीन’ होना उचित न समझकर ‘पीएच.डी.’ की केंचुल (उपाधि-दौड़) से अपने को मुक्त तो किया ही, प्रो. हुमायूँ से ‘कबीर-पंगा’ भी लिया। श्री त्रिपाठी 1959 में दिल्ली-दरबार (कॉलेज) से जुड़े और वहाँ की साहित्यिक-राजनीति में बखूबी जम गए । उधर श्री राय उसी वर्ष सुदूर पूर्वोत्तर के एक पिछड़े इलाके नलबारी पहुंचे और 27 वर्षों तक रस आखेट करते रहे तथा जीवन के अंतिम दशक में वे अपने गृह जिला लौटे । इधर 1996 में श्री त्रिपाठी अपने सेवा काल से मुक्त हुए उधर श्री राय ने अपने गृह निवास में अपने को जीवनमुक्त कर लिया।
विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखित आलोचना-समीक्षा ‘विषाद-रोग’ आलोचना पत्रिका के कुल तीन पृष्ठ और कुछ पंक्तियों में फैली है जिसके प्रथम पैरे और अंतिम पंक्ति में आए ‘ईमानदारी’ शब्द पर ज़ोर देते हुए उनके द्वारा उसे अपना ‘कवच’ बनाया गया है। ऊपर संकेत किया जा चुका है कि समीक्षा में ईमानदारी सहज ही अंतर्भुक्त होती है। इसे समीक्षक ने भी अप्रत्यक्ष रूप से कागज पर ही सही स्वीकार किया है। अस्तु।
श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी के गुरु रहे हैं। गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा स्वाभाविक है। लेकिन वे यह कैसे तय कर सकते हैं कि जैसे वे द्विवेदी जी की माला प्रतिक्षण जपते रहते हैं, उसी तरह दूसरे भी माला जपें। उन्होंने अपने समीक्षा लेख के शुरू में ही श्री राय पर दोहरा आरोप जड़ दिया है कि उन्होंने ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से सारी मुद्रा, शैली और उक्ति-भंगिमाएँ ले ली हैं।’ लेकिन जब वे ‘द्विवेदी जी का [ही] कहीं भी आभार-उल्लेख नहीं करते तो धर्मवीर भारती का ऋण [क्या] स्वीकार करेंगे ।’ त्रिपाठी जी के कथन से ऐसा लग रहा है गोया द्विवेदी जी ने अपने घर के किसी ताखे पर इन्हें (मुद्रा, शैली और उक्ति-भंगिमा) सजा कर रखा हो और एक दिन जब द्विवेदी जी सो रहे थे तब कुबेरनाथ राय ने चुपके से प्रवेश किया और उसे उठाकर अपने घर ले आए। बाद में त्रिपाठी जी को लाख खोजने के बाद भी वे चीजें नहीं मिली जिससे उस ‘मुद्रा, शैली और उक्ति-भंगिमा’ में वे (त्रिपाठीजी) अपना योगदान नहीं दे सके। द्विवेदी जी के साहित्यिक अवदान को स्वीकारना और माला जपना दोनों में बहुत फर्क है। श्री त्रिपाठी के लिए माला जपना महत्वपूर्ण है जबकि श्री राय के लिए उनका ‘राष्ट्रीय और साहित्यिक दायित्व’ महत्वपूर्ण था, व्यक्ति-विशेष नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि वे जब कहीं-किसी से संदर्भ लेते हैं तो उसका श्रेय उसे नहीं देते। तो फिर द्विवेदी जी या किसी और के प्रति कैसे अनुदार हो सकते हैं। श्री राय के शब्दों में उनके पहले ‘ललित-निबंध’ का धर्मवीर भारती ने न केवल ‘स्वागत’ किया अपितु अन्य ललित निबंधों को लिखवा लेने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही ।’ विषाद-योग से दो वर्ष पूर्व प्रकाशित निबंध-संग्रह ‘गंधमादन’ के एक निबंध ‘आधुनिकता: अकर्म से कर्म की ओर’ में ‘अंधायुग’ को कामायनी, उर्वशी और कुरुक्षेत्र के समकक्ष रखते हुए श्री राय ने लिखा है, “अंधा युग का महत्व इसी में है कि इसमें अतीत के माध्यम से आधुनिकता का सही बोध प्रस्तुत किया गया है ।” यदि श्री त्रिपाठी उनकी अन्य रचनाओं से परिचित होते तो वे ‘श्री राय का चिंतन ‘अंधायुगीन है’, जैसा निरर्थक वाक्य न लिखते ।
श्री राय शायद इकलौते निबंधकार होंगे जिनके लिए धर्मवीर भारती ने ‘प्रतिभाशाली निबंधकार’ के विशेषण का प्रयोग किया है । 1972 की ‘वीणा’ पत्रिका में ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी निबंध’ नामक लेख में लक्ष्मी नारायण जोशी उस समय के प्रसिद्ध सभी निबंधकारों का परिचय और योगदान का जिक्र करते हुए लिखते हैं -‘ललित निबंध के क्षेत्र में कुबेरनाथ राय का प्रादुर्भाव वरदानी सिद्ध हुआ है’। अर्थात श्री राय इस निबंध-विधा के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं। श्री नारायण चतुर्वेदी ने उन्हें ‘मौलिक चिंतक और सावधान लेखक’ के रूप में याद किया है। हालांकि यह भी सत्य है कि उस कालखंड के अनेक लेखक श्री राय के लेखन से परिचित होते हुए भी उनकी चर्चा न के बराबर करते हैं। ‘कल्पना’ पत्रिका के 25 वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में डॉ विवेकी राय ने शृंखला-आलेख के माध्यम से पत्रिका और उसके साहित्यिक योगदान की चर्चा की है। यहाँ भी वे कुबेरनाथ राय के लिए केवल एक पंक्ति कहकर आगे बढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं ‘कल्पना’ के इस शृंखला प्रकाशन के एक दशक बाद प्रकाशित अपनी पुस्तक में रामस्वरूप चतुर्वेदी श्री राय के योगदान को केवल ‘… मिश्र की भांति उन लेखकों में हैं जिन्होंने निबंध की विधा को पूरे मनोयोग और एकांत निष्ठा के साथ स्वीकार किया है,’ के रूप में चर्चा कर इतिश्री कर लेते हैं। साथ ही उन्होंने ‘विधा के स्वरूप और आंतरिक तत्व की प्रतिमानीकृत’ हो जाने की घोषणा करते हुए श्री राय के लिए सीमा-रेखा भी तैयार कर दिया है और अपनी सीमा/अध्ययन को भी ‘विषाद-योग’ पर ही रोक दिया है। डॉ नगेन्द्र द्वारा संपादित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में डॉ बच्चन सिंह द्वारा गद्य-खंड को लिखा गया है। वे लिखते हैं-“ … मिश्र की तरह कुबेरनाथ राय हजारी प्रसाद द्विवेदी-संस्थान के निबंधकार हैं ... और [वे] उनसे मुक्त होकर नयी भंगिमा अपनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं।’ और तो और उन्होंने श्री राय और शरद जोशी की तुलना भी की है और लिखते हैं- “कुबेरनाथ राय दृष्टि अभिसार में तीखा व्यंग्य करते हैं पर वह उतना पैना और अर्थगर्भित नहीं है, जितना शरद जोशी का व्यंग्य।’ कुल मिलाकर यह तो स्पष्ट ही है कि श्री राय जैसे स्फटिक-धर्मा निबंधकार को उनके समकालीनों ने ‘भांति’, ‘तरह’, ‘संस्थान के’ आदि से आगे देखने की कोशिश ही नहीं की है। विश्वनाथ त्रिपाठी हों या कोई और सभी साहित्य के भारी आचार्य हैं, और उनकी प्रतिभा पर किसी को संदेह नहीं है। फिर श्री राय के साथ ऐसा ‘दुर्व्यवहार’ क्यों? ‘साहित्य के मूल्य की सच्ची कसौटी’ तो तब होती जब 1948 में प्रकाशित ‘अशोक के फूल’ के साथ ही श्री राय के कक्षा आठ में पढ़ते समय लिखे और 1949/51 की माधुरी/विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित आलेख ‘साहित्य में भोगवाद/विज्ञान में भोगवाद’ को किसी ने देखने की कोशिश की होती। पर ऐसा हो न सका और विश्वनाथ त्रिपाठी भी ‘भांति’, ‘तरह’, ‘…संस्थान के’ चकोह में ही फंसे रह गए।
कुबेरनाथ राय ने लेखकीय प्रेरणा के रूप में श्री नारायण चतुर्वेदी के स्नेह को स्वीकार करते हुए लिखा है, “सन 1962 में प्रो हुमायूँ कबीर की इतिहास संबंधी ऊलजलूल मान्यताओं पर मेरे एक तर्कपूर्ण और क्रोधपूर्ण निबंध को पढ़कर पं. श्रीनारायन चतुर्वेदी ने मुझे घसीट कर मैदान में खड़ा कर दिया और हाथ में धनुष-बाण पकड़ा दिया ।” सन 1962 में प्रकाशित एक लेख ‘आधुनिक सांस्कृतिक पक्षाघात’ में उन्होंने स्वीकार किया है कि वे स्वयं “साहित्य संबंधी विचारों में 'टैगोरिस्ट' है और श्री प्रियरंजन सेन, डॉ. सुबोध सेन गुप्ता एवं प्रोफेसर तारक सेन जैसे ‘टैगोरिस्टों’ के चरणों में बैठकर उसने विद्या-लाभ किया है।” अब भला इससे अधिक आदर कोई किसी को और कैसे दे सकता है ? लेकिन हिन्दी-साहित्य जगत के क्षितिज पर कब्जा जमाये हुए ‘चर्च’ के आतंक के प्रभाव का क्या कहना! वह दौर भी अद्भुत था। एक दूसरे की पीठ खुजलाने के लिए मशहूर इस चर्च दीक्षित और उनके प्रभाव में आने वाले सदस्यों ने श्री राय का नाम शायद ही कभी स्वीकार किया हो। श्री राय ने जिन-जिन लेखकों का नाम विषय-वस्तु के अनुरूप (1962 से लेकर 1996 तक) आदर सहित लिया है या उनके योगदान को आदर-पूर्वक याद किया है,उनमें से दो-तीन को छोड़कर शायद ही किसी ने उनका नाम अपने लेखन में या कहीं और अनुशंसित किया हो। जब कभी किसी ने नाम लेने की जहमत उठाई तो वह विश्वनाथ त्रिपाठी की तरह या तो ‘द्वेष-ग्रस्त’ रहा या फिर याद भी किया तो कुछ इस तरह कि ‘मसलन कुबेरनाथ राय नाम के एक ललित निबंधकार हैं वो . ... मिश्र जैसे ललित निबंधकारों से, जो जीवंत हैं, लोक जीवन के साथ भी जोड़ते हैं, लेकिन लेकर के पता नहीं कौन किस ‘प्रिया नीलकंठी’ में जी रहे हैं और ज्ञानपीठ उसे छाप रहा है, धर्मयुग प्रसारित कर रहा है और सबसे बड़े निबंधकार कुबेरनाथ राय हो गये हैं।’ लुके-छिपे चल रहीं ऐसी बातों से कुबेरनाथ राय बखूबी परिचित हैं-“मैंने इधर देखा है कि मेरे ऊपर जो कुछ थोड़ा बहुत कोई लिखता या कहता है, वह मेरी प्रथम कृति 'प्रिया नीलकंठी' को पढ़कर। किसी भी लेखक के मूल्यांकन और विश्लेषण में उसकी प्रथम कृति को ही दृष्टि में रखा जाये, यह उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, इससे अधिक क्या कहूं ! कभी-कभी और विचित्र बातें सुनता है। मैंने प्रिया नीलकंठी में 'चंडी थान' नाम से ललित निबंध लिखा-काव्य और दर्शन के दृष्टि क्रम से। उसी विषय पर 'निषाद बांसुरी' में लिखा है-नृतत्व और इतिहास के दृष्टि क्रम से। 'दृष्टि क्रम' अर्थात् 'पर्सपेक्टिव' के भेद से शैली और बोध में एक भेद आ जाता है और एक ही विषय भिन्न स्वाद, भिन्न बोध देता है। ऐसा मैंने जान-बूझकर किया है। परंतु मात्र शीर्षक पढ़कर एक सुधी ने फतवा दे डाला कि वे तो ‘चुक’ गये। नया कहने को कुछ नहीं, पुरानी चीजें दुहरा रहे हैं’। विषाद-योग की समीक्षा लिखते समय श्री त्रिपाठी भी इस कदर अवसाद-ग्रस्त हैं कि विषाद-योग संग्रह के कुछ निबंधों के नाम को गिनाते समय ‘प्रिया-नीलकंठी’ संग्रह का नाम भी उसी श्रेणी में रख देते हैं।
श्री राय अपने एक निबंध-संग्रह की भूमिका में देशी-विदेशी अनेक विद्वानों का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- ‘लेखक इन सारे पंडितों के प्रति श्रद्धा पूर्वक ऋण स्वीकार करता है।’ संदर्भगत ईमानदारी श्री राय का सहज स्वभाव है । अपने एक निबंध में उन्होंने ‘यजमानी प्रथा’ पर कुछ टिप्पणी की है। वहीं पर उन्होंने इस विषय की समझ के लिए बचपन के सहपाठी और इतिहास के आचार्य जयमल राय को याद किया है। रस-आखेटक संग्रह में वे भारती जी को कुछ इस तरह याद करते हैं “याद आता है डॉ. धर्मवीर भारती का निबन्ध : चिकनी सतहें और बहते आन्दोलन !" निबन्ध क्या है खतरे की घण्टी है।” यह संग्रह विषाद-योग से तीन वर्ष पूर्व 1971 में प्रकाशित हुआ था । लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी को तो साहित्य की राजनीति में अपनी पैठ बनाने की चिंता थी। यह पचने वाली बात नहीं है कि साठ और सत्तर के दशक की सभी श्रेष्ठ पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे श्री राय के निबंधों से विश्वनाथ त्रिपाठी अथवा ‘आलोचना’ पत्रिका (जिसके बारे में यह अनुश्रुति है कि सत्तर का दशक उसका स्वर्ण काल है) का संपादक मण्डल परिचित न रहा हो । यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कुबेरनाथ राय के निबंध/लेख प्रत्येक पत्रिका के अनुक्रम में प्राय: ऊपर ही रहते थे । लेकिन जैसा कि कुबेरनाथ राय ने हजारीप्रसाद द्विवेदी को याद करते हुए लिखा है, “उनके किसी भी शिष्य ने उनके इस गुण-स्वभाव का उत्तराधिकार प्राप्त नहीं किया। जो आदमी वस्तुतः वेदव्यास था, उसे ये लोग महज द्रोणाचार्य मानकर ग्रहण किये।” आश्चर्यजनक तथ्य यह कि आदरणीय समीक्षक भी गुरु-प्रसाद में से केवल द्रोण-रस का ही आहरण कर पाये।
आजादी के एक दशक बाद ही जब अपने-पराये बोध के साथ साहित्य जगत के आकाश पर ‘गीधहिं दृष्टि अपार’ लिए एक खास खेमा शैली और बाहुबल के ज़ोर पर अपनी धाक जमाने की कोशिश में लगा हुआ था तब श्री राय इससे बेपरवाह माँ भारती की सेवा में मगन थे। सुदूर पूर्वोत्तर के किरातारण्य से अपने प्रथम निबंध-संग्रह (1969) के प्रकाशन के साथ ही हुंकार भी भरा, “अब तुलसीदास की कुछ मधुर चौपाइयों ‘बहुरि बंदि खलगन सतिभाये...’ आदि का स्मरण कर के एक किनारे मैं भी जम रहा हूँ।” दरअसल यह आत्मविश्वास उन्हें ‘तुलसीदास की भूमि पर जन्म होने और उनके द्वारा दिये गए उत्तराधिकार का भागीदार होने के नाते’ प्राप्त हुआ है। कुबेरनाथ राय के लिए ‘निबंध लिखते रहना अपने आत्म-धर्म का पालन करना जैसा है’, न कि दूसरों की तरह पाठ्यक्रमों में प्रवेश या पुरस्कार का जुगाड़ । श्री राय संभवत: इकलौते भारतीय साहित्यकार हैं जिनको ‘निबंधों को लिखते समय सदैव अनुभव होता रहा: ‘अहं भारतोऽस्मि’ और जिंहोने केवल और केवल निबंध-विधा को ही अपना कंठहार बनाया। लेकिन समीक्षक को यह सब नहीं दिखा । आखिर दिखता भी कैसे? ‘आंखें जब विकार पीड़ित होती हैं, तो ज्ञान विकृत होता है और यह विकृति ज्ञानांधता तक भी जा सकती है।’ बुद्ध ने अपने शिष्यों को यूं ही नहीं कहा था कि ज्ञानाञ्जन के साथ-साथ नेत्रांजन का सन्दूक पात्र भी अपने साथ ले चलें। लेकिन लगता है कि त्रिपाठी जी चूक गए और गुरु से नेत्रांजन नहीं ले पाये । फलस्वरूप श्री राय के प्रति उनके मन में अमर्ष का कैक्टस अपना सिर उठा लेता है -‘‘जब पूंजी कम हो, अपनी शैली अर्जित न की गयी हो और हौसला हजारीप्रसाद द्विवेदी बनने का हो तब यही होता है।’ इसी के साथ वे मुफ्त की सलाह भी देते हैं,‘उन्हें सिद्ध साहित्यकारों की मुद्रा अपनाने की जल्दी नहीं होनी चाहिए।’ इसको जरा तफसील से समझना होगा।
‘विशाल भारत’ और ‘माधुरी’ के निबंधों को पढ़ते हुए बचपन से ही श्री राय के मन में ‘लेखक बनने का शौक’ (दिनांक 10/12/1984 को पंजाब विवि की शोधार्थी स्नेहलता पांडे जो श्री राय के निबंध-साहित्य पर शोध कर रहीं थीं, को लिखे गए पत्र से) पैदा हो गया था । फलस्वरूप मिडिल स्कूल से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया –“8वीं दर्जे में पढ़ता तभी ‘माधुरी’ (तब रूप नारायण पांडे संपादक थे) लेख निकला था ‘साहित्य में मेरा वादा’ । (वही) स्कूल के ही दिनों (1949-53) में लिखे गए कुछ निबंध - ‘साहित्य में भोगवाद’, ‘विज्ञान में भोगवाद’ तथा ‘तर्क और वस्तु की परिधि में अलीकता’ इस बात की ताईद करते हैं कि ठोस पूंजी के साथ वे साहित्य में उतरने की तैयारी कर रहे थे ।‘साहित्य में भोगवाद’ लेख में कबीर,उमर ख़ैयाम, टैगोर,गेटे,पंत,बच्चन को साधिकार उद्धृत करना पूंजी में निरंतर समृद्धि का संकेत है। यह आलेख भी शायद तभी प्रकाशित हुआ था जब श्री राय सुदूर गाँव के मिडिल स्कूल के छात्र थे। मुझे लगता है कि श्री त्रिपाठी को यह आलेख अवश्य देखना चाहिए था। (मेरा तो निवेदन है कि यदि वे पूर्व में इस आलेख को न देख पाये हों तो उन्हें इस आलेख को अवश्य देखना चाहिए) रस-आखेटक संग्रह के शेक्सपीयर-होमर-वर्जिल पर लिखे तीन मोनोग्राफ और गंधमादन-संग्रह में आधुनिकता पर लिखे गए दो निबंध श्री राय की साहित्यिक कुबेर-पूंजी का प्रमाण देने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन श्री राय को तो हाशिये पर धकेलना था। और उसके लिए ‘आलोचना’ का प्लेटफॉर्म पहले से ही तैयार था, इसलिए विषाद-योग के प्रकाशित होते ही एक दशक पुराना आग्रह-राग समीक्षा के रूप में सामने आ गया। श्री राय ने इस तरह के ‘मोर्चे के सिपाहियों’ के ‘दुर्योधन-जंघे’ पर प्रहार करते हुए कभी लिखा था, “ मैं कुंठाहीन भाव से स्वीकार करता हूँ कि मैं हिन्दू हूँ। मेरी धारणा है कि जो अपनी पैदाइश को, अपने बाप को, वही इनकार करता है जिसके मन में चोर छिपा होता है जो भीतर ही भीतर हीनता ग्रंथि से पीड़ित होता है। हिन्दी साहित्य और भारतीय साहित्य में ऐसे लोग काफी हैं और मैं उनकी नाराजगी की परवाह नहीं करता।” सच तो यह है कि श्री राय की सर्वसाधारणता की लीक से अलग चलने की जिद तथा साहित्य में चर्च,पार्टी और वाद की न्यूनतम स्वीकारोक्ति इन ‘मोर्चे के सिपाहियों’ को स्वीकार नहीं थी ।
विस्तार, गहराई, उदात्तता और लालित्य से युक्त साहित्य श्री राय को सिद्ध साहित्यकार की श्रेणी में खड़ा करते हैं। शिविरबद्ध लेखकों को इसी से दिक्कत थी । 1974 तक प्रकाशित राय के चार निबंध-संग्रह और पत्रिकाओं में छपे लेख इस बात की ताईद करते हैं कि पश्चिम और पूर्व के साहित्य के मूल ग्रन्थों के साथ-साथ बीसवीं सदी का शायद ही कोई प्रमुख ‘पंडित’ होगा जिससे वे अपने पाठकों के मानसिक ऋद्धि के लिए उनके रस,बोध और मर्म से परिचय न कराये हों। गाँधी के अलावा बुद्ध, महावीर, मक्खलि गोशाल, कपिल, महिदास, शंकर, रामानुज आदि भारतीय चिंतकों तथा वैदिक, बौद्ध, जैन, शाक्त, शैव, वैष्णव, लोकायत आदि भारतीय चिंतन-परंपराओं के साथ-साथ गेटे,इलियट, वाल्देयर, सार्त्र, कामू, कीर्केगार्द, आटेन, वर्डस्वर्थ, कार्लाइल, रस्किन, तोलस्टोय और न जाने कितने रचनाकारों के विचार-मर्म के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संदर्भ से उनका लेखन भर पड़ा है। चिंतन ही नहीं, भारतीय और पाश्चात्य कला दृष्टि, परंपरा और प्रतीक भी उनके लेखन के अनिवार्य अंग हैं। लौह कवच बद्ध शिविर में बैठकर समीक्षा लिखने वालों को शायद ही यह पता हो कि ‘विशाल- भारत’ के लिए भेजे गये लेख की समृद्ध ‘पूंजी’ को देखकर ही श्री बनारसी दास चतुर्वेदीजी ने उनको लेखक बनने का मुक्त कंठ से आशीर्वाद दिया था। हालांकि 1952 से 1962 लगभग एक दशक तक ‘लेखकीय अरुचि’ के कारण श्री राय की कलम लगभग बंद रही’।(स्नेहलता को लिखे गए पत्र से) पुन: कलम तभी उठी जब एक दशक के अज्ञातवास में पूंजी का कुबेर और समृद्ध हो गया।
आजादी के बाद ही साहित्य और इतिहास में ‘सात समुद्र पार उन्नीसवीं शती में लिखी गई एक किताब के आधार पर’ साहित्य में ‘जन क्रांति’ का दिल्ली दरबार सजने लगा था। जिस तरह ‘गाँव के आसमान को गाँव के कबूतरबाजों द्वारा आपस में बाँट लिया जाता है और बिना खसरा-खतौनी के ही यह बन्दोबस्त प्रामाणिक मान लिया’ जाता है, वैसे ही जन क्रांति के अग्रदूतों ने साहित्य के आकाश को भी बाँट लिया और जिसे चाहा उसे जन-विरोधी,संस्कृति विरोधी, परंपरा की रुग्ण पकड़, परिवर्तन विरोधी आदि-आदि घोषित कर हाशिये पर ढकेलने की कोशिश की । यह सब एक खास रणनीति के तहत की जा रही थी। वरना क्या कारण था कि विश्वनाथ त्रिपाठी के इस कथन को कि ‘कुबेरनाथ राय के निबंध पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी से बहुत पीछे की चेतना’ है, को छह वर्ष बाद उनके गुरु टाइप गुरु-भाई ने दुहराते हुए कहा कि ‘कुबेरनाथ राय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से ज्यादा अतीत के कैदी’ हैं। दरअसल श्री राय संभवत: उस कालखंड के इकलौते भारतीय साहित्यकार हैं जो ‘सर्वहारा विश्व-बन्धुत्व’ और ‘इस्लामी विश्व-बन्धुत्व’ के कागजी मुखौटे को एक-एक कर जनता के सामने लाने के साथ ही उनके मर्म पर प्रहार करते जा रहे थे। वे लिखते हैं, “भारतीय कम्यूनिस्टों की भावना है कि कम्यूनिज़्म का प्रथम शत्रु है हिन्दू-वाद, अतएव भावी लड़ाई में मुसलमान बड़े काम की चीज साबित होगा।” ऐसी खुली चुनौती भला कैसे बर्दाश्त होती?
विश्वनाथ त्रिपाठी की अनेक दिक्कतें हैं। अपनी समीक्षा लेख में किसी भी बिन्दु को तार्किक परिणति तक ले जाने की जगह अक्सर वे शाखा-मृग की तरह तेजी से उछल-कूद करते हुए नजर आते हैं। उनकी नजरों में द्विवेदी जी के निबंधों में कला-विनोद के साथ-साथ ‘निरन्न’ और ‘वस्त्रहीन जनता’ जैसे शब्द-प्रयोग उसे जीवंत और संदर्भवान बना देते हैं, लेकिन श्री राय के निबंधों में आए सजीव संदर्भ यथा पशुओं के गोबर से अन्न बीनते दलित, महुआ सुखाकर क्षुधा शांत करने वाली असहाय जनता,भूमि-समस्या, हरिजन समस्या, नारी-मुक्ति, जाति-भेद, असम में अवैध प्रवेश, ‘खाली मुट्ठी,खाली पेट,खाली हांडी साल भर तक अन्नपूर्णा की प्रतीक्षा करते धरती का शेषनाग किसान,’ ‘भूमि जिसकी माता है , बैल जिसका भाई है खेत जिसका बेटा है उसने कब नहीं सहा और कब उसे नहीं सहना होगा’ आदि अनेक शब्द-पद जन-विरोधी लगते हैं। रस-आखेटक संग्रह के ‘जम्बुक’ निबंध में आया गाँव का शब्द-चित्र मस्तिष्क को झकझोरने के लिए काफी है-“मेरे गाँव में दक्षिण तरफ डोमों की बस्ती है। उनके बच्चे जंगल-जंगल, बाग-बाग, खेत-खेत कोई जड़ी, कोई गाँठ, कोई कन्द, चाहे खाद्य हो या कुखाद्य ढूँढते-खोदते-खाते फिरते हैं ; मीठी भटकोंई हो या काषाय जड़, दोनों को चाव से खाते हैं ; ज्वार-बाजरे का डण्ठल चूसते हैं और बाजरे का ‘सीका’ (नये गुम्फ) जानवरों की तरह भरपेट खा जाते हैं । ये धरती का चप्पा-चप्पा छानते हैं कि कहीं विधाता की भूल से कोई रस की बूँद छूट गयी हो, तो उसका आहरण कर लें । पिता समाज ने इन्हें अधिकार वंचित कर दिया, तो क्षमामयी माता वसुन्धरा के हाथ में जो कुछ है, वह इनके हाथ पर वैसे ही रख देती है, जैसे मेले-ठेले के दिन कोई हस्तरिक्त गरीब माँ बेटे के हाथ पर मन के सम्पूर्ण दाह को दबाते हुए कहीं से पाँच नये पैसे का एक सिक्का लाकर रख देती है।” (रस आखेटक,पृ 129) करुणा के साथ विभुता और उदात्तता के मणिकांचन योग का इससे सुंदर उदाहरण दुर्लभ है। मतसा हो या शेरपुर, प्रत्येक गाँव का यही यथार्थ रहा है। अब ‘बिस्कोहर’ वासी इससे अपरिचित हो तो इसमें श्री राय का क्या दोष? हद तो तब होती है जब इन शिविरबद्ध ‘मैनेजरों’ की दुशासन-वृत्ति श्री राय की सांस्कृतिक चेतना को ही प्रश्नांकित करती है।
संस्कृति,ऋत और शील श्री राय के लेखन के प्रस्थान-त्रयी हैं । इसे विकृति करने या किसी प्रकार से चोट पहुंचाने का प्रयास करने वाले हर विचार या व्यक्ति उन्हें अग्राह्य थे–“राष्ट्रीय स्तर पर तथ्यों की तोड़-मरोड़ का विरोध हरेक भारतीय द्वारा होना चाहिए, विशेषतः तब जबकि तथ्यों का संबंध संस्कृति और इतिहास से है। संस्कृति के विकारों का निराकरण निष्पक्ष होकर करना आवश्यक है, पूर्वाग्रह लेकर नहीं।”(सरस्वती,फरवरी1962) तथ्य-संदर्भ-विषय की ईमानदारी से वे किसी प्रकार के समझौते के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने पंडित नेहरू के ‘भारत माता की जय’ लेख में परिभाषित ‘भारतीय जनता की जय। ...भारतीय जन-गण’ का अतिक्रांत करते हुए भारत को ‘भारतीय मनुष्य, भारतीय धरती और भारतीय संस्कार साधना’ के त्रिक (ट्रिनिटी) के रूप में देखने और उसके प्रति रागात्मक बोध पैदा करने की बात की है। जब राजनीति घर के चूल्हे से लेकर दिल्ली दरबार तक सर्वग्रासी राहु-केतु के रूप में वर्चस्व स्थापित कर चुकी थी तब भी वे ‘एकला चलो रे’ के पथिक बनने के लिए तैयार हैं- ‘‘जिस देश के नागरिकों का पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, शिव-अशिव दोनों को राजनीति के नाम पर समान पूजा देकर स्वीकृति करने की प्रेरणा दी जाती है, उस राष्ट्र की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक बरबादी निश्चित है।’’ (सरस्वती,फरवरी 1962) यह सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वैसी विकट स्थिति में इसे (वर्चस्व को) अस्वीकार करना और इस अस्वीकृति को आचरण में ढालना कितना दुष्कर कार्य था । लेकिन जन्म-लब्ध 'ऋतंवरा प्रज्ञा' अपनी अस्मिता को दाव पर लगाने को तैयार ही नहीं थी । वे न तो किसी स्वार्थ के लिए लिख रहे थे न ही कोई राजनीतिक एजेंडा-लेखन कर रहे थे । इतना ही नहीं जब साहित्य के बालखिल्य और दुग्ध-दंत कुमार (त्रिपाठी जी की असल दिक्कत का कारण ये विशेषण ही हैं) तथा उनके ‘मैनेजर’ दिल्ली-दरबार से निकटता गांठ रहे थे तब श्री राय ने तत्कालीन राजनीति के कद्दावर नेता/मंत्री हुमायूँ कबीर को ‘इतिहास-संशोधन के प्रधान व्याख्याता और हमारी ‘संस्कृति’ के सरकारी विधाता’ विशेषण से नवाजते हुए उनके तर्कों को तथ्य से परे बता रहे थे । सच्चाई तो यह है कि श्री राय ‘साठ के दशक के कबीर यानि क्रुद्ध तरुण (यंग्री यंगमैन) थे’। आश्चर्य इस बात पर है कि जिसने खुलकर घोषणा की हो कि “साहित्य में अपनी दर है हिन्दुस्तानी लोक-संस्कृति-अतः बाहर-बाहर नील मरुत-प्रवाह में, या नीचे सुगन्धियों के जंगल में, चाहे जितनी हवाखोरी कर लें, पर लौट आता हूँ घूम-फिर अपनी दर पर ही। लोक-संस्कृति की चिन्मय और मृण्मय भूमि ही अपना असल ‘डीह’ है,”(निषाद बांसुरी, पृ.116) उसके सांस्कृतिक चेतना पर ही समीक्षक द्वारा प्रश्न उठाया गया है। यह आज भी एक रहस्य ही है कि ऐसा कर समीक्षक किस लोभ-साधना में लिप्त था!
श्री राय का तो स्पष्ट कहना है कि “समष्टि मानस या जातीय मानस ‘धर्म और सौन्दर्योपासना’ से संस्कारों का ग्रहण एवं पोषण करता है। भारतीय संस्कृति ने इस देश में जो कुछ गुणवान एवं सुंदर हैं पहले से ही अपना लिया है।”(सरस्वती, सितंबर 1962) उनकी दृष्टि में ‘भारतीय कला और साहित्य, चिंतन और दर्शन तथा भाव-साधना में कमल सिंह, हाथी, बैल, सर्प, गाय, मयूर, हंस, कोकिल, कदंब, पीपल, वट, देवदारू (विशेषतः शिखरों की बनावट में) राधाकृष्ण, त्रिभंगी कृष्ण, नटराज, बुद्ध आदि भाव-धाराओं का जाल बिछा है।’ (वही) जरूरत है संस्कृति के मर्म में अनुप्रवेश की। वे निर्भ्रांत शब्दों में कहते हैं कि यदि ‘इन सब प्रतीकों को धर्म निरपेक्षता के नाम पर बहिष्कृत कर दें तो, सारा देश कुरूप हो जायेगा, अभिरुचि विकृत हो जायेगी एवं मानसिक संस्कारों के लिए कोई भूमि नहीं रह जायेगी कि वे पनप सकें। भारतीय कला और साहित्य, चिंतन और दर्शन इनके बिना जी नहीं सकते। इन प्रतीकों के बहिष्कार का अर्थ होगा भारतीय कला-साहित्य एवं चिंतन की मृत्यु ।... धर्म-निरपेक्षता बढ़कर संस्कृति-निरपेक्षता नहीं बननी चाहिए। राष्ट्रीय संस्कृति की आराधना सभी वर्गों को करनी चाहिए। यही कर्तव्य है, जिसका पालन करना राष्ट्रीय जीवन के लिए आवश्यक है।’ बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशक में हिन्दी क्षेत्र के गांवों में सिर उठाती नवाबी 'कल्चर' और अंग्रेजियत की कलम से तैयार हो रही कॉकटेल संस्कृति के लंबरदारों की खबर लेने से भी वे नहीं चूकते हैं-“परंतु विशुद्ध रईस वर्ग का हिंदी प्रांतों की सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रांति में कुछ भी योगदान नहीं। भारतीय इतिहास की यह सबसे कापुरुष एवं क्षुद्र इकाई है जिसकी आत्मा सदैव मरी रही।” (वही) श्री राय को भरोसा है तो उसी वर्ग से जो अदृश्य कारणों से हाशिये पर था/है, "ब्राह्मण और क्षत्रिय सांस्कृतिक विरासत से शून्य होकर इसी कृत्रिमता को ओढ़े रहेंगे। उनसे मैं कुछ आशा नहीं करता । आशा करता हूँ निम्न वैश्य और शूद्र से जो लोक संस्कृति को अब भी विरासत की तरह संभाले चल रहे हैं।" (21/1/1974 को रामनारायन उपाध्याय को लिखे गए पत्र से) श्री राय के साहित्य में सांस्कृतिक चेतना के ऐसे महत्वपूर्ण सूत्रों को न देख पाने को ‘साहित्यिक-वर्णांध्रता’ के अतिरिक्त और कौन से संज्ञा दी जा सकती है?
विश्वनाथ त्रिपाठी की समीक्षा से उनके ‘शब्द-प्रिय’ होने के शौक का पता चलता है। वे हर जगह शब्द-तलाश में भटकते फिरते हैं और चाहते हैं कि हर उस शब्द को जो उन्हें प्रिय है, ‘विषाद-योग’ निबंध संग्रह में दिखना ही चाहिए। लेकिन यह कैसे हो सकता है ? प्रत्येक पुस्तक और निबंध की अपनी मर्यादा होती है और वह उसी अनुरूप अपने को ढालता है। नाम-स्थान की अनुपस्थिति के साथ एक जो भारी चिंता का विषय श्री त्रिपाठी के लिए है, वह है श्री राय द्वारा वामपंथ और मार्क्सवाद के असलियत का उद्घाटन । वे सीधे नब्ज पर हाथ धर देते हैं, “आज वामपन्थ ही सबसे बड़ा सुविधावाद है। सारे चरित्रगत पापाचार को ढंकने का सर्वाधिक सीधा रास्ता है और सटीक उपाय है वामपन्थी भंगिमा । कभी वह समय भी था जब वामपन्थी होना एक बहुत बड़ा खतरा मोल लेना था, एक वीरतापूर्ण आवाहन था, एक अधूरी परन्तु तेजस्वी निष्ठा था। पर आज बात उलटी है ।” आजादी के बाद के चार-छह दशकों तक साहित्य और इतिहास के सरकारी संस्थानों से लेकर पुरस्कारों के मैदान में शकुनि-पाँसा का जो खेल खेला गया है वह सबके सामने है। श्री राय यहीं नहीं रुकते हैं। वे भरत-पुत्र हैं जिंहे शेरों के दाँत गिनने का शौक बचपन से रहा है। यहाँ तो उनका सामना जंबुकों से हो रहा था जो गोधूलि वेला के बाद ही माँद से निकलते हैं । वे इनके नकाब को प्रारम्भ में ही उतार देते हैं, “उनका सारा चिन्तन बड़ा ही बाजारू, तात्कालिक राजनीतिक सुविधा की ओर उन्मुख और प्रचार वादी है। इन ‘मर्कट’ वामपन्थियों ने परस्पर प्रशंसा आदान-प्रदान द्वारा स्वयं को स्वयं ही मूर्धाभिषिक्त कर लिया है।” श्री राय यहीं रुकते तब भी बालखिल्यों को संतोष हो जाता। लेकिन उनके स्नायु मण्डल में बैठा ‘मोहनजोदड़ों के सांड’ को तो जैसे संतोष ही नहीं है। वह हँकड़ता है-“जिस तरह से नाजियों ने हमारे पुरुषार्थ और वाङ्मय के प्रतीक 'स्वस्तिक’ को छूकर अपवित्र कर दिया, वैसे ही हमारे अरुण वर्ण को कम्युनिस्टों ने स्पर्श करके अपावन कर दिया। ये दोनों नाजी और कम्युनिस्ट मौसेरे भाई हैं और दो चोरों की तरह इनमें प्रगाढ़ बन्धुत्व और प्रगाढ़ दुश्मनी दोनों रहीं पर....।” वे एक-एक कर इनका कच्चा चिट्ठा खोलते जाते हैं, “भारतीय सन्दर्भ में मार्क्सवाद की आकृति क्या होगी, यह किसी वामपन्थी की चिन्तन-क्षमता के बाहर है। ... भारतीय मार्क्सवादी का मार्क्सवादी चिन्ता के विकास में क्या योगदान है, मुझे इसका उत्तर कहीं नहीं मिला। आचार्य नरेन्द्रदेव हों, एस. ए. डांगे हों या राजनीति के अध्यापन में संलग्न मुकुटबिहारी लाल हों, इनका मार्क्सवादी चिन्ता में क्या योगदान है ? इन्होंने ‘बुद्धू’ शिष्यों की तरह जो नोट और कुंजी रटकर पास होते हैं, मार्क्स की या मार्क्स पर लिखी पश्चिमी विचारकों की व्याख्याओं को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया, अथवा उसे भिन्न देश काल के सन्दर्भ में रख कभी परखा भी ? इसका उत्तर नकारात्मक है । शुद्ध वामपन्थियों (कम्यूनिस्टों) से तो यह आशा ही नहीं क्योंकि वे अपनी बुद्धि और आँखें गिरवी रख चुके हैं।” श्री राय की इस बात को उच्चतम न्यायालय ने भी प्रमाणित किया है, “हमें शंका है कि इन्होंने मार्क्सवादी साहित्य को ठीक से समझा है अथवा कभी भी पढ़ा है । या तो ये मार्क्स के बारे में कुछ जानते नहीं, अन्यथा जानबूझकर मार्क्स, ऐंगिल्स एवं लेनिन की रचनाओं की अपव्याख्या कर रहे हैं।” श्री राय की असल चिंता है भारत,भारत धर्म और भारतीयता । इस भाव-संकुलता के खिलाफ जो भी गया उससे श्री राय की कभी नहीं पटी और वे मैदान में उतर ही जाते हैं-“अत: मैं आधुनिक भीड़ का अंग न बनकर कालिदास और मल्लिनाथ की राह पर चलना चाहता हूँ। आनन्द की शोभा यात्रा या जलूस तो सर्वदा निर्जन एकान्त का पथ पकड़कर चलता रहा है। अतः मैं भी अकेले ही सही-चिल्लाऊंगा : “मेघदूत-कामायनी जिन्दाबाद ! मानव-मन जिन्दाबाद ! मानसिक संस्कृति जिन्दाबाद !” मैं अकेले-अकेले सारे नरक को परास्त करूँगा। मैं अकेले-अकेले इस कसाईखाने में बैठकर भी यज्ञीय-पायस का रंधन करूँगा।” श्री राय ने अपने पूर्व के संग्रहों में भी अपनी मुख्य प्रतिज्ञा ‘अहं भारतोऽस्मि’ का सदैव ध्यान रखा है और भारत की प्रतिष्ठा और उसे विश्व-मन से जोड़ने की चेष्टा अनेकश: की है। उनके लिए युग बोध भी एक महत्वपूर्ण चीज है। इसलिए उन्होंने “निश्चय किया ... कि एक दिन पूज्य पिताजी जब सोये रहेंगे, तो उनके सिरहाने से ... फटी दीमक लगी किताब निकाल लाऊँगा और आग लगाकर फूँक दूंगा। ... तब हिन्दू धर्म के लिए एक नई पोथी लिखनी पड़ेगी ... उस नई किताब को मैं लिखूंगा, और जो-जो मन में आयेगा,सो लिखूंगा। आखिर मेरी बात भी तो कभी आनी चाहिए कि आजीवन मैं ‘हाँ,कहारी हाँ’ का ठेका ही पीछे से भरता रहूँगा ।” फिर एक सुयोग्य वंशज की भांति आनंद वर्धन हों या विवेकानंद, तुलसी हों या कबीर, कुमारस्वामी हों या राधाकृष्णन, गांधी हों या प्रेमचंद या कोई और श्रेष्ठ पूर्वज, सबके प्रति आदर भाव रखते हुए ‘मैं जो ठीक समझता हूँ वह कहूँगा ही’ से अनामिकाभिषक्त करने से भी नहीं चूके । और यह सब वह अपनी कुबेर-पूंजी के बल पर कर रहे थे न कि ‘पार्टीमैन’ या ‘व्यक्ति-निष्ठा’ के आधार पर जैसा कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘विषाद-रोग’ में किया है।
श्री राय के निबंधों की खूबी है तथ्य,कथ्य,संदर्भ और लालित्य का मणिकांचन योग । दबे स्वर से ही सही विश्वनाथ त्रिपाठी स्वीकार करते हैं, “कुबेरनाथ राय प्रकृति-सौंदर्य के परम प्रेमी हैं,भावुक हैं, ‘ललित लवंग-लता-परिशीलन’ शैली के गद्यकार हैं, मोहक गद्य लिखते हैं । उनके पास सौंदर्य दृष्टि भी है।” लेकिन जल्दी ही वे बेचैन होकर कि ‘हाय यह मैंने क्या किया!’ और तुरंत अपने वर्णांध्र-रंग में आ जाते हैं -“यह गद्य शैली और सौंदर्य-दृष्टि उन्हें हिन्दी के पूर्व गद्यकारों से मिली है।” सच तो यह है कि पूरी समीक्षा में समीक्षक की यही कोशिश दिखती है कि श्री राय को कैसे हल्का दिखाया जाय। यदि कहीं कुछ शुभ दिखा भी तो उस पर यह टिप्पणी कि ‘उनके निबंध द्विवेदी से पीछे की चेतना ... भारतेन्दु युग से पूर्व रीतिकालीन दृष्टि से लिखे गये निबंध हैं।’ वे यदि श्री राय के निबंधों/लेखों पर वर्णान्ध्र-मुक्त होकर चिंतन किए होते तो उन्हें यह जरूर पता होता कि एक युग पूर्व ही श्री राय ने इस बात को रेखांकित करते हुए लिखा था, “कला और साहित्य के अंतर्गत मौलिकता ‘परंपरा का अभिनव विकास' मात्र है। कवि के मौलिकतम कृति में भी परंपरा तत्त्व का योग बारह आना रहता है और व्यक्तिगत प्रतिभा का सिर्फ चार आना मात्र।” एकांतिक निष्ठा,तप और श्रम से अर्जित की गई श्री राय की शैली अद्भुत और विशिष्ट है। समीक्षक ने प्राय: परशु-प्रहार करने की कोशिश की है। लेकिन श्री राय के गाँडीव के आगे उनके सारे अस्त्र-शस्त्र न केवल धरे के धरे रह जाते हैं अपितु यह भी साबित हो जाता है कि खास मोह-निशा से आच्छादित विचार किस हद तक लेखक को पूर्वग्रह युक्त कर देते हैं।
कुबेरनाथ राय ने 1962 के सरस्वती में प्रकाशित एक लेख ‘इतिहास अथवा शुक-सारिका कथा’ में लिखा था कि ‘संन्यासी और इतिहासकार दोनों को चराचर-जितेंद्रिय होना चाहिए।’ किसी भी समीक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ‘व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों और वर्गगत स्वार्थों की वंचनापूर्ण मरीचिका में, जल-कमल न्याय से, निर्विकार रहेगा।’ लेकिन यह तो हस्तामलकवत तब होता है जब हम ध्यान-योग में अपने को प्रतिष्ठित कर लें । तुलसी ने ‘कबिहिं अरथ आखर बल साँचा’ ऐसे ही नहीं कहा है। श्री राय इस हाँ-धर्मी क्रिया-योग की साधना के फलस्वरूप अपनी मूल प्रकृति के स्रोत से जुड़ चुके थे । तभी तो वे लिखते हैं -‘‘इसी से ठोस, झकाझक ठनठनाते अर्थ की चिन्ता न कर शब्दों के अर्थ की चिन्ता किया करता हूँ। माना कि भावों और विचारों से पेट नहीं भरता। पेट भरने के लिए ठनठनियाँ चाँदी का अर्थ ही चाहिए। परंतु इन भावों और विचारों के बीच मन अपूर्व स्थान पा जाता है। यह अपूर्व सुख है। जब तक संभव है यह अपूर्व स्नान करता ही चलूँगा, भले ही खाने के लिए बस बम-बम महादेव ही रहे।” तो श्री राय के लिए यह अपूर्व-स्नान जिसे अन्यत्र उन्होंने ‘मानस-स्नान’ कहा है, महत्वपूर्ण है। ‘मानस-स्नान’ के फलस्वरूप उनका लेखन सिद्धावस्था की ओर बढ़ता गया है और उनकी रचना में इसके चारो पाये-'संक्षिप्तता,' 'संतुलन', अर्थ-गाम्भीर्य' और 'उदात्तता' अपने आप उपस्थित हो गए हैं । इस सिद्धावस्था तक पहुँचने में उन्हें अपने को पल छिन होम करना पड़ा है। वे लिखते हैं- “मैं गाँव-गाँव, नदी-नदी, वन-वन घूम रहा हूँ । मुझे दरकार है भाषा की। मुझे धातु जैसी ठन-ठन गोपाल टकसाली भाषा नहीं चाहिए। मुझे चाहिए नदी जैसी निर्मल झिरमिर भाषा, मुझे चाहिए हवा जैसी अरूप भाषा। मुझे चाहिए उड़ते डैनों जैसी साहसी भाषा, मुझे चाहिए काक-चक्षु जैसी सजग भाषा, मुझे चाहिए गोली खाकर चट्टान पर गिरे गुर्राते हुए शेर जैसी भाषा, मुझे चाहिए भागते हुए चकित भीत मृग जैसी ताल-प्रमाण झंप लेती हुई भाषा, मुझे चाहिए वृषभ के हुंकार जैसी गर्वोन्नत भाषा, मुझे चाहिए भैंसे की हँकड़ती डकार जैसी भाषा, मुझे चाहिए शरदकालीन ज्योत्सना में जंबुकों के मंत्र- पाठ जैसी बिफरती हुई भाषा, मुझे चाहिए सूर के भ्रमरगीत, गोसाई जी के अयोध्याकाण्ड, और कबीर की ‘साखी’ जैसी भाषा, मुझे चाहिए गंगा-जमुना-सरस्वती जैसी त्रिगुणात्मक भाषा, मुझे चाहिए कंठलग्न यज्ञोपवीत की प्रतीक हविर्भुजा सावित्री जैसी भाषा।” यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जिसे ऐसी भाषा की दरकार हो,जिसने ऐसी भाषा की साधना की हो, वह किसी की भाषा शैली का क्या नकल करेगा? यह एक तथ्य है कि श्री राय परंपरा के दाय को सदा ही आदर के साथ स्वीकार करते रहे हैं। यह उनका निजी संस्कार है।
श्री राय के शब्द-प्रयोग पाठक को गुदगुदाते हैं, कल्पना के घोड़े पर बैठाते हैं और फिर कहते हैं-जा बेट्टा! लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा उद्धरणों को संदर्भ-प्रसंग से काटकर किए गए शब्द-प्रयोग उनके निजी राग-द्वेष से आगे नहीं बढ़ पाते हैं । कुछ-देशी विदेशी लेखकों और क्रांति स्थलों का नामोच्चारण करते हुए वे आरोप लगाते हैं कि श्री राय के लेखन में इन नामों की अनुपस्थिति उनके चिंतन में ‘जन-सामान्य की आशा-आकांक्षा की उपेक्षा और शताब्दी के सांस्कृतिक योगदान में अधिकांशतः और प्रधानतः जनवादी और वामपंथी चेतना के योगदान की अस्वीकृति को दर्शाती है। समीक्षक यदि अपनी आँखों से संगठन-मोहाविष्ट की बंधी पट्टी हटाकर देखता तो ‘विषाद-रोग’ से मुक्ति हेतु जितनी भी जड़ी-बूटियों (पूर्व-पश्चिम के कम्यूनिस्ट-वामपंथी रुझान के लेखक और देश) का नाम-जप उसके द्वारा किया गया है, वे सब श्री राय के निबंधों में अपने ठेठ यथार्थ के साथ उपस्थित हैं, “मैं राइन-वोल्गा के तट पर अथवा कावेरी-ब्रह्मपुत्र के तट पर फूल बनकर फूटूंगा या गिरनार के जंगलों का सिंह बनकर दहाडूंगा या हरियाना का सेचन-समर्थ पुंगव वृषभ बनकर हँकडूँगा, या कहीं किसी वियतनाम के मुक्ति-संग्राम में रत रहूँगा या कहीं किसी हंगरी या चेकोस्लोवाकिया के किसी अखबार दफ्तर में बैठकर अग्रलेख लिखता रहूँगा जब बाहर लाल या काली सरकारी 'गाड़ी' मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी एक दर्जन संगीनों के साथ।” श्री त्रिपाठी के लिए वामपंथ और मार्क्सवाद मकबरा और चर्च हैं जिसकी आलोचना उन्हें बर्दाश्त नहीं है। जबकि श्री राय ‘मनुष्य को छोड़कर अन्य किसी के प्रति साहित्य को प्रतिबद्ध नहीं मानते।’ आखिर सात समुद्र पार विचारधारा की स्थापना के लिए लाखों किसानों और मजदूरों की गयी हत्या को ‘तर्क के धोखे से कोई कैसे उचित ठहरा सकता है’ । श्री राय ने इसे ही लक्षित करते हुए कहा “यह गरीब का भाग्योदय नहीं; मुट्ठीभर पार्टी ‘मैनेजरों’ का भाग्योदय अवश्य है।” चार दशक बाद हारवर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित बहुचर्चित संपादित पुस्तक The Black Book of Communism ने इस बात को पुख्ता तौर साबित भी किया। श्री राय के लेखन की विशेषता है ‘रचनात्मक सामंजस्य’(creative balance)। यह शुरू से आखिर तक बना रहता है। वे कभी भी अनावश्यक अथवा निरर्थक बात नहीं कहते हैं। विश्व के हर ‘पंडित’ के प्रति उनके मन में सम्मान है। लेकिन वे अपने विवेक के साथ समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। वे लिखते हैं-“मार्क्सवाद के पास आस्था का आदर्श है सही, पर वह आदर्श अभी जन-संस्कारों में प्रतिष्ठित नहीं हो पाया है। इसका कारण है रूसी और चीनी मार्क्सवादियों का चरित्र।” यह एक तथ्य है । लेकिन इसके साथ ही वे यह भी कहने से नहीं चूकते हैं कि “गीता-रहस्य, हिंद स्वराज और संविधान तीनों मेरी समझ से आदर्श हिंदुस्तान के अभिनव साम-ऋक और यजुर्वेद हैं और इन तीनों को यदि हृदय से स्वीकृत करके चौथे ‘दास कैपिटल’ के अथर्व का भी देश वरण करें तो कोई विशेष आत्मक्षय या हानि नहीं।” श्री राय ने अपने को ‘चैत्ररथी गद्य काक’ कहा है जिसके पास भले ही एक आँख हो पर वह सब कुछ देख सुन लेता है। लेकिन समीक्षक पता नहीं क्यों शुतुरमुर्ग-पुराण रचने में ही मशगूल था।
श्री विश्वनाथ त्रिपाठी के कई आरोप तो अति अनोखे और हास्यास्पद हैं। इस छोटी समीक्षा में वे अपनी दो महत्वपूर्ण प्रूफ की गलती ‘पुरुखा’(पुरूरुवा) और ‘आध्यामिक’ (आध्यात्मिक) को भले ही नहीं देख पाये पर ‘विषाद-योग’ के शब्द-बंध ‘रोमहीन जघन’ में वे निजी काम-सीत्कार की ध्वनि (एक प्रूफ की गलती की) को अवश्य पकड़ लेते हैं और कल्पना कर लेते हैं कि श्री राय यहाँ पहुँचते-पहुँचते बेसुध हो गए होंगे। अब ऐसी ‘उदात्त कल्पना’ पर कौन न मर जाये ऐ खुदा! श्री राय ने मानस-राग की खेती खूब की है। फलस्वरूप प्रणय,दांपत्य,वात्सल्य जैसे स्थलों पर उनकी कल्पना उदात्त ही नहीं विशाल और विभुतासंपन्न हो उठी हैं। यह राग-मधु उन्होंने वाल्मीकि,कालिदास,भवभूति,पुराण सहित अनेक कवियों/लेखकों की रचनाओं से तैयार किया है, और इसे श्रद्धा पूर्वक स्वीकार भी किया है । पर इसका वर्णन करते हुए अपनी विवेक की छौंक लगाना (वही बारह आना+चार आना) नहीं भूलते हैं । जब श्री त्रिपाठी और उनके शिविर-धर्मी दिल्ली में साहित्यिक उठा-पटक और परकीया-राग में ऊभ-चुभ कर रहे थे तब श्री राय महज चालीस वर्ष की अवस्था में अर्जुन की तरह अपने गाँडीव को एक ओर रखने के बारे में सोचने लगे थे, “मेरी चौथी पुस्तक 'विषाद-योग' प्रकाशित हो गई है। निषाद-बांसुरी की छपाई काशी में शुरू है। लगता है कि साहित्य के दिन लद गये, इसी से कुछ लिखने की इच्छा नहीं होती, किन्तु अपने मानसिक संतुलन के लिए कुछ न कुछ लिखना पड़ता है।” श्री राय “‘सिद्ध साहित्य’ अथवा ‘उत्तम साहित्य’ कहलाने लिए (1) लेखक की अनुभूतिगत ईमानदारी (सब्जेक्टिव आनेस्टी) और (2) बालिग अभिव्यक्ति (‘एडल्ट’ या ‘मेच्योर एक्सप्रेशन’)" को परम आवश्यक मानते हैं। दुर्भाग्य से समीक्षक अथवा उनके शिविर-सहधर्मियों के पास यह दोनों ही अनुपलब्ध है। इसलिए समीक्षक को ‘बालखिल्य या दुग्ध दंत-कुमार’ का विशेषण नागवार लगता है। श्री राय की आजीवन दोस्ती रही है गाँव के अनपढ़ों और कथित रूप से कमजोर और अछूत जाति में पैदा हुए लोगों से । वे उनके अनुभव और ज्ञान के आगे नतमस्तक भी हैं। पर समीक्षक व्यंजना को ही नहीं समझ पाया और आरोप मढ़ दिया कि कॉलेज के अध्यापक होने के नाते उनके लिए ‘हाईस्कूल के अध्यापक भी निम्न श्रेणी के प्रतिमान हैं’।(आलोचना,वही) इसी तरह का एक और आरोप कि “कुबेरनाथ राय का ‘मैं’ पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर दिखाई देता है।” (वही) जबकि श्री राय का स्पष्ट मानना है कि “... इसमें [साहित्य में] आया ‘मैं’ भी मैं नहीं हूँ। साहित्य में ‘मैं’ सदैव समूहवाचक संज्ञा (Collective Noun) का अभिनय करता है।” आरोपों को धार देने के चक्कर में समीक्षक हँसुआ के बियाह में खुरपी का गीत भी गाते हैं- ‘ हम जानते हैं कि शंकराचार्य के बाद गीता के सबसे समर्थ व्याख्याकार बाल गंगाधर तिलक ने गीता को ‘कर्मयोग’ कहा है । क्या कारण है कि कुबेरनाथ राय को 'कर्म' से अधिक विषाद से अनुराग है।’ श्री राय तिलक के योगदान से बखूबी वाकिफ हैं- “गीता में कर्मवाद का दर्शन लोकमान्य तिलक के द्वारा हुआ। 'गीता रहस्य' कर्मवाद पर ही आश्रित है। इससे पूर्व 'गीता' को 'योग वाशिष्ठ' जैसा संन्यासी-साहित्य ही माना जाता था। गृहस्थों के लिए इसका उपयोग नहीं था। परंतु तिलक ने इसको नवीन दिशा प्रदान की। फल यह हुआ कि गीता राष्ट्रीय, सामाजिक एवं साहित्यिक आंदोलनों की मुख्य प्रेरणा स्रोत बनी। ऐसा लगता है कि समीक्षक शायद मधुसूदन सरस्वती (सोलहवीं सदी के दार्शनिक) जिसे श्री राय ने 'प्रचंड प्रतिभावान सन्यासी' कहा है, से ठीक तरीके से परिचित नहीं है। अन्यथा 'सबसे...' जैसी आत्यंतिक घोषणा से अवश्य बचते। मेरा तो मानना है कि यदि विश्वनाथ त्रिपाठी श्री नारायण चतुर्वेदी जी के संपादकत्व में प्रकाशित ‘सरस्वती’ पत्रिका के केवल 1962 से लेकर 1974 तक के अंकों का ही ठीक से वाचन कर लेते तो श्री राय की असल भाव-भंगिमा-मुद्रा, पूंजी, सिद्ध-भाव तथा अनासक्त कर्म आदि से सहज ही परिचित हो गए होते।
कुल मिलाकर समीक्षा से गुजरते हुए तो यही लगता है कि ‘अहं भारतोऽस्मि’ के अप्रतिम साधक श्री राय के प्रति समीक्षक के सोवियत-प्यार ने उनसे आग्रह-पूर्ण लेखन के लिए प्रेरित किया था और वे खोज-खोजकर पुस्तक के कुछ उद्धरणों को संदर्भहीन ढंग से उद्धृत कर ‘क्रूरकर्मा वृकोदर’ को ही अपना पाथेय बना लेते हैं। श्री विश्वनाथ त्रिपाठी को यह जानना चाहिए कि ‘साहित्य का राजमार्ग अति विशाल है। साहित्य भीम और द्रौपदी तक ही जाकर नहीं रुकता है। वह युधिष्ठिर तक जाता है जिनका रथ महाभारत की लड़ाई में धरती से सदैव चार अंगुल ऊपर-ऊपर चलता था।’ गांधी अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा
मो-9404822608, ईमेल- chinmay69@gmail.com
*विस्मृत नहीं, अमर नायक हैं कुबेरनाथ राय*
प्रचण्ड प्रवीर के बहाने
चिन्मय भारत
पिछले दिनों दिल्ली के एक उद्भट शोधार्थी ने एक लिंक भेजकर प्रचण्ड प्रवीर के आलेख ‘विस्मृत नायक : कुबेरनाथ राय’ को पढ़ने का आग्रह किया। कुबेरनाथ राय ( लेख में आगे कुबेरनाथ राय को ‘कुनारा’ नाम से संबोधित किया गया है।) के लेखन से परिचय और रुचि होने के कारण लेख पढ़ गया। लेख अच्छा और तथ्यपरक लगा । लेख पढ़ते समय स्नायुमंडल में अनेक बातें उमड़ने-घुमड़ने लगीं । प्राय: होता यह है कि यदि लेख अच्छा है तो आनंद-पूर्वक पढ़ता हूँ और आगे बढ़ जाता हूँ। लेकिन इस लेख को पढ़ने के बाद ‘मन की बात’ करने/लिखने की इच्छा हुई और कलम/लैपटॉप लेकर बैठ गया।
‘विस्मृत नायक: कुबेरनाथ राय’ के लेखक का नाम प्रचंड प्रवीर है। दो शब्दों के इस नाम में दो उपसर्ग ‘प्र’ हैं। यह एक संयोग है कि ‘कुनारा’ को इस तरह के अनेक उपसर्गों से गहरा लगाव है और वे इनका खूब प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए–प्रशांत, प्रमूल्य, प्रलुब्धक, प्रगल्भ, महाजागरण, महासमन्वय, महाविद्या, महानिशा आदि।
लेख के आरंभ में ही लेखक के एक ‘प्रचंड वाक्य’ से भेंट हो गई - ‘कुछ ऐसी ही चालाकियाँ और मूर्खताओं का शिकार रही हैं कुबेरनाथ की रचनाएँ।’ है तो कटु कथन, पर बात तो सही है। विडम्बना देखिये कि अत्यंत पढ़ाकू और सावधान लेखक अनजाने ही सही गाफिल संपादक की मूर्खता का शिकार हो जाता है । हुआ यह कि कुछ लोगों से ‘कुनारा’ की प्रशंसा सुनकर उनके दो संग्रह ‘प्रिया नीलकण्ठी’ और ‘रस आखेटक’(फर्जी वाला) वह पढ़ भी लेता है। ध्यान देने की बात है इस ‘रस आखेटक’ में संग्रह ‘प्रिया नीलकण्ठी’ संग्रह का एक निबंध ‘हेमंत की संध्या’ सम्मिलित है। इसमें उसका कोई दोष नहीं है। दरअसल ‘प्रचंड’ संज्ञा का यह एक विशेष गुण धर्म है जिसके वे इसके शिकार हो गए। ‘कुनारा’ की प्रारम्भिक तीन कृतियाँ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई थीं- ‘प्रिया नीलकण्ठी’,‘रस आखेटक’ और ‘गंधमादन’ । दुर्भाग्य से फर्जी तरीके से प्रकाशित होने/छपने की बीमारी से ग्रस्त किसी गाफिल संपादक ने ‘रस आखेटक’ नाम से उनके दूसरे संग्रहों से निबंध उठाकर प्रकाशित करा दिया है और आजकल अमेजन पर वही उपलब्ध है। असल संग्रह नदारद। ग्रेशम का नियम ‘बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाहर कर देती है’ यहाँ भी काम कर रहा है। अब जब 19 निबंधों का संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से ‘रस आखेटक’ के नाम से प्रकाशित है तो उसमें से चार निबंध लेकर फर्जी संग्रह प्रकाशित करना न केवल अनैतिक है अपितु एक किस्म का संपादकीय अपराध भी है। चयन और संकलन प्रकाशित करना उचित है पर शीर्षक का दुहराव कत्तई अनुचित है। लेखक प्रवीर द्वारा बड़ा सुंदर सवाल उठाया गया है- ‘इन सारे मंतव्य के बावजूद इन्हें पुस्तक के सम्पादन करने की आवश्यकता क्यों पड़ी यह मेरे समझ से परे है।’ आजकल के गोमुखी व्याघ्र चयनकर्ताओं और संपादकों को समझना आसान नहीं है। तथ्य यह है कि जिन उद्धरणों के ब्याज से प्रचंड ने यह सवाल उछाला है, वे सभी कथन अंग्रेजी के अध्यापक रहे पी.एन.सिंह की किताब ‘कुबेरनाथ राय की साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि’ और गाफिल संपादक की उनसे बातचीत के आधार पर लिखे गए हैं।
पी.एन.सिंह ‘कुनारा’ के समकालीन रहे हैं। यह संयोग है कि कुनारा और पी.एन.सिंह दोनों ही अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का होना स्वाभाविक है। बड़े-बड़े गुरु घंटाल जब द्रोणाचार्यों के सहारे शाखा-मृग बने हुए थे तब किशोर ‘कुनारा’ (कक्षा 8 /9 में पढ़ते समय) के लेख माधुरी और विशाल भारत में छप चुके थे। जब वे अपने गाँव-घर से दूर नलबारी में रहकर साहित्य-साधना में लगे थे, तब उनके समकालीन अपनी-अपनी राजनीति में लगे थे । पी.एन.सिंह भी इनमें से एक हैं । मनुष्य रूप में वे भले और एक सीमा तक ‘लिबरल’ भी थे। पर कुछ बात है कि ... । पी.एन.सिंह ने ‘कुनारा’ पर एक भारी अहसान करते हुए (या अपनी अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण) ‘कुबेरनाथ राय की साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी । इस पुस्तक में ‘कुनारा’ पर देशी-विदेशी औजारों से खूब वार किए गए हैं। लेकिन ‘कुनारा’ की ऊंचाई इतनी है कि पी.एन.सिंह को थक हारकर कहना पड़ता है-‘उनका लेखन बहु-आयामी,अंतर्दृष्टि सम्पन्न एवं आकर्षक है,और ये ही उनके लेखक-व्यक्तित्व के आधार है।’ (पी.एन.सिंह : कुबेरनाथ राय की साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि, पृ 58) इसी पुस्तक के अंत में पी.एन.सिंह का एक आलेख भी संकलित है जो संभवत: ‘कुनारा’ की मृत्यु के बाद लिखा गया था। इसमें वे स्वीकार करते हैं कि ‘मेरी उनसे बमुश्किल पाँच-छह मुलाकातें हुई होंगी।’ (पी.एन.सिंह : कुबेरनाथ राय की साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि, पृ 93) और ढाई दशक बाद वीणा में प्रकाशित एक लेख में वे लिखते हैं-“वे मेरे निवास पर अक्सर प्रातः पाँच बजे आ जाया करते थे और तरह-तरह की बात अपने महाविद्यालय के बारे में कहते रहते। ..... यही बातचीत करते सात बज जाते। मैं उनको एक कप चाय और पिलाता और फिर नीचे उतरकर उन्हें प्रणाम कहते हुए सी-ऑफ करता।” (वीणा,वर्ष 94, अंक 6, जून 2021) एक शांत और समर्पित लेखक जो इस धरा पर नहीं था, उसके बारे में ऐसी टिप्पणी मर्माहत करने वाली है। ऐसी टिप्पणी इसलिए भी आती हैं कि उस शानदार और कालजयी लेखक के साथ कोई खड़ा होने वाला नहीं था। जिस फर्जी संग्रह ‘रस आखेटक’ को प्रचंड ने पढ़ा है उसका ‘अबसर्ड संपादकीय’ जो कई मायनों में अभूतपूर्व है, का अंतिम दो पैरा देखने लायक है- “मैं पी.एन. सिंह की पुस्तक के बारे में क्या कहूँ। कुछ समझ में नहीं आता, क्योंकि कुछ भी निर्णायक रूप से कहना उचित नहीं लगता। डॉ. पी. एन. सिंह को कुबेरनाथ राय के बारे में जल्दबाजी में कुछ कहना आत्मश्लाघा होगी। लेकिन कुल मिलाकर, इतना निश्चित है कि कुबेरनाथ राय एक ऐसे निबंधकार हैं, जिन्हें ठीक से पढ़ना और लिखना चुनौतीपूर्ण है।” गाफिल मियां गुरु पी.एन. सिंह के कथन ‘... लेकिन व्यावहारिक स्तर पर भाजपाई । कुछ एक सहकर्मी मित्रों ने ऐसा मुझे बताया है’,(सिंह :पृ. 79) का पैराफ़्रेजिंग तो किए ही साहित्य के भरत मुनि बनते हुए यह भी घोषित कर दिये कि ‘कुबेरनाथ राय की कोई स्वतंत्र साहित्यिक दृष्टि नहीं है।’ यह देखना पाठक गण इस बात का लक्ष्य कर सकते हैं कि गाफिल चेला-संपादक और गुरु पी.एन. सिंह न केवल एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं, अपितु सनातन की चिंता को वे अल्पसंख्यक और उर्दू विरोध तथा हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक के रूप में देखते हैं। इसे मानसिक दिवालियापन के अलावा और क्या कहा जा सकता है? पाठक स्वयं विचार करें। ।
प्रचंड ने अपने नाम के साथ न्याय करते हुए गाफिल संपादक की बढ़िया से खबर लेते हुए यह जानने को उत्सुक है कि ‘इन्हें पुस्तक के सम्पादन करने की आवश्यकता क्यों पड़ी यह मेरे समझ से परे है।’ लेखक की यह चिंता भी जायज है कि ‘जब आप महानुभाव को सन्दर्भ समझ ही नहीं आते तो आप सम्पादन का भार क्यों उठाते हैं।’ प्रवीर की प्रचंड राय और भी मानीखेज हो जाती है जब वह यह कहते हैं कि ‘रस आखेटक’ व ‘प्रिया नीलकण्ठी’ का सम्पादन और विश्लेषण कूढ़मगजों को अवश्य छोड़ देना चाहिए क्योंकि श्रम करना उनके बस का रोग नहीं है।’ गाफिल संपादक अपने संपादकीय में लिखता है-‘अभी तक मैंने उन पर तीन पुस्तकें देखी और पढ़ी हैं। ... इसमें इसको सबसे अच्छा कहा जाए।’ गाफिल मियां को पता ही नहीं है कि 1979 में ही कुरुक्षेत्र वि. वि. के हिंदी विभाग से ‘कुबेरनाथ राय के निबंधों में लालित्य तत्त्व’ विषय पर एम. फिल. की उपाधि मिल चुकी थी। इसके बाद भी अनेक लोगों ने उन पर शोध किया था। मजेदार बात है कि कुनारा पर शोध करने वाले प्राय: दूसरे प्रदेशों के लोग थे, जिनसे न तो उनका कोई पूर्व परिचय था न ही बाद में कभी भेंट हुई । दरअसल आजकल बिना हर्र-फिटकरी के चोखा तैयार होने वाले संपादकों/प्रकाशकों का ज़ोर बढ़ता जा रहा है और वे ऐसे क्लासिक लेखकों की रचनाओं को छापने की जुगत में लगे रहते हैं । कुबेरनाथ राय भी ऐसे ही एक लेखक हैं। ‘सहज कृतज्ञ’ गाफिल संपादक की अन्य संपादकीय कृतियों में सम्मिलित संपादकीय वक्तव्यों को ठीक से पढ़ने वाला हर पाठक उसकी ‘चालाकी और नालायकी’ को समझ सकता है। संपादकीय अविवेक का उदाहरण हाल में प्रकाशित ‘कुबेरनाथ राय रचनावली’ में भी देखा जा सकता है जिसके प्रथम पृष्ठ से ही प्रचंड प्रवीर के अनेक कथनों की पुष्टि होती दिखती है। ‘कुनारा’ प्राय: अपनी किताबों में ‘अंत में’ या ‘अपनी बात’ शीर्षक के अंतर्गत पुस्तक के बारे में कुछ कहते/बताते हैं। इस रचनावली में तो गाफिल-द्वय संपादकों ने एक दूसरे संकलनकर्ता के संपादकीय ‘उनकी बात’ को ‘उनका’ ही समझकर उसे सद्य: प्रकाशित कर अभूतपूर्व कार्य किया है। इस पर फिर कभी चर्चा होगी । फ़िलहाल तो इतना ही कहना है कि ‘कुनारा’ के निबंधों का आनंद लेने के लिए उसे मूल में ही पढ़ना ही चाहिए न कि किसी संपादकीय सहारे से।
प्रचंड प्रवीर ने ‘कुनारा’ पर टीका-टिप्पणी करने की कुछ पूर्व शर्तें बताई हैं जिससे मेरी शत-प्रतिशत सहमति है। ‘कुनारा’ जैसे निबन्धकार की आलोचना तो और भी कठिन है जिसकी जड़ें पाताल तक फैली हों। पर मन है कि मानता नहीं और कुछ ‘जम्बुक’ पंड श्रम कर बैठते हैं । प्रवीर ने फकीर और गांधी के हिंसा-अहिंसा तथा प्रेमिका के ब्याज से बड़ी सुंदर बात कही है। इसका असल आनंद उठाने के लिए पाठकों को त्रेता के वृहत्साम में ‘कुनारा’ द्वारा लिखित संवाद ‘सिंह-शूकर’ को पढ़ना चाहिए। इस अद्भुत संवाद को समझते हुए आगे बढ़ना ठीक रहेगा। किसी समय एक जंगल में एक सिंह अपनी पद्मपलाश लोचना सिंहनी के प्रेम पाश में बद्ध होकर रात-दिन उसी के साथ विचरण करता था। जैसा कि जंगल में होता है छीना-झपटी में माहिर कमीने हुंडार (भेड़िए) भी सिंह-झुंड के आस-पास ही विचरण करते रहते हैं। जंगल की एक गज़ब खासियत है यह है कि शाश्वत दुश्मन भी अगल-बगल रह लेते हैं। बहरहाल सिंह इस बात को कई दिन से ताड़ रहा था कि हुंडार उस युगल-प्रेमी को दूर-दूर से देखा करता है। यह एक अद्भुत तथ्य है कि प्राय: सिंह ‘हुंड़ार-भेड़िए-कुत्ते’ का मांस नहीं खाते। इसलिए उसकी तरफ वे ध्यान नहीं देते। पर कभी-2 परिस्थितिवश ध्यान देना ही पड़ता है और एक दिन वह घटित हो ही गया। सिंह अकेले ही कहीं विचरण कर रहा था। सिंह के स्नायुमंडल में अचानक कपिशा प्रिया का ध्यान और उस पर से जार भाव उमड़ता है। सिंह काम के वशीभूत हो तीव्र वेग से लौटा। उसे दूर से ही दिखाई दिया कि कमीना हुंड़ार उसकी सोती प्रिया को सूंघ रहा है। पंजे से लेकर माथे तक बिजली दौड़ गयी। काल का पंजा उठा उसके एक ही प्रहार से उस कमीने हुंडार की गर्दन टूट गयी। दूसरे प्रहार की जरूरत नहीं पड़ी। कहना न होगा कि प्रवीर ने भी अपने लेख में प्रचण्ड वार किया है जिसके कारण तथाकथित गाफिल संपादक का तिलमिलाना स्वाभाविक है। हालांकि वे भले मन से कहते जरूर हैं कि ‘मैं केवल उनकी अल्पज्ञता, हठधर्मिता, हिंसा और अशुचिता को रेखांकित करना चाहता हूँ।’ ‘प्र’ उपसर्ग का इतना प्रभाव तो पड़ना ही चाहिए।
प्रचण्ड प्रवीर का अध्ययन अत्यंत समृद्ध है। कला-विज्ञान-दर्शन की समझ भी काबिलेतारीफ है। ‘कुनारा’ के स्नातक में विषय थे-अंग्रेजी साहित्य,गणित और दर्शन तथा उन्होने ‘श्री प्रियरंजन सेन, डॉ० सुबोध सेन गुप्ता एवं प्रोफेसर तारक सेन जैसे 'टैगोरिस्टों' के चरणों में बैठकर विद्या-लाभ लिया था ।’ (सरस्वती, जुलाई 1962) फलस्वरूप समय के साथ उनकी दृष्टि अत्यंत साफ और निर्मल होती गई है और ‘वे लोक से मानव जीवन का महत्तम उठा लेने’ की कला में निष्णात हो गए हैं और उसका सुखद परिणाम यह हुआ कि हमारे जैसे पाठकों को घर बैठे ही एक से बढ़कर एक कोहिनूर-निबंध पढ़ने को मिल जाता है ।
प्रचंड प्रवीर विज्ञान और गणित के सिद्धांत और लिबनिज, इन्टिग्रल-डिफरेंशियल कैलकुलस जैसे उदाहरणों के ब्याज से निबन्धकार द्वारा कुछ निचोड़ निकालने पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी हमारे सामने रखते हैं और ‘कुनारा’ की कुछ अवधारणाओं, जिसके अटपटे लगने के बावजूद सिरे और शीघ्रता से अस्वीकृत नहीं करने का आग्रह करते हैं। ‘कुनारा’ ने प्रकृति में नर की श्रेष्ठता को अवश्य रेखांकित किया है, पर उस व्यंजना का यदि हम ठीक से अभिग्रहण करें और गीता के श्लोक ‘ध्यायतो विषयान्पुंस:, सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः, कामात्क्रोधोऽभिजायते॥,’ से मिलाकर एक साथ देखेंगे तो अर्थ कुछ-कुछ स्पष्ट हो जाता है। बहरहाल जीवन का यह क्षेत्र बड़ा जटिल है और इस पर आत्यन्तिक निर्णय देना या थोपना उचित नहीं है। ‘कुनारा’ भी प्राय: इस बात की ताईद करते हैं।
प्रचंड का यह कथन कि ‘हमारे यहाँ उच्छिष्ट पढ़ने का रिवाज है,’ बावन तोले पाव रत्ती सही है। शास्त्र को मूल में ही पढ़ने की उनकी हिदायत भी सर्वथा उचित है। यह एक तथ्य है कि आज की इस सूचना विस्फोट युग में धैर्य पूर्वक मूल ग्रन्थों को पढ़ने का समय निकालना आसान नहीं है। तो उपाय क्या है? लेखक सुझाव देता है कि ऐसे में अंग्रेजी के प्रोफेसर कुबेरनाथ राय (और लोगों का भी नाम जोड़ा जा सकता है) के निबन्धों से ही काम चलाना ठीक रहेगा। यह सुझाव मानीखेज है। ‘कुनारा’ ने अपने निबंधों में रामायण और महाभारत सहित अनेक पौराणिक ग्रंथों पर अपनी कलम चलायी है । ‘कुनारा’ का मानना है कि किसी भी ‘राष्ट्र की कस्तूरी उसके साहित्य में होती है। यह कस्तूरी दुर्गन्धमयी न हो’ इसके लिए साहित्य को सरल-स्वच्छ-उच्चगामी होना होगा जिसके लिए विषय का उच्चाशय होना जरूरी है। क्रिया-योग की साधना के फलस्वरूप वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत हमारी ‘परमा स्मृति’ का हृदय रचते हैं। मर्कट वाम-विचारकों को यह जाँचता-पचता नहीं और वे उनपर दो तरफा आक्रमण करते हैं कभी ‘उपेक्षा’ से तो कभी ‘अतीत का कैदी’ कहकर। ‘कुनारा’ इन सबसे बेपरवाह हो तथ्य और रस दोनों के साथ न्याय करते हुए ‘पाठकों के मानसिक ऋद्धि और बौद्धिक क्षितिज का विस्तार’ के अपने उद्देश्य से कभी विरत नहीं होते हैं। इस रचना-प्रक्रिया में कई जगह वे कल्पना का भी सहारा लेते हैं पर वहाँ भी वे व्यावहारिक धरातल को नहीं छोड़ते हैं। यह ठीक बात है कि समय के साथ अनेक अनुसंधान होंगे और नए तथ्य भी सामने आएंगे। हो सकता है कि तब कुछ निष्कर्ष धूमिल भी हो जाएँ। ‘कुनारा’ लिखते भी हैं-“अतः मेरा प्रस्ताव है कि इन निबन्धों पर कोई विचार करने चले तो 'रस' की कसौटी पर ही विचार करे, शास्त्र की कसौटी पर नहीं। इसके 'रस' के लिए ही मेरी सिसृक्षा यश या अपयश की भागी है। इसके 'शास्त्र' वाले अंश को तो मैंने 'भारत का भूगोल' (कक्षा 8 की पाठ्य पुस्तक) से लेकर हटन, चटर्जी, गुहा, प्रजुलुस्की आदि तक-वाङ्मय के अनेक घाटों से उपलब्ध किया है ।” (निषाद बांसुरी,पृ 243) स्पष्ट है कि शास्त्र वाले अंश के लिए वे तत्कालीन उपलब्ध साहित्य का सहारा लेते हैं और एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। पर वे नए शोध का स्वागत भी करते हैं । उनका तो मानना है कि ‘शिशु कक्षा की पहाड़े की पुस्तक से लेकर आणविक भौतिक नवीनतम शाखा 'प्लाज्मा फिजिक्स' तक, सर्वत्र ललित निबन्ध के बीज उपलब्ध हो सकते हैं।’ (वही) यह सच है कि समय के साथ नवीन खोजों के आधार पर ‘नए प्रमाणों के आने से उनकी स्थापनाएं तथ्यात्मक रूप से पुरानी या कहें तो अशुद्ध भी’ हो सकती हैं। लेकिन उनकी असल चिंता से कौन इंकार करेगा? उनकी असली चिंता है आसेतु हिमाचल की। इसलिए वे कहते हैं कि ‘भारतीय 'ब्रह्मा' चतुरानन हैं, जिनके चार मुख हैं : आर्य-द्रविड़-किरात-निषाद’ । कौन नहीं जानता कि साठ-सत्तर के दशक में देश किन परिस्थितियों से जूझ रहा था। ‘कुनारा’ एक संवेदनशील और सजग लेखक हैं। वे उस काल खंड में ‘प्रत्येक स्वर का शुभाशुभ पढ़ने की चेष्टा’ करते हैं और लिखते हैं-“बंगाल से जम्बुक-स्वर उठता है: ‘भारत तो कोई एक राष्ट्र नहीं । यह तो बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र आदि अनेक राष्ट्रों के समूह का नाम है। हाँ, नौकरी और शरणार्थी के प्रश्न पर भारत ‘एक राष्ट्र’ अवश्य माना जाना चाहिए। फिर असम से जम्बुक-स्वर उठता है, ‘‘भारतमाता तुम मेरी मातामही हो सकती हो, पर मातृका नहीं ! माँ है ‘असमा!’ साथ ही एक ‘प्रगतिवादी’ स्वर उठता है: ‘ मैं मुसलमान, हम और तुम असमिया! परन्तु ये गुजराती-बिहारी-मारवाड़ी विदेशी!’ तमिलनाडु से स्वर उठता है, ‘हम हैं महान, आर्य हैं नीच! इस देश का पट्टा हमारे गौरांग प्रभु अगले 500 वर्षों के लिए हमारे नाम लिख गये! अतः आर्य=संस्कृति=उत्तर=भारत=हिन्दी=महात्मा गाँधी=रामायण हमारे दुश्मन नम्बर एक हैं !’” (रस आखेटक , पृ 132-133) इसलिए ‘कुनारा’ को पढ़ते समय चतुर्दिक सतर्क रहना होगा।
‘कुनारा’ अद्भुत प्रतिभा के धनी है। भारतीय परंपरा को गहराई से समझने और उसकी अभिव्यक्ति की उनकी अपनी शैली है। लेखन की शुरुआत तो वे ‘साहित्य में मेरा वादा’ से करते हैं और तीसोत्तरी तक आते-2 अपनी निजी ‘आत्मिक मूलाधार’ (Spiritual Base) को पहचान जाते हैं और फिर उस मूल प्रकृति से कभी विचलित नहीं हुए। फलस्वरूप वे राम और रामकथा के उत्स की ओर बढ़ते चले जाते हैं और निकाल लाते हैं ‘त्रेता का वृहत्साम’ जैसी अप्रतिम निबंध-मणि। इस संग्रह का ‘एकमात्र उद्देश्य है रामत्व के उस सौंदर्य का उद्घाटन जो तप, संकल्प, पुरुषार्थ, त्याग, ज्ञान और तेज से जुड़ा है। पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर राम के इस तेजस्वी शील और सौंदर्य का उद्घाटन करने की चेष्टा है। (‘त्रेता का वृहत्साम’, पृ vii ) मनुष्य भी अद्भुत जीव है। इसकी जिजीविषा भी अव्याहत है। यह निरंतर अतिक्रमण करता हुए ऊर्ध्वाधर होता चलता है। हालांकि इस क्षेत्र में सबका प्रवेश वर्जित है। पर कुनारा तो कुनारा है। पूर्वजों की विद्या को पहचानने और उसे पाठकों को परोसने के लिए इस क्षेत्र में भी बेधड़क प्रवेश कर जाते हैं। इस गुह्य विद्या के महाकांतार में प्रवेश को कुछ बाल-खिल्य तथा ‘मर्कट’ वामपन्थी उन्हें ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ कहते हैं। दरअसल इनका असली दर्द तो कुछ और ही है। आजादी के शुरूआती दशकों के साहित्येतिहास के आकाश पर संस्कृति तथा इतिहास-संशोधन के सरकारी विधाता-व्याख्याता और मनसबदार तथा नव्य-पुरातन वामपंथियों के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा सरपट दौड़ रहा था । अचानक ‘कुनारा’ अवतरित होते हैं घोड़े की लगाम को पकड़ लेते हैं और लिखते हैं-“19वीं शती का यह 'संपूर्ण पुनर्जागरण' मूलत: हिंदू महाजागरण था। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।” (सरस्वती, मार्च 1964) उनका यह कथन किसी भावावेश में नहीं अपितु सवा सौ वर्ष (1825-1950) में घटित हुए उन भाव-परिवर्तनों की गहन-विवेचना के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जिन्होंने अभिनव हिंदू धर्म के नए आयामों की सृष्टि की है। अपने दो आलेखों ‘मानववादी आंदोलन और सनातन का पुनर्गठन’ में उक्त अवधि के महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों और उनके नायकों के अवदान के साथ-साथ राष्ट्रीय अस्मिता के चारों स्तम्भ-‘राष्ट्रीय दर्शन-राष्ट्रीय धर्म-राष्ट्रीय सौंदर्य दृष्टि तथा राष्ट्रीय साहित्यिक उत्तरदायित्व’ जो क्रमशः ‘कर्मनिष्ठ वेदांत-भक्ति-रस सिद्धांत और लोकसंग्रह’ हैं, का नीर-क्षीर विवेचन किया है जो उस कालखंड की सम्पूर्ण सांस्कृतिक-राजनीतिक कसमसाहट के साथ-साथ करवट बदल रही भारतीय महाजाति के अनहद नाद को समझने की दृष्टि देती है। ‘सांस्कृतिक-स्वातन्त्र्य' और 'बुद्धि-स्वातन्त्र्य’ के नाम पर जब उस कालखंड में ‘लोलिता’ का चंग बनाकर उड़ाया जा रहा था और ‘रामकथा/मानस’ को ही प्रश्नांकित कर रहे थे, तब उस संक्रमण काल में श्री राय को त्रेताकालीन मृदंग-ध्वनि सुनाई देती है । वे लिखते हैं -“मेरे मन के भीतर स्थित प्रजापति बार-बार मुझे आदेश दे रहे हैं कि त्रेतायुग के इस इतिहास खंड को मनुष्य जाति की चेतना का शाश्वत अंग बना डालूँ ।” (महाकवि की तर्जनी, पृ 58) जब ‘हिन्दू’ शब्द के उच्चारण से साहित्यकार बच रहे थे, कुनारा सगर्व उद्घोष करते हैं-“आधुनिक दृष्टिवाले काष्ठ योगी चाहे जो कहें, पर मैं तो हिन्दू हूँ और उसमें भी सिक्ख-बौद्ध-जैन नहीं, बल्कि सनातनी और मूर्तिपूजक है, और इस आसेतु हिमाचल, वसुन्धरा को मैं कभी मामूली मिट्टी नहीं मान सकता। यह तो साक्षात् देव-विग्रह है । इसे परमाप्रकृति का बृहत्तर देव-विग्रह मानकर ही मैंने आजीवन इसका स्तवगान लिखते रहने का संकल्प ले लिया है। (निषाद बांसुरी, पृ 85) वे इस नव्य हिंदू-दृष्टि को जो ‘विवेकानंद, तिलक और गांधी द्वारा परिष्कृत हिंदू राष्ट्रीयता’ है, को ‘हिंदुस्तान की प्रतिभा की उपज मानते हैं जिसका हिंदुस्तान की जिजीविषा से जैविक संबंध है तथा जिसके बल पर हम आसेतु हिमाचल बंधे हैं।”(प्रिया नीलकंठी,पृ94 )
‘कुनारा’ की दृष्टि में ‘भारतीय संस्कृति के तीन आधार हैं : वैदिक, तान्त्रिक और लोकायत’। अब जब मन हिंदूमय हो और आजीवन इसका स्तवगान लिखते रहने का संकल्प भी हो तो स्वाभाविक है कि वे इन तीनों के रसायन से ही वे अपने शोध-निबंध तैयार करेंगे। इसलिए उनके कुछ निबंधों में औपनिषदिक और वैदिक कालीन शब्दों के साथ-2 योग और तंत्र साधना के शब्द खूब मिलते हैं। ज्योतिष विद्या और खगोल शास्त्र में उनकी गहरी रुचि है। प्रचंड प्रवीर की दृष्टि इधर भी गई है और उन्होने अपने तईं ‘त्रिजटा-स्वप्न’ निबंध के ब्याज से इसकी ओर संकेत करते हुए उसके रामायण के मध्य में होने के कारणों को समझने का आह्वान भी किया है। दरअसल इस पूरे प्रसंग को ठीक से समझने के लिए सावित्री के चारो रूपों को लेकर लिखे तीन और निबंध-‘सीता सावित्री, उषा और अहिल्या तथा अनुसूय्या प्रसंग का अवगाहन करना होगा। मेरी अपनी समझ है कि महानिशा के इस महाविद्या की झलक पाने के लिए ‘कुनारा’ के रामकथा पर आधारित तीन निबंध संग्रह – ‘महाकवि की तर्जनी, त्रेता का वृहत्साम और रामायण महातीर्थम’ में डुबकी लगानी होगी। गो कि यह गारंटी नहीं है कि हाथ कुछ आ ही जाय। क्योंकि यह रास्ता ही असामान्य है। अत: मेरी तो यही सलाह होगी कि ‘रस’ से ही संतोष किया जाय। हाँ कोई माई का लाल चाहे तो बजरंग बली का नाम लेकर इस गूढ़ विद्या के क्षेत्र में विचरण करने का साहस कर सकता है। पर अपनी तो सीमा बस ‘शब्द-रस’ तक ही है। कुनारा ‘रस और बोध’ के आग्रही हैं। वे लिखते हैं –“मैंने सर्वत्र अपने लेखन में ‘रस’ और ‘बोध’ का समान भाव से वितरण किया है और ‘बोध’ की दुहाई देकर रस का पलड़ा हीन करने को मैं कहीं भी तैयार नहीं, ‘विषाद योग’ जैसे बोध-प्रधान संकलन में भी नहीं। मैंने ‘बोध’ और ‘रस’ के बीच अंश-भेद देखा है तत्त्व-भेद नहीं । ”(विषाद योग’,पृ 245 ) कुनारा द्वारा प्रयुक्त ‘उषा और ऊषा’ शब्दों की तरफ भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। कुनारा ने दोनों का प्रयोग किया है। मेरे हिसाब से दोनों के बीच गहरा अर्थ भेद नहीं है।
कुनारा के निबंध हास्य,सौन्दर्य और व्यंग्य की खान हैं । उनके व्यंग्य प्रायः हर निबन्ध में अपनी छटा बिखेरते हैं । बस जरूरत है सावधानी से पढ़ने और समझने की- ‘‘व्याकरण भाषा का पुलिस मैन है। जब कोई शब्द वाक्य के भीतर कुमार्गगामी होता है तो उसकी आवारागर्दी को ठीक करने के लिए व्याकरण उसपर लाठीचार्ज करता है,अश्रु गैस छोड़ता है और गिरफ्तार करता है, जिससे वाक्य-संहिता का ठीक-ठीक पालन होता रहे। तब भी कुछ कालिदास और शेक्सपीयरों की शह पाकर कुछ शब्द नक्सलपन्थी रास्ता अख्तियार कर ही लेते हैं और बाद में अपनी क्रांति की संवैधानिक स्वीकृति भी पा जाते हैं । तब बेचारा व्याकरण अपना सा मुँह लेकर रह जाता है।’’(गंधमादन,पृ 9) यह निबंध उन्नीस सौ साठ के दशक के अंतिम वर्षों में लिखा गया है। इस कथन में उस समय की भारतीय राजनीति में प्रवेश के इच्छुक घंट-घड़ियाल लिए एक विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जिसके खात्मे के लिये आज भी सरकार प्रयास रत है। राग की खेती में विश्वास करने वाले कुनारा व्यंग्य करते समय कभी-कभी गाँडीव भी उठा लेते हैं- ‘‘कहाँ सारे रसों के रस माधव की प्रिया और कहाँ व्याकरण का नमक-सत्तू । कहाँ शब्दों का नवरसों के मार्ग पर अभिसार और कहाँ प्रत्यय और विभक्तियों की तड़ातड़ बजती लाठियाँ और संधि-समास का अश्रु गैस।’’ (गंधमादन,पृ 11) गाँव की राजनीति पर किया गया उनका व्यंग्य अद्भुत है-‘‘धूल में रस्सी बटना कोई उनसे सीखे। सारे गाँव को वे तुर्कनाच नचा रहे हैं। ... उनकी कृपा से अभागे ग्राम के शीश पर मामले-मुकदमे के मेघ, दफा एक सौ सात के इन्द्र धनुष और फौजदारी के विद्युत गर्जन से सदा पावस ऋतु छाई रहती है।’’(रस आखेटक,पृ14 ) कुनारा के निबंध अपने परिवेश के इतिहास-भूगोल के परिचय के साथ-साथ गंभीर अध्ययन की भी मांग करते हैं। “हिंदी में दो-चार के अंदर 'फिराक'-परस्ती की जो धुन जगी है वह इसी पुरानी आदत के कारण है।” (सरस्वती, मार्च 1966) प्रचंड प्रवीर ने ‘विस्मृत’ शब्द का प्रयोग राह चलते नहीं किया गया है। दरअसल यह उनके प्रेम को दर्शाता है। कुनारा के लेखन से लोग न केवल परिचित थे अपितु भयग्रस्त भी थे। कुनारा द्वारा पंत के ‘लोकायतन’ (1964 में प्रकाशित और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से 1965 में सम्मानित) की गई समीक्षा “'लोकायतन' की सारी दार्शनिक पृष्ठभूमि में पराक्रमहीनता का घोर सौंदर्यवादी 'कुरान शरीफ' मिलता है जिसे पंतजी अनावश्यक ढंग से बार-बार फेटते हैं,”(सरस्वती, मार्च 1965) ने पंत को मैदान में उतरने मजबूर कर दिया और पंत ने अपने बचाव में सरस्वती के जून 1965 के अंक में ‘लोकायतन का उद्देश्य और दृष्टिकोण’ शीर्षक से एक बड़ा लेख लिखा । लेकिन कुनारा पीछे कैसे हटते ! उन्होने पंत के लेख का जबाव सरस्वती -अगस्त,1965 में ‘फिर लोकायतन पर’ शीर्षक से दिया और उपलढ़ आंकड़े बताते हैं कि पंत जी ने चुप बैठना ही श्रेयस्कर समझा। कल्पना की जा सकती है कि यह वह समय है जब पद्म श्री के सहारे पंत अपने शीर्ष पर थे और कुनारा बस लेखन में प्रवेश ही किए थे। यह एक कठोर सच्चाई है जिसकी तरफ प्रचंड के लेख में संकेत भी किया गया है कि साहित्य के इन ‘अश्वथामाओं’ ने उन्हें उसकी मुख्य धारा से बाहर करने की कोशिश भी की और कुछ हद तक सफल भी रहे। कुनारा इस बात को समझते थे। पर साहित्यकार से तो उनकी अपेक्षा कुछ और ही थी- “साहित्यकार’ न केवल ‘सत्य के प्रति ईमानदार रहे और सत्य के लिए ही एक सांस्कारिक, मानसिक वातावरण तैयार करे’ अपितु “यदि आत्मा द्वारा उपलब्ध सत्य ‘बहुमत’ के खिलाफ जाता है, तो साहित्यकार का धर्म है बहुमत के विरुद्ध खड़ा होना,अकेले खड़ा हो जाना,समूची ऐतिहासिक शक्तियों के विरुद्ध अकेली उठी हुई तर्जनी का रोष व्यक्त कर देना।”
अंत में एक बात की ओर इशारा कर अपनी बात को खत्म करूंगा । साहित्य की दुनिया में भाषा को लेकर खूब बहस हुई है और हो भी रही है। अनेक रचनाओं की भाषा को लेकर विवाद भी खूब हुए है। इन सबके बीच कुनारा भी अपनी भाषा को लेकर परेशान है। वे कहते हैं –“मैं गाँव-गाँव, नदी-नदी, वन-वन घूम रहा हूँ । मुझे दरकार है भाषा की। मुझे धातु जैसी ठन-ठन गोपाल टकसाली भाषा नहीं चाहिए। मुझे चाहिए नदी जैसी निर्मल झिरमिर भाषा, मुझे चाहिए हवा जैसी अरूप भाषा। मुझे चाहिए उड़ते डैनों जैसी साहसी भाषा, मुझे चाहिए काक-चक्षु जैसी सजग भाषा, मुझे चाहिए गोली खाकर चट्टान पर गिरे गुर्राते हुए शेर जैसी भाषा, मुझे चाहिए भागते हुए चकित भीत मृग जैसी ताल-प्रमाण झंप लेती हुई भाषा, मुझे चाहिए वृषभ के हुंकार जैसी गर्वोन्नत भाषा, मुझे चाहिए भैंसे की हँकड़ती डकार जैसी भाषा, मुझे चाहिए शरदकालीन ज्योत्सना में जंबुकों के मंत्र पाठ जैसी बिफरती हुई भाषा, मुझे चाहिए सूर के भ्रमरगीत, गोसाई जी के अयोध्याकाण्ड, और कबीर की ‘साखी’ जैसी भाषा, मुझे चाहिए गंगा-जमुना-सरस्वती जैसी त्रिगुणात्मक भाषा, मुझे चाहिए कंठलग्न यज्ञोपवीत की प्रतीक हविर्भुजा सावित्री जैसी भाषा।” अब जब ऐसी भाषा से जो साहित्य-फल निर्मित होगा वह तो अमृत फल होने के साथ-2 दीर्घायु भी होगा। इसलिए मेरा मानना है कि कुबेरनाथ राय भारतीय साहित्य के अमर नायक हैं।
प्रचंड प्रवीर के हाँ में हाँ मिलाते हुए मैं भी कहूँगा कि ‘हिन्दी साहित्य के वैभव, विशालता और प्रगल्भता के प्रतिमान’ इन निबंधों को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए । मेरा दावा है कि जिस तरह महाभारत की लड़ाई में युधिष्ठिर का रथ धरती से सदैव चार अंगुल ऊपर-ऊपर चलता था ठीक उसी तरह पाठक भी भीतर-2 न केवल ऊर्ध्वाधर होगा अपितु उसके मानसिक और बौद्धिक क्षितिज का विस्तार होगा। अमृत काल में इससे सुंदर अमृत फल की और क्या ही कल्पना की जा सकती है।
Tuesday, September 26, 2023
गांधी,स्वच्छता और सफाई
डा मनोज कुमार राय *
भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे नायक हुए हैं जो हमारे सामने दृढ़ता और संघर्षशील का सहज सूत्र प्रस्तुत करते हैं। ऐसे अनेक नामों सर्वाधिक निकटस्थ नाम महात्मा गांधी का है। गांधी का जन्म इतिहास के उस कालखंड में हुआ था जब ‘मैं मानता हूँ कि हमारा धर्म पूर्वजों की विरासत में वृद्धि करना है ,उसे आज की मुद्रा में बदलना वर्तमान के अनुकूल बनाना है । यह काम सिर्फ अनुवाद से नहीं होगा’। ‘मैं झाड़ू में जीवन की पूरी फ़िलासफ़ी देखता हूँ।’ इस तरह की घोषणा तो वही कर सकता है जो अपार साहस लेकर पैदा हुआ हो। लिखित इतिहास का पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते जाइए, इस तरह का साहसपूर्ण संदेश देने वाला और उससे बढ़कर संदेश को आचरण में उतारने वाला व्यक्ति शायद ही दिखाई दे । जीवन को टुकड़ों में बांटकर देखने वाली भेद दृष्टि गांधी को समझने में असमर्थ होती है। उनको समझने के लिए हमें जीवन को अविभक्त और अखंड ईकाई मानकर चलना होगा और तब गांधी हस्तामलकवत हो जाते हैं।
दरअसल गांधी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह संपूर्णता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार थे-‘हर चीज को स्वराज्य प्राप्त करने तक टालते रहना गलत बात है।.... स्वराज्य तो बहादुर और शुद्ध और स्वच्छ लोग ही प्राप्त कर सकते हैं।’ गांधी अपार साहस लेकर पैदा हुए थे। उन्होने स्वच्छता को स्वराज से जोड़ते हुए कहा -‘स्वच्छता का महत्व राजनीतिक स्वतन्त्रता से अधिक है’, और यह आत्मानुशासन के रास्ते से होकर जाता है। आजादी से चंद महीने पूर्व भी उन्होने साफ तौर पर घोषित किया,“यदि हम अपने आसपास को साफ-सुथरा नहीं रख सकते हैं तो हमारा स्वराज बेकार साबित होगा।” विशुद्ध राजनीति के क्षेत्र में आकंठ डुबकी लगाने वाले विश्व-राजनेताओं में ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता है जिंहोने जीवन के हर कोने को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश की हो । पर गांधी तो अलग मिट्टी के बने हैं । साफ-सफाई से लेकर रसोई और स्त्री समस्या तक सभी का महत्व उनकी नजर में समान है। प्रकृति-प्रेम और स्वच्छता तो उनको हृदय की गहराइयों तक पसंद थे । इन दोनों विषयों को लेकर अपनी सीमा के भीतर उन्होने खूब लिखा और भाषण दिया है। भारत लौटने के बाद 1915 के कांग्रेस अधिवेशन में वह भी आमंत्रित थे। पर ‘साधुता के बाद स्वच्छता को ही सबसे बड़ा गुण’ मानने वाला यह योद्धा-सन्यासी वहाँ भी सफाई में ही लगा ।
गांधी जब अफ्रीका से भारत लौटे तो गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे भारत-भ्रमण पर निकलें और भारत को समझने की कोशिश करें । गांधी के लिए यह सुझाव भारत को समझने के लिए एक बेहतरीन अवसर साबित हुआ। लेकिन गांधी के लिए उनकी भारत-यात्रा के तीर्थस्थल– ‘बनारस-हरिद्वार-गया’ एक भयानक अनुभव ही साबित हो रहे थे। हरिद्वार की यात्रा तो उनके जीवन में एक विचित्र ही अनुभव लेकर आया। यहा वे कुंभ मेले में स्वैच्छिक सेवा देने के लिए आये थे । तीर्थ-स्थलों में फैली-पसरी गंदगी उनके लिए तीर्थ न होकर व्यथा-तीर्थ का रूप धर लेती हैं—‘मैं बड़ी-2 आशाएँ लेकर और बड़ी श्रद्धा से प्रेरित होकर हरिद्वार गया था। लेकिन मैंने देखा कि वहाँ नैतिक और शारीरिक दोनों ही तरह की मलिनता है और यह स्थिति देखकर मुझे अत्यंत दुख हुआ’। सच्चाई तो यह कि सदियों से ‘धर्मशास्त्रों ने नदियों की धारा,नदी तट,आम सड़क और आमदरफ्त के दूसरे स्थानों को गंदा न करने’ की सलाह देते रहें हैं पर हमने आलस्य और अज्ञान के चलते इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया । अपनी डाकोर यात्रा के बारे में गांधी ने लिखा है -‘पवित्र तीर्थ स्थान डाकोर यहाँ से बहुत दूर नहीं है। मैं वहाँ गया था। वहाँ की पवित्रता की कोई सीमा नहीं है। मैं स्वयं को वैष्णव भक्त मानता हूँ,इसलिए मैं डाकोर जी की स्थिति की विशेष रूप से आलोचना कर सकता हूँ। उस स्थान पर गंदगी की स्थिति ऐसी है कि स्वच्छ वातावरण में रहने वाला कोई व्यक्ति वहाँ 24 घंटे तक भी नहीं ठहर सकता । तीर्थ यात्रियों ने वहाँ के टैंकरों और गलियों को प्रदूषित कर दिया है।’ कल्पना की जा सकती है कि यह सब गंदगी गांधी तब देख रहे थे जब भारत की जनसंख्या वर्तमान जनसंख्या की एक तिहाई से भी कम थी। जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में ही बसता था। शहरों का अमानुषी विस्तार अभी नहीं हुआ था।
गांधी मूलत: एक वैज्ञानिक थे-दार्शनिक और व्यावहारिक दोनों अर्थ में। उनके कर्म-संकुल जीवन-पद्धति में यह गुण सहज हो गया था। ‘विज्ञान और तकनीक’ गांधी की दृष्टि में अपने नाम की सार्थकता तभी साबित कर सकते हैं जब वे मनुष्य की समस्याओं को हल करने में सहायक हों । ‘गंगा की निर्मल धारा और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों पर मोहित’ होने वाले गांधी भारत को चतुर्दिक गंदगी से जब भरा पाते हैं तो उनका मन कराह उठता था- ‘तालाबों का इतना जबर्दस्त दुरुपयोग होते रहने पर भी महामारियों से गांवों का नाश अब तक क्यों नहीं हुआ?’ अहिंसा का यह पुजारी यहीं नहीं रुकता है-‘जहां तक अस्वच्छता के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का संबंध है,मेरा मन ज़ोर-जबर्दस्ती के तरीके को भी स्वीकार करने के लिए लगभग तैयार हो जाता है।’ कल्पना की जा सकती है कि स्वच्छता बनाए रखने के लिए वे कहाँ तक जा सकते हैं। गांधी निर्भ्रांत शब्दों में कहते हैं-‘हमने पिछले सौ वर्षों में जो शिक्षा पाई है,उसका हमपर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा है’। वे शिक्षा के सवाल को भी बड़ी शिद्दत से उठाते हैं और उसका समाधान भी प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। लगभग सौ वर्ष पूर्व ही उन्होने संकेत किया था कि सभी स्तरों पर शिक्षा पाठ्यक्रमों में स्वच्छता को शामिल किया जाना चाहिए-‘गुरुकुल के बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का हिस्सा होना चाहिए.....इन अदम्य स्वच्छता निरीक्षकों ने हमे लगातार चेतावनी दी कि स्वच्छता के संबंध में सब कुछ ठीक नहीं है...मुझे लग रहा है कि स्वच्छता पर आगन्तुको के लिए वार्षिक-व्यावहारिक सबक देने के सुनहरे मौके को हमने खो दिया।” यह तो गांधी की ही कूबत थी जिंहोने सफाई, स्वराज और शिक्षा को एक तराजू पर तौला। सच तो यह है कि किसी भी राष्ट्र को समर्थ और शक्तिशाली बनने का सूत्र तो गांधी ने बहुत पहले ही दे दिया था।
मुंबई के एक हिल स्टेशन का गांधी ने दौरा किया। वे लिखते हैं- ‘पंचगनी में सफाई की हालत भयावह है। ....लोग जहां-तहां थूक देते हैं और गंदगी फैलाते रहते हैं। ....मैं खुद भंगी बन गया हूँ....मैं भंगी का काम दक्षिण अफ्रीका से ही करता आ रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि गंदा बने बिना यह काम कैसे किया जा सकता है। .......भंगी का काम तो एक सुंदर कला है। न केवल सफाई बिलकुल ठीक होनी चाहिए,बल्कि उसे करने का तरीका और उसके उपकरण भी साफ होने चाहिए, न कि स्वच्छता की भावना को ठेस पहुंचाने वाले।’’ गांधी की यह खूबी है कि किसी चीज को कैसे गरिमा के साथ उसके महत्व को सामने लाया जाय। भंगी-कार्य को वे कला से जोड़ देते हैं। जिस कार्य को समाज नीच कर्म मानता है उसे वे उच्च स्तर पर रख देते हैं और दूसरों का आह्वान करते हैं कि वे भी इसे उसी रूप में देखें। इतना ही नहीं भंगी को वे ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ मानते हैं। जाति-वर्ण में श्रेष्ठता देखने वाले जड़- समाज में इस तरह का वक्तव्य देना सामान्य बात नहीं है। गांधी अपनी माँ को भी भंगी इसलिए मानते हैं कि बचपन में माँ ही उनकी साफ-सफाई का का काम देखती थी। इसी तरह भंगी भी पूरे समाज के स्वास्थ्य की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वे मैला उठाने जैसे कुत्सित कार्य को बढ़ावा देते हैं- “किसी भंगी को सिर पर मल की टोकरी उठाए जाते देखकर मेरा मन खराब हो जाता है।” कोई ‘व्यक्ति अपना पेट पालने के लिए दूसरों के मैला को अपने सिर पर ढोये मानवता पर इससे बड़ा कलंक क्या होगा। समाधान के लिए भी संकेत करते हैं-‘मल-विसर्जन के लिए तो हमें कोई वैज्ञानिक तरीका प्रयोग में लाना चाहिए’।
गांधी के लिए उनका शरीर और आश्रम प्रयोगशाला के रूप में कार्य करते थे। आश्रम में साफ-सफाई को लेकर वे बहुत सतर्क रहते थे। वे आश्रम वासियों को अपने भाषण अथवा लेखन से यह बताने की प्रयास करते थे कि कैसे मल को वैज्ञानिक तरीके से विसर्जित किया जा सकता है। खेतों में जाने वालों को वह हिदायत देते थे कि पहले नौ इंच का गड्ढा खोदें फिर शौच करे । पुन: उसे ढँक दें। वह ऐसा करने के लिए इसलिए कहते थे कि जमीन के ऊपरी सतह के कुछ नीचे तक खास किस्म के जीवाणु होते हैं जो यथाशीघ्र मल को विसर्जित कर खाद के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। कम पानी में शौच की व्यवस्था कैसे हो आश्रम में इसे लेकर वे नवीन प्रयोग करते रहते थे। एकत्रित मल को कैसे उसे खाद के रूप में बिना गंदगी के परिवर्तित कर दिया जाय इस पर भी वे पैनी नजर रखते थे।
गांधी स्वदेशी के पक्षधर थे। लेकिन अगर दूसरों से कोई अच्छी चीज सीखने को मिलती थी तो वे उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते थे। उन्होने लिखा-‘ पश्चिम से अभी बहुत कुछ सीखना है। पश्चिमी लोगों ने बड़े-2 शहरों का निर्माण किया है। वे ताजी हवा,स्वच्छ पानी और अपने चारो तरफ की सफाई का महत्व जानते हैं। जो शहर अपनी अपनी सफाई की ओर उचित रीति से ध्यान देगा,उसके निवासियों के स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों की उन्नति होगी।’ स्वच्छता को वे सांस्कृतिक दाय के रूप में भी देखते हैं-‘ स्वच्छता देवत्व के निकट है । मनु,मूसा और मोहम्मद सभी अपने-अपने युगों के लिए उपयुक्त स्वच्छता के नियम बना गए हैं। प्राचीन शास्त्रकार स्वच्छता को सच्चे धार्मिक जीवन का अंग मानते थे’।
गांधी न तो कभी रूकते हैं, न ही थकते हैं। जब-जब मौका मिलता है वे अपने ध्येय पर लौट ही आते हैं-‘व्यक्ति को सबसे पहले गाँव की सफाई के सवाल को अपने हाथ में लेना चाहिए। अगर ग्राम सेवक सेवा भाव से काम करनेवाला भंगी बन जाये वह इस काम को मैला उठाकर उसकी खाद बनाने और गाँव के रास्ते बुहारने शुरू करे । गाँव के लोग उसकी बात सुने या न सुने ,वह अपना काम बराबर करता रहे।’ इसके पीछे के तर्क को भी वे सामने रखते हैं-‘स्त्रियाँ और पुरुष जिन सड़कों पर नंगे पैर चलते हैं उन्हीं को वे पाखाना करके रोज हर सुबह गंदा करते हैं।वयस्क समझदार लोगों का नदी के किनारों पर कतार बांधकर बैठ जाना और फिर पाखाना करके अपराधपूर्ण विचार-हीनता का परिचय देते हुए नदी में जाकर गंदगी साफ करना और इस तरह उसके पवित्र जल में टायफाइड,हैजे और पेचिश के कीटाणु छोड़ आना-यह दृश्य भूला नहीं हूँ।’ काव्यमयी भाषा में कही हुई यह बात हृदय को झकझोर देने के लिए काफी है। पर गांधी यहीं नहीं रुकते हैं। वे इसके तह तक जाते हैं और समाधान भी प्रस्तुत करते हैं -‘हमारे अनेक रोगों की उत्पत्ति का मूल हमारे पाखानों अथवा हमारे ‘जंगल’जाने की आदत में है।....प्रत्येक घर में शौचालय होना चाहिए। मैंने आज से पैंतीस साल पहले यह बात सीख ली थी कि शौच का स्थान भी उतना ही साफ-सुथरा रहना चाहिए जितना कि सोने-बैठने का स्थान । मैंने यह बात पश्चिम से सीखी है। मैं मानता हूँ कि शौच के बहुत से नियमों का सूछ्म पालन जैसा पश्चिम में होता है,वैसा पूर्व में नहीं । पश्चिम के शौचादि के नियमों में कुछ अपूर्णता है जो आसानी से दूर की जा सकती है।’
यह सहज ही कल्पना की जा सकती है कि दशकों पूर्व गांधी ने साफ-सफाई को लेकर जो मुकम्मल खाका खींचा था उस रास्ते पर हम कभी चले ही नहीं। परिणाम क्या हुआ? आंकड़े यह बताते हैं कि विश्व में डायरिया से होने वाली मौतों में भारत का प्रतिशत सर्वाधिक है। भारत के बड़े शहरों में एक तिहाई से अधिक अधिक लोगों के पास खुले में शौच करने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं। हजारो–लाखों लीटर मल-मूत्र का पानी रोज हमारे पवित्र नदियों के पेट में समा रहा है। फलस्वरूप काशी-प्रयाग जैसे तीर्थस्थालों में गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियां दम तोड़ रही हैं। घटिया स्वच्छता का सीधा असर हमारी आधी आबादी के मान-सम्मान,पढ़ाई-लिखाई,स्वास्थ्य और रोजगार पर पड़ता है। अपने देश में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक बड़ा कारण स्कूलों में पर्याप्त साफ-सुथरा शौचालय का न होना भी है। यूटीआई जैसी घातक बीमारी भी इसी कारण होती है। आंकड़ों और अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि पर्याप्त और उचित साफ-सफाई की व्यवस्था शायद 2050 तक हो पावे। ऐसे में हमें यह तय करना होगा कि यदि हम समर्थ भारत की कल्पना को साकार करना चाहते हैं तो इसके लिए पहली सीढ़ी ‘स्वच्छता’ को मजबूती से पकड़ना पड़ेगा जिसकी तरफ एक सदी पूर्व महात्मा गांधी ने न केवल संकेत किया था अपितु आचरण और सूत्र दोनों का मणिकांचनयोग हमारे सामने प्रस्तुत किया था।
*गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय
वर्धा,महाराष्ट्र
गांधी,स्वच्छता और सफाई
डा मनोज कुमार राय *
‘मैं झाड़ू में जीवन की पूरी फ़िलासफ़ी देखता हूँ।’ इस तरह की घोषणा तो वही कर सकता है जो अपार साहस लेकर पैदा हुआ हो। लिखित इतिहास का पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते जाइए,इस तरह का साहसपूर्ण संदेश देने वाला और उससे बढ़कर संदेश को आचरण में उतारने वाला व्यक्ति शायद ही दिखाई दे । गांधी के इन्हीं गुणों के बिना पर भारतीय मनीषा के अद्भूत चितेरे कुबेरनाथ जी लिखते हैं-‘मुझसे जब कोई पूछता है, ‘भारतीयता क्या है’,तो मैं इसका एक शब्द में उत्तर देता हूँ,वह शब्द है ‘रामत्व’—राम जैसा होना ही सही ढंग से भारतीय होना है। हमारे युग में भी एक पुरुष ऐसा हो गया था जिसने राम जैसा होने की चेष्टा की और बहुत कुछ सफल रहा । वह पुरुष था महात्मा गांधी ।’ भारतीयता के इतने बड़े साधक पर भी उनके वैज्ञानिक मनोदशा,सौंदर्यबोध,पर्यावरण,जीवनशैली,वन्य जीव आदि को लेकर लोग अक्सर सवाल खड़ा कर ही देते हैं । पर जब गांधी वांगमय से गुजरना होता है तो ये सारे सवाल ‘पण्ड-श्रम’ ही साबित होते हैं। दरअसल यह सब गांधी को न समझने के कारण ही होता है। जीवन को टुकड़ों में बांटकर देखने वाली भेद दृष्टि गांधी को समझने में असमर्थ होती है। उनको समझने के लिए हमें जीवन को अविभक्त और अखंड ईकाई मानकर चलना होगा और तब गांधी हस्तामलकवत हो जाते हैं।
दरअसल गांधी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह संपूर्णता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार थे-‘हर चीज को स्वराज्य प्राप्त करने तक टालते रहना गलत बात है।.... स्वराज्य तो बहादुर और शुद्ध और स्वच्छ लोग ही प्राप्त कर सकते हैं।’ जब वे ‘हिन्द-स्वराज’ में क्रांतिकारियों को उनकी स्वराज के संकीर्ण सोच के लिए ललकारते हैं तो इसके पीछे उनकी सुचिन्तित धारणा ही काम कर रही थी। गांधी अपार साहस लेकर पैदा हुए थे। उन्होने स्वच्छता को स्वराज से जोड़ते हुए कहा -‘स्वच्छता का महत्व राजनीतिक स्वतन्त्रता से अधिक है’, और यह आत्मानुशासन के रास्ते से होकर जाता है। आजादी से चंद महीने पूर्व भी उन्होने साफ तौर पर घोषित किया,“यदि हम अपने आसपास को साफ-सुथरा नहीं रख सकते हैं तो हमारा स्वराज बेकार साबित होगा।” विशुद्ध राजनीति के क्षेत्र में आकंठ डुबकी लगाने वाले विश्व-राजनेताओं में ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता है जिंहोने जीवन के हर कोने को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश की हो । पर गांधी तो अलग मिट्टी के बने हैं । साफ-सफाई से लेकर रसोई और स्त्री समस्या तक सभी का महत्व उनकी नजर में समान है। प्रकृति-प्रेम और स्वच्छता तो उनको हृदय की गहराइयों तक पसंद थे । इन दोनों विषयों को लेकर अपनी सीमा के भीतर उन्होने खूब लिखा और भाषण दिया है। भारत लौटने के बाद 1915 के कांग्रेस अधिवेशन में वह भी आमंत्रित थे। पर ‘साधुता के बाद स्वच्छता को ही सबसे बड़ा गुण’ मानने वाला यह योद्धा-सन्यासी वहाँ भी सफाई में ही लगा ।
गांधी जब अफ्रीका से भारत लौटे तो गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे भारत-भ्रमण पर निकलें और भारत को समझने की कोशिश करें । गांधी के लिए यह सुझाव भारत को समझने के लिए एक बेहतरीन अवसर साबित हुआ। लेकिन गांधी के लिए उनकी भारत-यात्रा के तीर्थस्थल– ‘बनारस-हरिद्वार-गया’ एक भयानक अनुभव ही साबित हो रहे थे। हरिद्वार की यात्रा तो उनके जीवन में एक विचित्र ही अनुभव लेकर आया। यहा वे कुंभ मेले में स्वैच्छिक सेवा देने के लिए आये थे । तीर्थ-स्थलों में फैली-पसरी गंदगी उनके लिए तीर्थ न होकर व्यथा-तीर्थ का रूप धर लेती हैं—‘मैं बड़ी-2 आशाएँ लेकर और बड़ी श्रद्धा से प्रेरित होकर हरिद्वार गया था। लेकिन मैंने देखा कि वहाँ नैतिक और शारीरिक दोनों ही तरह की मलिनता है और यह स्थिति देखकर मुझे अत्यंत दुख हुआ’। सच्चाई तो यह कि सदियों से ‘धर्मशास्त्रों ने नदियों की धारा,नदी तट,आम सड़क और आमदरफ्त के दूसरे स्थानों को गंदा न करने’ की सलाह देते रहें हैं पर हमने आलस्य और अज्ञान के चलते इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया । अपनी डाकोर यात्रा के बारे में गांधी ने लिखा है -‘पवित्र तीर्थ स्थान डाकोर यहाँ से बहुत दूर नहीं है। मैं वहाँ गया था। वहाँ की पवित्रता की कोई सीमा नहीं है। मैं स्वयं को वैष्णव भक्त मानता हूँ,इसलिए मैं डाकोर जी की स्थिति की विशेष रूप से आलोचना कर सकता हूँ। उस स्थान पर गंदगी की स्थिति ऐसी है कि स्वच्छ वातावरण में रहने वाला कोई व्यक्ति वहाँ 24 घंटे तक भी नहीं ठहर सकता । तीर्थ यात्रियों ने वहाँ के टैंकरों और गलियों को प्रदूषित कर दिया है।’ कल्पना की जा सकती है कि यह सब गंदगी गांधी तब देख रहे थे जब भारत की जनसंख्या वर्तमान जनसंख्या की एक तिहाई से भी कम थी। जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में ही बसता था। शहरों का अमानुषी विस्तार अभी नहीं हुआ था।
गांधी मूलत: एक वैज्ञानिक थे-दार्शनिक और व्यावहारिक दोनों अर्थ में। उनके कर्म-संकुल जीवन-पद्धति में यह गुण सहज हो गया था। ‘विज्ञान और तकनीक’ गांधी की दृष्टि में अपने नाम की सार्थकता तभी साबित कर सकते हैं जब वे मनुष्य की समस्याओं को हल करने में सहायक हों । ‘गंगा की निर्मल धारा और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों पर मोहित’ होने वाले गांधी भारत को चतुर्दिक गंदगी से जब भरा पाते हैं तो उनका मन कराह उठता था- ‘तालाबों का इतना जबर्दस्त दुरुपयोग होते रहने पर भी महामारियों से गांवों का नाश अब तक क्यों नहीं हुआ?’ अहिंसा का यह पुजारी यहीं नहीं रुकता है-‘जहां तक अस्वच्छता के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का संबंध है,मेरा मन ज़ोर-जबर्दस्ती के तरीके को भी स्वीकार करने के लिए लगभग तैयार हो जाता है।’ कल्पना की जा सकती है कि स्वच्छता बनाए रखने के लिए वे कहाँ तक जा सकते हैं। गांधी निर्भ्रांत शब्दों में कहते हैं-‘हमने पिछले सौ वर्षों में जो शिक्षा पाई है,उसका हमपर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा है’। वे शिक्षा के सवाल को भी बड़ी शिद्दत से उठाते हैं और उसका समाधान भी प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। लगभग सौ वर्ष पूर्व ही उन्होने संकेत किया था कि सभी स्तरों पर शिक्षा पाठ्यक्रमों में स्वच्छता को शामिल किया जाना चाहिए-‘गुरुकुल के बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का हिस्सा होना चाहिए.....इन अदम्य स्वच्छता निरीक्षकों ने हमे लगातार चेतावनी दी कि स्वच्छता के संबंध में सब कुछ ठीक नहीं है...मुझे लग रहा है कि स्वच्छता पर आगन्तुको के लिए वार्षिक-व्यावहारिक सबक देने के सुनहरे मौके को हमने खो दिया।” यह तो गांधी की ही कूबत थी जिंहोने सफाई, स्वराज और शिक्षा को एक तराजू पर तौला। सच तो यह है कि किसी भी राष्ट्र को समर्थ और शक्तिशाली बनने का सूत्र तो गांधी ने बहुत पहले ही दे दिया था।
मुंबई के एक हिल स्टेशन का गांधी ने दौरा किया। वे लिखते हैं- ‘पंचगनी में सफाई की हालत भयावह है। ....लोग जहां-तहां थूक देते हैं और गंदगी फैलाते रहते हैं। ....मैं खुद भंगी बन गया हूँ....मैं भंगी का काम दक्षिण अफ्रीका से ही करता आ रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि गंदा बने बिना यह काम कैसे किया जा सकता है। .......भंगी का काम तो एक सुंदर कला है। न केवल सफाई बिलकुल ठीक होनी चाहिए,बल्कि उसे करने का तरीका और उसके उपकरण भी साफ होने चाहिए, न कि स्वच्छता की भावना को ठेस पहुंचाने वाले।’’ गांधी की यह खूबी है कि किसी चीज को कैसे गरिमा के साथ उसके महत्व को सामने लाया जाय। भंगी-कार्य को वे कला से जोड़ देते हैं। जिस कार्य को समाज नीच कर्म मानता है उसे वे उच्च स्तर पर रख देते हैं और दूसरों का आह्वान करते हैं कि वे भी इसे उसी रूप में देखें। इतना ही नहीं भंगी को वे ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ मानते हैं। जाति-वर्ण में श्रेष्ठता देखने वाले जड़- समाज में इस तरह का वक्तव्य देना सामान्य बात नहीं है। गांधी अपनी माँ को भी भंगी इसलिए मानते हैं कि बचपन में माँ ही उनकी साफ-सफाई का का काम देखती थी। इसी तरह भंगी भी पूरे समाज के स्वास्थ्य की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वे मैला उठाने जैसे कुत्सित कार्य को बढ़ावा देते हैं- “किसी भंगी को सिर पर मल की टोकरी उठाए जाते देखकर मेरा मन खराब हो जाता है।” कोई ‘व्यक्ति अपना पेट पालने के लिए दूसरों के मैला को अपने सिर पर ढोये मानवता पर इससे बड़ा कलंक क्या होगा। समाधान के लिए भी संकेत करते हैं-‘मल-विसर्जन के लिए तो हमें कोई वैज्ञानिक तरीका प्रयोग में लाना चाहिए’।
गांधी के लिए उनका शरीर और आश्रम प्रयोगशाला के रूप में कार्य करते थे। आश्रम में साफ-सफाई को लेकर वे बहुत सतर्क रहते थे। वे आश्रम वासियों को अपने भाषण अथवा लेखन से यह बताने की प्रयास करते थे कि कैसे मल को वैज्ञानिक तरीके से विसर्जित किया जा सकता है। खेतों में जाने वालों को वह हिदायत देते थे कि पहले नौ इंच का गड्ढा खोदें फिर शौच करे । पुन: उसे ढँक दें। वह ऐसा करने के लिए इसलिए कहते थे कि जमीन के ऊपरी सतह के कुछ नीचे तक खास किस्म के जीवाणु होते हैं जो यथाशीघ्र मल को विसर्जित कर खाद के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। कम पानी में शौच की व्यवस्था कैसे हो आश्रम में इसे लेकर वे नवीन प्रयोग करते रहते थे। एकत्रित मल को कैसे उसे खाद के रूप में बिना गंदगी के परिवर्तित कर दिया जाय इस पर भी वे पैनी नजर रखते थे।
गांधी स्वदेशी के पक्षधर थे। लेकिन अगर दूसरों से कोई अच्छी चीज सीखने को मिलती थी तो वे उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते थे। उन्होने लिखा-‘ पश्चिम से अभी बहुत कुछ सीखना है। पश्चिमी लोगों ने बड़े-2 शहरों का निर्माण किया है। वे ताजी हवा,स्वच्छ पानी और अपने चारो तरफ की सफाई का महत्व जानते हैं। जो शहर अपनी अपनी सफाई की ओर उचित रीति से ध्यान देगा,उसके निवासियों के स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों की उन्नति होगी।’ स्वच्छता को वे सांस्कृतिक दाय के रूप में भी देखते हैं-‘ स्वच्छता देवत्व के निकट है । मनु,मूसा और मोहम्मद सभी अपने-अपने युगों के लिए उपयुक्त स्वच्छता के नियम बना गए हैं। प्राचीन शास्त्रकार स्वच्छता को सच्चे धार्मिक जीवन का अंग मानते थे’।
गांधी न तो कभी रूकते हैं, न ही थकते हैं। जब-जब मौका मिलता है वे अपने ध्येय पर लौट ही आते हैं-‘व्यक्ति को सबसे पहले गाँव की सफाई के सवाल को अपने हाथ में लेना चाहिए। अगर ग्राम सेवक सेवा भाव से काम करनेवाला भंगी बन जाये वह इस काम को मैला उठाकर उसकी खाद बनाने और गाँव के रास्ते बुहारने शुरू करे । गाँव के लोग उसकी बात सुने या न सुने ,वह अपना काम बराबर करता रहे।’ इसके पीछे के तर्क को भी वे सामने रखते हैं-‘स्त्रियाँ और पुरुष जिन सड़कों पर नंगे पैर चलते हैं उन्हीं को वे पाखाना करके रोज हर सुबह गंदा करते हैं।वयस्क समझदार लोगों का नदी के किनारों पर कतार बांधकर बैठ जाना और फिर पाखाना करके अपराधपूर्ण विचार-हीनता का परिचय देते हुए नदी में जाकर गंदगी साफ करना और इस तरह उसके पवित्र जल में टायफाइड,हैजे और पेचिश के कीटाणु छोड़ आना-यह दृश्य भूला नहीं हूँ।’ काव्यमयी भाषा में कही हुई यह बात हृदय को झकझोर देने के लिए काफी है। पर गांधी यहीं नहीं रुकते हैं। वे इसके तह तक जाते हैं और समाधान भी प्रस्तुत करते हैं -‘हमारे अनेक रोगों की उत्पत्ति का मूल हमारे पाखानों अथवा हमारे ‘जंगल’जाने की आदत में है।....प्रत्येक घर में शौचालय होना चाहिए। मैंने आज से पैंतीस साल पहले यह बात सीख ली थी कि शौच का स्थान भी उतना ही साफ-सुथरा रहना चाहिए जितना कि सोने-बैठने का स्थान । मैंने यह बात पश्चिम से सीखी है। मैं मानता हूँ कि शौच के बहुत से नियमों का सूछ्म पालन जैसा पश्चिम में होता है,वैसा पूर्व में नहीं । पश्चिम के शौचादि के नियमों में कुछ अपूर्णता है जो आसानी से दूर की जा सकती है।’
यह सहज ही कल्पना की जा सकती है कि दशकों पूर्व गांधी ने साफ-सफाई को लेकर जो मुकम्मल खाका खींचा था उस रास्ते पर हम कभी चले ही नहीं। परिणाम क्या हुआ? आंकड़े यह बताते हैं कि विश्व में डायरिया से होने वाली मौतों में भारत का प्रतिशत सर्वाधिक है। भारत के बड़े शहरों में एक तिहाई से अधिक अधिक लोगों के पास खुले में शौच करने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं। हजारो–लाखों लीटर मल-मूत्र का पानी रोज हमारे पवित्र नदियों के पेट में समा रहा है। फलस्वरूप काशी-प्रयाग जैसे तीर्थस्थालों में गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियां दम तोड़ रही हैं। घटिया स्वच्छता का सीधा असर हमारी आधी आबादी के मान-सम्मान,पढ़ाई-लिखाई,स्वास्थ्य और रोजगार पर पड़ता है। अपने देश में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक बड़ा कारण स्कूलों में पर्याप्त साफ-सुथरा शौचालय का न होना भी है। यूटीआई जैसी घातक बीमारी भी इसी कारण होती है। आंकड़ों और अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि पर्याप्त और उचित साफ-सफाई की व्यवस्था शायद 2050 तक हो पावे। ऐसे में हमें यह तय करना होगा कि यदि हम समर्थ भारत की कल्पना को साकार करना चाहते हैं तो इसके लिए पहली सीढ़ी ‘स्वच्छता’ को मजबूती से पकड़ना पड़ेगा जिसकी तरफ एक सदी पूर्व महात्मा गांधी ने न केवल संकेत किया था अपितु आचरण और सूत्र दोनों का मणिकांचनयोग हमारे सामने प्रस्तुत किया था।
*विकास एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय
वर्धा,महाराष्ट्र
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