Wednesday, April 11, 2018


गुलामी की मानसिकता और गांधी

किसी ने कहा है-A nation’s character was improved not by importing foreign expertise but by an inspiring moral leadership capable of speaking in its native idioms activating its hidden moral nerves and creatively reinterpreting and mobilizing its traditional resources. Alien institution produced parrots who repeated what they were taught and did not generate inner or organic changes.
राघवन एन अय्यर अनुसार Colonialism was an ontological phenomenon and consisted in destroying the cultural autonomy and integrity of subject country.  अर्थात सर्वतोमुखी नुकसान पहुंचाना ही उपनिवेशवाद है।
इस विषय पर आगे बढ़ने से पूर्व भारत के संदर्भ में इसकी पृष्ठभूमि जान लेना आवश्यक है--
यह एक सच्चाई है कि एक दूर देश में जहां की आबोहवा से अंग्रेज़  एकदम अपरिचित थे उसपर शासन करना उनके लिए असंभव था। विश्व के एक शानदार भूभाग पर वे यहाँ पूर्ववर्ती आक्रमणकारियों की तरह बसने का इरादा भी लेकर नहीं आए थे। न तो कोई रिश्तेदारी करनी थी। व्यापार ही उनका प्रमुख उद्देश्य था ।  यद्यपि कि लालच वश उन्होने यहाँ थोड़ा-बहुत निवेश भी किया था, पर यह लंबे समय तक के शासन के लिए नाकाफी था। जड़ जमाने के लिए यहाँ की आबोहवा-भाषा-शिक्षा-रहन-सहन-कला-साहित्य से परिचित होना आवश्यक था और उनके शब्दकोष में इसकी अनिवार्य शर्तें पहले से ही मौजूद थी – धूर्तता,शोषण,विभाजन और हीनता बोध को बढ़ावा देना। बस इसका उपयोग करना था। वे एक कुशल रणनीतिकार की भांति बेहतर शासन-सुरक्षा और उसकी वैधता को जनता के बीच ले जाकर प्रचारित किया । आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सुधारों का एक मायाजाल फैलाया । इस प्रक्रिया में उनसे कुछ गलतियाँ भी हुई पर वे एक बड़ी घटना जिसे उन्होने थोड़ी परेशानी से ही सही, नियंत्रित कर लिया और लगभग 200 सालों तक शासन किया।
 गांधी की औपनिवेशिक शासन की व्याख्या और आलोचना पूर्ववर्तियों के विपरीत सांस्कृतिक थी।  वे कहते हैं –उनका आदर्श है अपनी व्यापारिक प्रभुता को बनाए रखना और इस आदर्श की प्राप्ति के लिए सभी नैतिक या अन्य आवश्यकताओं को तिलान्जलि दे देना। दरअसल वे यहाँ व्यापार के लिए आए थे।
प्रारम्भिक दिनों में अंग्रेजों ने खास तौर से विलियम जोन्स ने - यह स्वीकार किया कि भारतीय सभ्यता कभी महान हुआ करती थी । परंतु अपने लक्ष्य को देखते हुए जोन्स  ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ‘अपने दोषपूर्ण और निरंकुश शासन व्यवस्था के चलते उसमे आई जड़ता ने रचनात्मकता, अनिवार्य स्वतन्त्रता,उद्यमिता आदि को नष्ट कर दिया है। इसकी मुक्ति का एकमात्र उपाय यह है कि निरंकुश शासन को ‘सभ्य-समाज’ से स्थानापन्न करते हुए मनुष्य को उसकी चौहद्दी में जीवन सुरक्षा, दोष रहित और न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था’ ईमानदार और सक्षम प्रशासन को स्थापित किया जाय’।  इसके लिए अंग्रेजों ने बाकायदा यह जताया कि वे भारत के पुनरुत्थान की कोशिश कर रहे हैं। उन्नीसवी सदी के प्रारंभ में ‘उदारवाद’ विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ था और ब्रिटीशर्स इसे अपनी ‘विरासत’ के रूप में देख रहे थे। उन्होने इस विचारधारा को भारत में लागू करने का बीड़ा उठाया और यह कहते हुए इसकी वकालत की कि ‘भारत जो अब जड़ हो चुका है और यहाँ तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि का घोर अभाव है, को आगे बढ़ाने के लिए एक नई राज-व्यवस्था के साथ-2 तर्क आधारित नई चिंतन-पद्धति को अपनाना पड़ेगा’। ऐतिहासिक रूप से अपने को ‘तर्कपूर्ण शासन प्रणाली’ के एजेंट के रूप में देखने वाले ब्रिटीशर्स ने बहुत महीन तरीके से यहाँ की सामाजिक ताना-बाना,नैतिक व्यवस्था,सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को अंधविश्वासी और त्रुटिपूर्ण सिद्ध करने का प्रयास किया और काफी हद तक सफल रहे। यह उनके लिए जरूरी भी था। भारत जैसे विशाल देश पर केवल तलवार के बल पर शासन नहीं किया जा सकता था। इसलिए उन्होने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने और देशज लोगों के मन में हीन  ग्रंथि को विकसित करने के हर उपाय को आजमाने की कोशिश की। क्या यह सच नहीं है कि यदि भारतीयों ने उनकी अधिकांश चीजों को यथा-समान,संस्थान,मूल्य,आदतों आदि को श्रद्धा पूर्वक स्वीकार नहीं किया होता तो वे यहाँ ठहर सकते थे।  स्पष्ट था कि जब तक हम उनके सम्मोहन में थे या हैं भी, तब तक उनके भौतिक शासन के खत्म हो जाने के बाद भी हम उनके वैचारिक गुलाम थे भी और रहेंगे भी ।
एक बार जब ब्रिटिशर्स साभ्यतिक विमर्श को अपने विमर्श के केंद्र में लाने में सफल हुए तो फिर शिक्षा जगत पर उन्होने अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया। क्योंकि शासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करने के लिए यह सबसे बेहतर उपाय था। अब वे अपने लक्ष्यानुरूप जिन विषयों –जीवन मूल्य को प्रभावित करने,बुद्धि और चरित्र की नई परिभाषा गढ़ने, नई आदतों को मन में बैठाने –जैसी योजना को जनता के बीच स्थापित करना चाहते थे,उसके लिए प्रयास करने लगे । एक विद्वान ने इसकी सटीक व्याख्या की है- “जैसे ही ब्रिटिश शासन स्वयं को सभ्यता आधारित शब्दावली में न्यायोचित बताने लगी शैक्षणिक अन्योक्ति की विपुलता सामने आई. शासन ने यह पूरा उपक्रम प्रजा के भीतर नए जीवन मूल्य और विचार के सहारे नयी आदतें, धर्माचरण, और बौद्धिकता व चरित्र के नए गुण अंतर्निविष्ट करने के लिए सामने लाया। अब  वे सिर्फ अध्यापक नहीं, प्राध्यापक थे, केवल शास्रकार नहीं, शिक्षक थे; भारतीय लोग उनकी प्रजा नहीं, शिष्य थे; भारत एक बृहत राजकीय विद्यालय था जैसे कोई एकदम स्पष्ट ईटन स्कूल हो, किसी शैक्षणिक संस्था को सुशासित करने का एकमात्र विकल्प, जहाँ कानून दमन के लिए नहीं बल्कि अनुशासित अध्ययन के वातावरण को नियमित करने के लिए बनाये गए थे। शिक्षा प्रसार को लैंकस्टर और बेल द्वारा लोकप्रिय बनाये गए ‘मॉनिटोरियल’ पद्धति में संचालित होना था”।  उन्होने एक तानाशाही तरीके से शिक्षा-पद्धति को बिना दबाब में लाये इस तरह की स्थिति पैदा की कि भारत अब उनकी पद्धति को स्वीकार करने  के लिए मजबूर हो गया। ब्रिटेन को अब कुछ भारतीयों को प्रशिक्षित करना था जो अपने देशवासियों को उनकी भाषा में प्रशिक्षित कर सकता था।
अपने प्रारम्भिक दिनों में जब ब्रिटिश भारत में सभ्य समाज के निर्माण की अवधारणा से गुजर रहे थे तो उन्होने निरपेक्ष न्याय और निष्पक्ष प्रशासन को अपनी उपलब्धि के तौर पर न केवल सामने रखा अपितु राजनैतिक हदबंदी और सामाजिक परिवर्तन के औज़ार के रूप में प्रयोग किया। नए साभ्यतिक विमर्श में शिक्षण संस्थान सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक क्रियाशीलता के अखाड़े के रूप में उभरे ।(जो आज तक बदस्तूर जारी है। जो हमारी गुलाम मानसिकता के परिचायक हैं।) धीरे-2 यह आंग्ल-शिक्षा नैतिक और सामाजिक परिवर्तन के वाहक के रूप में सामने आई। अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त करना केवल एक भाषा सीखने तक ही सीमित नहीं थी अब वह आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तक पहुँच का माध्यम थी। और उससे भी आगे ‘भारत-बोध’ से कटने और अंग्रेजीदाँ बनना था। भारतीय भी अँग्रेजी सीखने में रुचि रखते थे। क्योंकि उनके लिए यह ‘वैश्विक-खिड़की’ खोल रही थी। गांधी भी इसके गुलाम हुए थे- When I first saw my room in victoria Hotel, I thought I could pass a life time in that room.।) तब लंदन दार्शनिकों/साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था। यद्यपि कि कुछ ही दिनों बाद उन्होने अपना विचार बदल दिया-“मैं स्वयं इसे देखकर पाश्चात्य सभ्यता से ऊब गया हूँ सड़क पर जोलोग मिलते हैं , वे उन्हें पागल जैसे दिखाई देते हैं”।
ब्रिटिश बहुत शातिर थे। वे शतरंज के मोहरों को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। जब उन्होने यह जान लिया कि हमारी श्रेष्ठता अब इनके सिर पर हावी हो चुकी है तो एक कदम और आगे बढ़ाते हुए चुनौती की मुद्रा में आ गए और कहा कि ‘भारतीय बताएं कि उनके पास क्या है जो वे ब्रिटिश को सीखा सकते हैं’? स्वाभाविक उत्तर तो ‘न’ में था । उन्होने ज़ोर देकर कहा कि ‘उनके पास वह सब कुछ है जिससे हिन्दुस्तानी कुछ सीख सकते हैं । हमें उनसे सीखने को कुछ भी नहीं है’। अब इसका जबाब तो सिर्फ जबानी जमा खर्च से नहीं दिया जा सकता था कि हमारे जीवन-मूल्य अलग हैं । अपितु उन्हें उनकी ही भाषा में और उसी स्तर-हैसियत-आत्मविश्वास से जबाब देना था। निरंकुश औपनिवेशिक विमर्श में सिर्फ मतभिन्नता कहना दोष पूर्ण कमी की ओर इशारा करती है।
शैक्षणिक विमर्श के इस मोड़ पर भारतीय अपने शासक की बराबरी केवल दो स्तरों पर कर सकते थे-पहला यह कि वे भी यह कहने का साहस कर सकें कि ‘उन्हे भी उनसे कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है’ और  दूसरे यह कि ‘उनके पास भी बहुत कुछ सिखाने को है’। यह इसलिए जरूरी था कि यह स्वीकार करना कि हमें आपसे सीखना है दरदरअसल उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार करना था। उस समय के हमारे पूर्वज जिनकी सत्यनिष्ठा और देशभक्ति पर तनिक भी संदेह नहीं किया जा सकता है वे भी कुछ हद तक इसे ‘क्षणिक’ उधार के रूप में देख रहे थे और यह मानकर चल रहे थे कि इस उधार को हम फिर लौटा देंगे। ‘संस्कृति के क्षेत्र में भी जब तक आयात-निर्यात बराबर न हो तब तक हमें नुकसान हो सकता है’ की भावना व्यापक और गहरे जड़ जमा चुकी थी। उस समय के बड़े नेता भी एक खास तरीके से इसे अपने लेखन में स्वीकार भी कर रहे थे। कुछ उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है -
We Bengalis are considered to be a people of no consequence compared to the great nation like the English. In comparison with the English, there is nothing praiseworthy in us. Nothing about us is commendable.(Bankim chandr )
If you want to become equal with the Englishman or the American, you will have to as well as to learn, and you have plenty yet to teach to the world for centuries to come. (Vivekanand)
1820 से लेकर 1920 तक के कथित हिन्दू नेताओं ने यह मत प्रकट किया कि उनके देशवासियों के भीतर नागरिक बोध और राजनैतिक संस्कृति का अभाव था। भारतीय मूलत: अपनी जाति और परिवार से अलग हटकर शायद ही सोचते हों। उनकी राजनीतिक समझदारी शिशु सुलभ थी। देशभक्ति और एकता उनके लिए दूर की कौड़ी थी। कुछ हद तक उनके अंदर जातीय एकता जरूर थी पर इसकी कोई राजनैतिक अभिव्यक्ति नहीं थी। लाला लाजपत राय ने लिखा है- Our countrymen sadly lack the spirit of patriotism that characteristics the citizen of every great and prosperous country in the world and consequently there is no end to our troubles.   और यह आजतक बदस्तूर जारी है। कुबेरनाथजी लिखते हैं-‘विगत तीन-चार हजार वर्षों से अविछिन्न चली आ रही एक विशेष चिंतन पद्धति के तहत भारतीय वांगमय लिखा गया,भारतीय समाज की संरचना हुई और विगत सौ-डेढ़ सौ वर्षों में उस वांगमय और उस समाज का अध्ययन विश्वविद्यालयों में उल्टी और पर्याप्त भिन्न चिंतन-पद्धति के आधार पर हो रहा है और वह भी एक विदेशी भाषा के माध्यम से। फल हुआ तरह-तरह की गलत फहमियां,चरित्र हनन और वहमपूर्ण फतवे। कुल मिलाकर एक अधूरी समझ और अँग्रेजी भाषा के ज्ञान के बल पर इस देश का भाग्य निर्णायक बना और अपने सौभाग्य का कटहल देश के सिर पर फोड़कर खा रहा है’।
अपने पूर्ववर्ती महापुरुषों की भांति गांधी भी अपने समय के भारतीय समाज की जड़ता/काहिलता से बहुत दुखी थे। खास तौर से हिन्दू समाज के। भारत जो कभी अपनी स्पंदनमान संस्कृति(vibrant culture) और समृद्ध-सभ्यता (Rich culture) के  कारण विश्वगुरु कहा जाता था, अपनी चमक खो रहा था । अब वह दया का पात्र बन चुका था ।  कभी वेद-उपनिषद और तर्क शास्त्र पर भरोसा  रखने वाला भारत अंधविश्वासों,रूढियों,जातियों,प्रतिबंधों,मुझे मत छूओ आदि  के भँवर में फंस चुका था।  उसका आत्मविश्वास हिल गया था। Gandhi knew that he could not attack the increasing domination of European civilization without also attacking the power and authority of its indigenous representatives and replacing them with authentic sons of the soil.
कुबेरनाथ जी लिखते हैं-- ‘भारत विश्व-अदालत में अपना मुकदमा लगातार हारता जा रहा था। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था उसके आत्मविश्वास का खोना । ठीक  ऐसे समय पर उसके त्राण के लिए विश्व-अदालत में चार वकील उसका पक्ष रखने के लिए सामने आते हैं-विवेकानंद,रवीन्द्रनाथ,आनंदकुमार स्वामी और गांधी । पहले ने उसकी दार्शनिक महिमा को सामने रखा,दूसरे ने साहित्यिक महिमा को,तीसरे ने कलात्मक गरिमा को और चौथे ने भारत की आत्मा को’।
अब जरा अंग्रेजों की चालाकी के इतिहास और उसके बरक्स गांधी के जबाब या उनके उपनिवेशवादी सोच के खिलाफ तथ्य परक जबाब के साथ-साथ आत्मविश्वास और अतिरेक (जो समय की आवश्यकता और रणनीति का हिस्सा थी) को भी देख लिया जाए ।
गांधी ने सबसे पहले एक कुशल सेनापति की तरह युद्ध-मैदान की तरफ ध्यान दिया और कहा कि यह जो औपनिवेशिक संघर्ष है वह भारत या यूरोप के बीच नहीं बल्कि प्राचीन और आधुनिकता के बीच है। इस साधारण से सूत्र के सहारे गांधी ने बढ़त हासिल कर ली । जहां उनकी सोच क्षेत्रीय बँटवारे अर्थात एशिया और यूरोप या पूरब और पश्चिम पर ज़ोर दे रही थी वहीं गांधी ने इसे समसामयिक संदर्भों के आलोक में मानवता के एकता के रूप में देखने  की कोशिश की। पूर्व के लोगों ने सिर्फ भारतीय सभ्यता की बात की थी जो एक भौगोलिक सीमा तक ही सीमित थी। उसकी सर्वव्यापकता संदिग्ध थी। लेकिन गांधी ने चतुराई-पूर्वक उस सभ्यता-संस्कृति की बात की जो सार्वभौम थी। यूरोपियन सभ्यता को ‘आधुनिक; कहकर गांधी ने काल और स्थान में न केवल बांटा बल्कि उसकी सार्वभौमिकता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हुए यह भी बता दिया कि तथाकथित श्रेष्ठता का दंभ पाश्चात्य सभ्यता का परिचायक न होकर एक छोटे से भाग तक सीमित है और इसके पास न तो ऐतिहासिक गहराई है न ही भौगोलिक व्यापकता है।
अपने इस कथन से गांधी ने दो निशाने साधे-एक तो उन्होने यह जताया कि यूरोपीय सभ्यता जिसके पास एक महान ऐतिहासिक विरासत थी वह खतरे में है। दूसरे अपने देशवासियों को भी यह समझाने में सफल रहे कि उनकी लड़ाई सिर्फ अपने लिए नहीं है अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए है। निराश जनता में आत्मविश्वास जगाने का यह जरूरी और साहसिक कदम था।
इसके बाद गांधी का रूप और बदल गया-वे कहते हैं-“पश्चिमी सभ्यता विनाशक है और पूर्वी सभ्यता विधायक है। .....  मैं मानता हूँ कि पश्चिमी सभ्यता का कोई लक्ष्य नहीं है और पूर्वी सभ्यता के सामने सदैव लक्ष्य रहा है। ...   आधुनिक सभ्‍यता मुख्‍य रूप में भौतिकतावादी है जब कि हमारी सभ्‍यता प्रधान रूप से आध्‍यात्मिक है। आधुनिक सभ्‍यता भौतिक नियमों की खोज में लगी हुई है और मानवीय प्रतिभा को उत्‍पादन और विनाश के साधनों की खोज में जुटाये हुए है, और हमारी सभ्‍यता मुख्‍य रूप से आध्‍यात्मिक नियमों की खोज में लगी हुई है।”
 एक-एक कर उन्होने जबाब देने की कोशिश की -“हिंदुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवन में कुछ फेर बदल कराए ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है,दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है,उसे हम क्यों बदलेंगे? बहुत से अक्ल देने वाले आते जाते रहते है पर हिंदुस्तान अडिग रहता है । यह उसकी खूबी,यह उसका लंगर है”। कल तक अंग्रेज़ जो कह रहे थे अब गांधी ने उन्हें उनकी भाषा में जबाब दिया-“हिंदुस्तान को कुछ भी सीखना बाकी नहीं है। यह बात ठीक है”।
“हजारो साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी वही चलती आई । हमने नाशकारक होड को समाज में जगह नहीं दी,सब अपना धंधा/कारीगरी करते रहे”।
“जब अंग्रेज़ हिंदुस्तान में नहीं थे तब हम एक राष्ट्र थे,हमारे विचार एक थे,हमारा रहन सहन एक था,तभी तो अंग्रेजों ने यहाँ एक राज्य कायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होने पैदा  किये”।
उपरोक्त बातें गांधी ने हवा में नहीं कहा था अपितु विचारों को अपने अनुभव की आंच में पकाकर और अपने पूर्ववर्ती विचारों को आत्मसात करके कहा है। रोमा रोला को लिखे पत्र में इसकी पुष्टि भी की है- “मैं अपने जीवन में जिन निर्णयों पर पहुंचा हूँ,उन्हें मैंने इतिहास से नहीं पाया-मेरे विचार चिंतनों पर इतिहास का प्रभाव बहुत थोड़ा ही है। मेरे कार्यप्रणाली की नींव अभिज्ञता पर है अर्थात मेरे सभी निर्णय अपनी व्यक्तिगत अभिज्ञता से प्राप्त हुए हैं”।
“मैं कहता हूं कि आज भारत पचास या सौ साल पहले की बनिस्बत ज्यादा निरक्षर है । इसका कारण यह है कि अंग्रेज प्रशासक जब भारत में आए तो यहां की चीजों को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करके आगे बढ़ने के बजाय उन्होंने उनका मूलोच्छेद करना शुरू किया। उन्होंने मिट्टी पलटकर जड़ देखना शुरू किया, लेकिन बाद में फिर उस जड़ पर मिट्टी नहीं डाली और नतीजा यह हुआ कि वह सुंदर वृक्ष (धर्मपाल) नष्ट हो गया। ग्राम्य पाठशालाए  ब्रिटिश प्रशासकों के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त अच्छी नहीं थीं और इसलिए वे एक नई योजना लेकर सामने आए। .......
अंग्रेजों की ही धरती पर उनसे कहा कि ‘इनको गोरों ने जान बूझकर बरबाद किया है’। वे बिना लाग-लपेट के कहते हैं-“....मैं इसे सच मानता हूँ कि अंग्रेजों ने भारत पर कोई परोपकार की भावना से अधिकार नहीं किया। उसमें उनका स्वार्थ था और उसमें अक्सर बेईमानी से काम लिया गया”, और सावधान भी किया -“ परंतु प्रकृति के नियमों को हम समझ नहीं पाते । वह अक्सर मनुष्य के किए-धरे को उलट देती है...।”
गांधी बार-बार कहते थे कि “मैं अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ खुली रखता हूँ ताकि हर प्रकार के विचार उसमें प्रवेश कर सकें किन्तु मेरा पैर अपनी धरती पर जमा हुआ है”।
दरअसल गांधी जीवन के हर क्षेत्र में ‘आधुनिकता’ और तथाकथित पश्चिम को चुनौती दे रहे थे । इसी संदर्भ मेन उनका ध्यान काला की तरफ गया और उन्होने लिखा- “कला के लिए कला मेरी समझ के बाहर है जो कला हमें आत्मदर्शन करना न सिखाये वह कला ही नहीं है। मेरा ध्येयय सदैव कल्याण का है,कला कल्याणकारी हो तभी मुझे स्वीकार्य है। मैं उसे यूरोप की दृष्टि से नहीं देख सकता।”
कला के क्षेत्र में एक बड़ा नाम कुमारस्वामी का है । यूरोपीय कला को चुनौती देते आनंद कुमारस्वामी  ने भारतीय कला पर बहुत महत्वपूर्ण किए हैं।यह उनहीन के श्रम का फल है कि ब्रिटेनिका विश्वकोश को अपने 14वें संस्करण में ‘भारतीय कला’ को एक विषय के रूप में स्वीकार करना पड़ा । कुमारस्वामी ही वह पहले व्यक्ति हैं जिंहोने सर्वप्रथम राजस्थानी और पहाड़ी कला का ठीक मूल्यांकन किया और भारतीय कला में आनंद और सौंदर्य का अक्षय भंडार खोज निकाला । उनके लिये ‘कला मन अथवा बुद्धि का कौतूहल मात्र  नहीं है । कला का सच्चा आसान इससे बहुत ऊंचा है और उतना ही अनिवार्य है जितना धर्म,अध्यात्म और दर्शन का’।
कुमारस्वामी  लिखते हैं-“आपको  अपने भारतीय  संस्कृति ,परम्परा, और  गौरव शाली  अतीत  को कभी  नहीं  भूलना  चाहिये । आपको  एक  राजदूत  की तरह  कार्य करना होगा और आप कही  भी जायेँ आपको भारतीय बनकर  ही  रहना  चाहिये।”
“My resistance to western civilization is really a resistance to its indiscriminate and thoughtless imitation based on the assumption that Asians are fit only to copy everything that comes from the west”.
Adaptability is not imitation. It means power of resistance and assimilation.
वे कहते हैं-“भारत के लिए यह खतरा है कि वह अपनी आत्मा को खो बैठे। उसे खोकर भारत जीवित नहीं रह सकता। इसलिए भारत को अकर्मण्य और असहाय बन कर बैठे रहना नहीं चाहिए। मेरे लिए परिश्रम के उन्मादपूर्ण प्रवाह से बचना कठिन हो रहा है। भारत को शक्तिशाली बनना होगा जिससे कि अपनी खातिर और दुनिया के लिए वह इसका प्रतिरोध कर सके” । गांधी इन सभी लड़ाइयों को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहें हैं।



                                        राजनारायणजी को पढ़ते हुए




आधुनिक भारतीय राजनीतिज्ञों में राजनारायणजी कई अर्थों में बेजोड़ हैं। वह स्वयं में ‘नाना पुराण निगमागम सम्मत’ राजनीतिज्ञ हैं । वैष्णव परिवार में जन्मे राजनारायणजी एक सनातनी हिन्दू की भांति सुबह-सबेरे ध्यान-धारणा के आग्रही थे तो दूसरी तरफ मूर्तिभंजक की तरह वर्जनाओं को तोड़ने का दम भी रखने वाले थे ।  
आज का समय बड़ा विचित्र है। आज जीवन के हर क्षेत्र में नैतिकता की धूरियां टूट रही हैं,राष्ट्र और धर्म की गठरी सरे राह बेची जा रही है । बुद्धिजीवी वर्ग अपने को सोलहो आने चापलूस सिद्ध करने में आकाश-पाताल एक किए जा रहा है। जीवन-जगत की पतन गाथा तो ‘टीवी सीरियल’ की भांति निरंतर ढलान पर है। शीलबोध,मूल्यबोध अब बीते जमाने की बात हो गई है। विचार गोष्ठियाँ भी अब पार्टी का झण्डा-डंडा बनकर रह गई हैं। ‘नई नैतिकता’ के नाम पर स्वैराचार और राजनीतिक अवसरवादिता अपने चरम पर है और जीवन का सर्वांग बनती  जा रही है ‘राजनीति’। कुबेरनाथ राय सही लिखते हैं- “संसद से लेकर सड़क तक तड़ातड़ लाठियां  भांजी जा रही हैं। किसी लाठी पर गांधी का नाम लिखा है तो किसी पर नेहरू का ।किसी पर अंबेडकर का नाम लिखा है तो किसी पर गोलवलकर का । और ये सब मिलकर एक मात्र जिस खोपड़ी को सनाथ कर रहीं है तो वह है भारतीय जनता”।
ऐसी विषम परिस्थिति में मनुष्य सदा ही अपने पूर्वजों की तरफ नजर उठा कर देखता रहा है। आज हम भी राजनारायणजी की तरफ इसी आशा भारी नजरों से द्खने की कोशिश कर रहें हैं कि शायद कोई सूत्र हाथ लग ही जाय।
वस्तुत: राजनारायणजी हमारे सामने दृढ़ता और संघर्षशील चरित्र का सूत्र प्रस्तुत करते हैं। उनका जीवन हमारे सामने ‘चरित्रगठन’ का एक आदर्श रूप प्रस्तुत करता है। उनका सम्पूर्ण जीवन हमारे सामने एक शक्ति-काव्य के रूप मे आता है। जो किसी भी प्रकार के ‘दैन्य-पलायन’ को जानता ही नहीं । ठीक गांधी की तरह। गांधी राजनारायण के ‘आइकन’ हैं। गांधी ने एक बार कहा था-‘मैं कब्र में भी जिंदा रहूँगा। और वहीं से आवाज लगाता रहूँगा’। राजनारायण भी कहते हैं-‘मैं मरूँगा नहीं और आखिरी सांस तक लोगों को झकझोरता रहूँगा । लोगों के मानस को–जब तक कि जन-जन स्थिरता का बनावटी मुखौटा अपने ऊपर से उतार कर फेंक न दे’।
राजनारायणजी का चिंतन फ़लक बहुत व्यापक था । जीवन-जगत में उनकी पैठ अद्भुत थी। प्राय: उनकी छवि ऐसी बना दी गई है जैसे कि वे केवल और केवल गाली-गलौज अथवा उठा-पटक करने वाले ही थे। कुछ किस्से भी उन पर बन गए। दरअसल हम सब राजनारायणजी के ‘रोष-वर्षा’ से ही परिचित हैं और प्राय: वही हमारी समझ की सीमा भी बन चुकी है। पर उनके ‘उपचार-बोध’ से जो उनके जीवन का केंद्रीय तत्व है, हम सब लगभग अपरिचित ही रहें हैं। यह ‘रोष-वर्षा’ उनके व्यक्तित्व का ऊपरी सतह है जो एक झटके में उनके बारे में निर्णय करा देती है।
सच तो यह है कि राजनारायणजी को पढ़ना अपने को समृद्ध करने जैसा लगता है। कुबेरनाथ राय ने कहीं लिखा है कि ‘मनुष्य अपना सर्वोत्तम लगभग 40 वर्ष की अवस्था तक दे जाता है। खींच तान कर आप इसे 45 -50 के बीच तक ले जा सकते हैं’। उनके इस कथन को इतिहास के तमाम श्रेष्ठ जनों की उपलब्धि पर नजर दौड़ाकर कोई भी सच्चाई जान सकता है। राजनारायणजी पर भी यह फार्मूला सटीक बैठता है । 1917 में जन्मे राजनारायणजी 1952-58 में विधान सभा में बतौर नेता-विपक्ष राष्ट्रीय समस्याओं पर जिस ‘सधे’ और हाँ-धर्मी तत्वों के साथ अपनी बात रखते हैं वह अनुकरणीय है। उनकी इस क्षमता का सटीक मूल्यांकन  करते हुए लोहिया ने कहा है-‘भविष्य की पीढ़ियों के पास राजनारायण को आजाद भारत के प्रारम्भिक वर्षों के सबसे सफल विधायक के रूप में याद करने की वजह होगी। .....जिसने जुबान से ज्यादा कर्म और उदाहरण के जरिये कमजोर तथा असहाय आदमी को अत्याचार का मुक़ाबला करना सिखाया’।
राजनारायणजी ने विधान सभा में दिये गए एक भाषण में एक मंत्री को लक्ष्य करते हुए कहते हैं-‘मैं उन्हीं के लिए ऋगवेद,मनुस्मृति और शुद्ध नीति का मनन करके कि सभासदों के क्या कर्तव्य होना चाहिए,राजा कैसा होना चाहिए ,राजा के दंड की क्या व्यवस्था होनी चाहिए ,  आपकी खिदमत मे पेश कर रहा हूँ। ऋगवेद सूत्र 23 मंत्र (12) में तो साफ -2 कहा गया है कि घमंडी,उग्र शासक अपनी प्रतिबुद्धि से यदि प्रजा का नाश करने में प्रवृत्त हो तो उसका विरोध करना प्रत्येक सभासद का कर्तव्य होना चाहिए’। पुन:  मनुस्मृति से सभासदों के कर्तव्य को उद्धृत करते हुए कहते हैं-‘ विधान निर्मात्री सभा में पहले तो आना ही नहीं चाहिए। प्रवेश करने पर न्याय पूर्ण ही बोलना चाहिए लेकिन जो लोग सभा में  जाते हैं,अन्याय होने पर बोलते नहीं या असत्य का पक्ष लेते है वे सभासद पापी हैं। सभा का अर्थ क्या है? ‘स’ और ‘भ’ के दो अक्षरों के जोड़ से सभा बना है। ‘स’ माने सहित और ‘भ’ का अर्थ ‘प्रकाश’ है। जहां से प्रकाश मिले जहां से न्याय मिले उसको सभा कहते हैं’ । तो यह दृष्टि है राजनारायणजी की ।  
राजनारायणजी को पढ़ते हुए हमें ‘क्षुरधार सजग दृष्टि’ मिलती है। उनके भाषणों में कथन या भंगिमा का चमत्कार नहीं दिखता  है। उनके भाषण तथ्य और तर्क से कसे होते हैं। आंकड़ों की प्रस्तुति में भी वे एक प्रगतिशील अर्थशास्त्री दिखते हैं -‘बहुत से अर्थशास्त्रियों ने 4 ‘एम्स’ क्रिएट किया है-मनी,मैन ,मैटीरियल और मैनेजमेंट’।राजनारायणजी ने इसमें ‘डिस्ट्रीब्यूशन’ को जोड़ा और कहा कि असली रेशनलाइजेशन के लिए यह जरूरी है। जब तक संपत्ति का ठीक-2 वितरण नहीं होगा तब तक कल्याणकारी राज्य एक शाब्दिक जाल ही रह जाएगा’।
भाषा के प्रयोग के स्तर पर भी राजनारायणजी बेहद सजग हैं। वे विधान सभा में ही ललकारते हैं –“जिन शब्दों का प्रयोग लोग कर रहे हैं मैं उनसे भी आगे जा सकता हूँ । पर मेरी अपनी मर्यादा है। शिक्षा मंत्री द्वारा ‘माल’ शब्द के प्रयोग को लेकर उनकी अपनी आपत्ति है-‘माल का भी बड़ा व्यापक अर्थ होता है। ....सौंदर्य के पदार्थ अक्सर गोप्य रखे जाते हैं.......  मैं उनसे निवेदन करूंगा कि शब्दों के साथ खेल न किया करें। शब्दों के साथ खेल करके बहुत अनर्थ किया जा चुका है। ऐसे शब्दों का प्रयोग न किए जाएँ जो कई अर्थों में प्रयुक्त होता है”।
राजनारायणजी निष्पक्षता और ईमानदारी को जीवन-ध्येय मानते हैं। उनका मानना है कि यह बहुत दूर तक साथ देती है।  वे कहते हैं-‘मैं सबसे ईमानदारी की बात कहना चाहता हूँ कि राजनीतिक ईमानदारी का परिचय हमको हर समय देना चाहिए। जो हमारा मत हो,जो हमारा सिद्धांत हो जिसको हम प्रतिपादित करना चाहते है, जो हमारा कार्यक्रम हो,उसको बिना किसी संकोच के हमको स्पष्ट कहना चाहिए’। यह दृष्टि उन्होने गांधी से पायी है। वे अक्सर उनको ‘कोट’ करते रहते हैं। गांधी को दक्षिण अफ्रीका में जूलू विद्रोह के समय सेवा-सुश्रुषा के चक्कर में अक्सर 40-40 मील की यात्रा करनी पड़ती थी। नेटाल के उस विशाल निर्जन क्षेत्र में घायलों की सेवा के समय प्रार्थना और आत्मविश्लेषण का सहारा लेते थे। इन्हीं दिनों ध्यान की गहन स्थिति में उन्हे भान हुआ कि सार्वजनिक सेवा के लिए पुत्रैष्णा और विषयेष्णा से मुक्त होना होगा। गांधी के इस सिद्धांत को राजनारायणजी ने सहज ही अपना सिद्धांत बना लिया था। वे कहते हैं- “ परिवार के सिद्धांतों के बारे में मैं गांधीजी के सिद्धांतों का अनुयायी रहा हूँ। यह सही है कि मैं अपनी संतति के लिए आदर्श पिता नहीं बन सका ,लेकिन राष्ट्र के सभी बच्चे मेरे बच्चे हैं,ऐसा मानकर मैं एक बड़ा बाप बन गया हूँ । घर-परिवार व समाज के स्वार्थ काफी हद तक परस्पर विरोधी होते हैं। ऐसी स्थिति में में परिवार से अलग रहकर समाज की सेवा की जा सकती है”।
राजनारायणजी  पर गांधी का प्रभाव चौतरफा है। स्वराज की उनकी परिभाषा भी गांधी से मिलती जुलती है--“इस देश में जो कि पूज्य बापू की पुण्य भूमि है, में सच्चा जनतंत्र तब है, जब स्वच्छ स्वराज्य हो-स्वराज्य का मतलब है खुद का  राज्य। यह तभी संभव है जबकि हर इंसान इतना पूर्ण हो कि वह अपने से किसी दूसरी ताकत को नियंत्रण करने के लिए अपने ऊपर न रखें। --जब मनुष्य विवशता से निकलकर स्वतंत्र वातावरण में  विचरण करे तब मैं समझता हूँ स्वराज्य होगा”।
आजादी के बाद के राजनेताओं में ऐसा चरित्र और साफ दृष्टि शायद ही कहीं देखने को मिले। उनका दिल सदा ही अभावग्रस्त और शोषितों के लिए  तड़पता रहता है। वे एक जगह कहते हैं - ‘बोर्जुआ  लीडर आफ अपोजीशन के अंदर थोड़ा सा नजाकतपन हो सकता है,साफ सुनहले-सुडौल शब्द हो सकते हैं मगर जिनका हृदय दुखित है,जिनका हृदय विदीर्ण है,जो रात दिन अभाव,भय और शोषण से परेशान हैं उनसे क्या आशा की जा सकती है’ । यह जो कथन है वह वस्तुत: गांधी ही उनसे कहला रहे हैं।  आजादी की लड़ाई जब चरम पर थी तब गुरुदेव रवीन्द्र ने गांधी को पत्र लिखते हुए कहा कि ‘एक व्यक्ति के चरखा चालाने से आजादी कैसे मिल सकती है। .गांधी उसका जबाब अत्यंत विनम्रता से देते है-वे कहते है।कि गुरुदेव जिन पक्षियों की बात कर रहें हैं वे कल रात भरपेट भोजन करने के बाद आराम किए हैं तब वे मुक्तगगन में उड़ते दिख रहें है। यहाँ तो उन्हे भोजन ही नहीं मिला है । उनके पंखों में रक्त संचार ही नहीं  हो रहा है जिससे वे अपने पंख खोल सके। न हो तो, कविवर! वीणा रख दीजिये । यह वीणा हम फिर कभी बजा लेंगे ।
राजनारायणजी की दृष्टि बड़ी पैनी थी। वे जब विधान सभा में खड़े होते हैं उनकी दृष्टि से शायद ही कोई ऐसा विषय होता था जिस पर उनकी नजर न  पड़ती हो। शिक्षा और गुरु दोनों के प्रति उनके मन में बेहद अनुराग है।  एक बार तबके मुख्यमन्त्री ने यह कहा कि ‘अध्यापक अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बात कैसे कह सकते हैं’? तब उनका उत्तर देखिये-‘क्या गुरुजन भूखे रहकर पढ़ाएँ या पेट काटकर पढ़ाये। जब उनका शरीर स्वस्थ रहेगा तभी उनका मस्तिष्क भी स्वस्थ रह सकता है’ तो यह हैं राजनारायणजी ।आज जब चौतरफा शिक्षा को लेकर ‘पंड-श्रम’ किया जा रहा है तब उनकी याद आनी स्वाभाविक है। आजादी के तुरंत बाद जब हम गांधी के नेतृत्व में सत्य-अहिंसा-अभय के त्रिक पर खड़ा होकर नैतिकता को जीवनोद्देश्य बना रहे थे तब भी शैतान सक्रिय था और उसने बनारस के संस्कृत विवि में अपना खेल कर दिया । पर गांधी-सपूत राजनारायण जिंदा था और विधान सभा में ही गरज पड़ता है- ‘संस्कृत कालेज विवि बनाने जा रहा है और वहाँ के प्रिंसिपल अनिवार्य योग्यता ही नहीं रखते हैं’। जरा तुलना कीजिये आज के कुलपतियों की योग्यता और चयन प्रक्रिया से। राजनारायणजी जी खुले तौर पर कहते हैं-विश्वविद्यालयों में सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।...उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिलनी ही चाहिए। पूरा हिंदुस्तान घूम जाइए विश्वविद्यालयों के कुलपति सहमें नजर आते हैं। कुर्सी बचाने के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हैं- टैंक  से लेकर तोप तक। किसी जमाने ने विवि में टैंक आने पर कहा था –‘आने दो मैं उसके सामने ही लेट जाऊंगा’।  
एक कालेज को विश्वविद्यालय का रूप दिया जा रहा था। राजनारायणजी ने इस कार्य का स्वागत करते हुए कहा-“मनुस्क्रिप्ट (पाण्डुलिपि) के लिए कोई रजिस्टर नहीं है। इसके लिए कैटेलाग बनाना चाहिए”। तो इतनी पैनी दृष्टि है राजनारायणजी की। वे ज़ोर देकर कहते हैं- “मैं चाहता हूँ कि  जिस तरह से शिक्षा संस्थाओं के निजी लाभ के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है, वह आगे न हो। सरकार ऐसी व्यवस्था करे जिससे शिक्षालयों में शिक्षा का काम हो और पार्टी पालिटिक्स का काम न हो” । लेकिन वर्षों से हो क्या रहा है? हमने तो शिक्षण संस्थानों को राजनीति का ही अखाड़ा बना लिया और परिणाम सामने है कि विश्व-स्तर पर हम कहीं नहीं ठहरते है। उन्होने ज़ोर देकर कहा था- “शिक्षा का उद्देश्य देशवासियों को सत्यं , शिवं और सुंदरम बनाना था। जो रास्ता सत्य का हो,शिव का हो और सुंदर हो,उस रास्ते की ओर ले जाने की जब शिक्षा सुनियोजित होगी तभी हमारे देश का निर्माण हो सकेगा”। और इसके लिए सबसे जरूरी चीज होती मस्तिष्क का संतुलित होना-“ मानसिक संतुलन जब तक ठीक नहीं होगा तो फिर देश नहीं बन सकता। देश को बनाने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि पहले देश की साइकालजी ठीक करें”।
 राजनारायणजी अपार साहस लेकर पैदा हुए थे। वे गांधी के प्रभाव में आकर अभय को साध चुके थे । तभी तो कहते हैं- “किसी देश की जनता की आवाज को वहाँ की पुलिस और फौज नहीं रोक सकती। अगर ब्रिटिश की फौज जनता की आवाज को दबा सकी होती तो आज भारत स्वतंत्र न होता। जनतंत्र की भावना जब बढ़ती है तो इस तरह की दकियानूसी सरकार उसमे जलाकर  खाक  हो जाती है”। नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है- ‘हमारी प्राचीन पुस्तकों में यह कहा गया था कि किसी आदमी या किसी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा उपहार है अभय— निर्भयता; सिर्फ शारीरिक हिम्मत ही नहीं, बल्कि दिमाग से डर का हट जाना. हमारे इतिहास के प्रभात में ही जनक और याज्ञवल्क्य ने कहा था कि जनता के नेताओं का काम जनता को निर्भय बनाना है......  चारों तरफ समाये हुए इस डर के खिलाफ ही गांधी की शांत, लेकिन दृढ़ आवाज़ उठी— “डरो मत!” और यह ‘डरो मत’ राजनारायन का मंत्र था।
अपने स्वभाव के बारे में एक जगह उन्होने कहा है--‘ मेरी  आदत ही कुछ ऐसी खराब है कि जो कुछ मैं जानता हूँ ,उसे छिपाना नहीं चाहता’। जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में उनकी अपनी राय है- ‘कम्युनिस्ट पार्टी को पनपने के लिए तीन ‘एफ’ हैं। ‘फियर, फ़्राड और फ्रस्टेशन’। इस परिभाषा से कोई सहमत हो या न हो । लेकिन जब जो मन में आया नेताजी ने कह दिया और आगे बढ़ गए।
आज जो हम भ्रष्टाचार रूपी पूतना को देख रहें हैं उसकी तरफ उन्होने 1952-53 में ही सरकार का ध्यान आकर्षित किया था- “हम चारों तरफ देखे, चाहे किसी विभाग को देखें,चारो तरफ करप्शन ही करप्शन दिखाता है”।  भविष्य का संकेत भी करते हैं-“जहां तक मेरी जानकारी है राजनीतिक और आर्थिक शोषण दोनों का अविछिन्न संबंध है। जिस मुल्क की जैसी आर्थिक व्यवस्था होगी वैसी ही राजनीतिक व्यवस्था होगी” । लगे हांथ उपचार भी बताते हैं-“पाँच मूल तंत्र होते हैं जनतंत्र में- 1)व्यक्ति का स्थान अलग,2)पार्टी का स्थान अलग,3)स्टेट का स्थान अलग और 4)सोसाइटी का स्थान अलग। कोई भी दो मिलकर जनतंत्र का नुकसान ही करती हैं”।  हम अपने अनुभव से जानते हैं कि आज जो समाज में चौतरफा गिरावट आई है उनके मूल में किन्हीं दो या तीन का मिलना ही है। विधान सभा उनका दर्द छलक पड़ता है-“जो ढांचा जो नक्शा अंग्रेज़ यहाँ छोड़कर गया था उसको तोड़कर क्या कोई नई जिंदगी पैदा की जा रही है ? नई जिंदगी नहीं पैदा की जा रही है,बल्कि पुरानी शराब को किसी नई बोतल में रखकर नई जिंदगी बनाने का का स्वप्न देख रहे हैं जो हो ही नहीं सकता”।  
राजनारायणजी का व्यंग्य भी अद्भुत होता था- शतबुद्धि: शिरस्यों$यं,लंबते छ सहस्त्रधी: / एक बुद्धि रहं भदरे?क्रीड़ामि विमले जले// ‘यानि एक बुद्धि से काम हो तो वह ठीक हो सकता है लेकिन माननीय मंत्रीजी तो अपने सिर पर शतबुद्धि लिए हुई हैं। मालूम होता है कि हजारों बुद्धि लटकाये चलते हैं’।  
एक और व्यंग्य मिश्रित तथ्य देखिये-“मैं इतिहास से यह उदाहरण दे सकता हूँ कि जब-जब साधुता के द्वारा या दानी या भिखारी बनाकर लोग सियासत में आए,तब तब मामला गड़बड़ हुआ। रावण ने भी भिखारी बनाकर सीता का हरण किया था। कर्ण को दानी बनाकर उसका कवच हरण कर लिया गया । विष्णु ने भिखारी बनाकर तीन कदमो में सारे विश्व को नाप लिया”। 
राजनारायणजी की सामाजिक चेतना अद्भुत है जिसमें अतीत,वर्तमान और भविष्य ये तीनों ही स्मृति अनुभव-सत्य और आकांक्षा के रूप में उपस्थित हैं। अपनी सर्जक दृष्टि में उन्होने ‘शास्त्रों के गंभीर आलोड़न’ और ‘अनभैं साँचा’ दोनों को समान स्थान दिया है। उनका सर्जक व्यक्तित्व जड़ से जुड़ा हुआ है। परंपरा को समझने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है। केवल ‘आउटसाइडर’ अर्थात अजनबी दृष्टि से इसे नहीं पहचाना जा सकता है। इसे ‘इनसाइडर’ दृष्टि के बल पर ही उन्होने परंपरा और इतिहास के मर्म को पहचाना और तदनुसार अपने व्यक्तित्व की निर्मिति की। इसी बिना पर हम उनके जीवन में तमाम ‘शबरी और निषाद प्रसंग’ के उदाहरण देख पाते हैं-वह घर से विद्रोह हो या मंदिर में हरिजन प्रवेश हो। हर जगह राजनारायणजी का व्यक्तित्व निखर कर सामने आया है। वे गांधी का उदाहरण भी देते हैं-“पूज्य बापूजी भी पुरानी संस्कृति परम्पराओं और गौरव और पाठ पढ़ाते रहते थे और नवीन मान्यताओं से उनको वजनी बनाते रहते थे”।
आरक्षण जैसे विवादित मुद्दे पर उनका विचार है- एस सी आज शिक्षित नहीं है।,पिछड़ी हुई हैं, जाति और सामाजिक विभिन्नताएँ भी हैं,सामाजिक डाँड-मेड़ है। ...वरना किसी जाति के आधार पर किसी के लिए सीट सुरक्षित करना शोभनीय नहीं है”।  आज जब चारो तरफ सरकारी आवास योजना को लेकर वाहवाही लूटी जा रही है उसकी तरफ आजादी के तुरंत बाद ही उन्होने कहा था-“कितने आदमी इतने गरीब हैं जो रहने के लिय घर नहीं बना पाते वे सड़कों की पटरियों पर सो जाते हैं। उनके लिए कोई कोआपरेटिव स्कीम चलायी जाए”।
‘गोवध-गो हत्या’ जैसे मुद्दे पर बोलते हुई तब के जमाने के हिसाब से उन्होने एक मुकम्मल प्रस्ताव रखा था- उत्तम नस्लों के सांड, खेती को मुनाफ़ादायक बनाने पर ज़ोर दिया था। सांप्रदायिकता और जातिवाद के खिलाफ खुलकर  न केवल लड़ते थे अपितु सरकार को घेरने का हर उपाय करते थे। देश के प्रति उनकी चिंता अद्भुत है। जनसंख्या वृद्धि और उसके उपाय पर भी राजनारायणजी ने अपनी बात बहुत गंभीरता से रखी है। जिन बातों को लेकर आज ‘पैडमैन’ जैसी फिल्में बनाई जा रहीं हैं या सोसल मीडिया से लेकर व्हाटसैप यूनिवर्सिटी पर चर्चा हो रही है उस पर नेताजी ने बहुत पहले ही ध्यान दिलाया था –“भारत वर्ष में प्रत्येक मनुष्य पति-पत्नी का संबंध रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इसे सेफ पीरियड कहते है। इस ‘सेफ पीरियड’ पर भी चर्चा होनी चाहिए”।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसे मनीषी और शिक्षित जनता के बीच एक अपरिचय की स्थिति बनी हुई है । इस अपरिचय की स्थिति को तोड़ने का सर्वाधिक उत्तम उपाय है विमर्श और अध्ययन । आज की पीढ़ी क्या यह करने को तैयार है ?उम्मीद तो यही  है कि भावी पीढ़ियों द्वारा  निश्चित रूप से उनको लेकर कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए जाएँगे।


Thursday, October 19, 2017

लोहियावादी-समाजवाद का जातिवादी आदर्श

आदरणीय डॉ साहब
नमस्कार

यह पत्र इसलिए लिखना पड़ रहा है कि आपने एसएमएस द्वारा कई लोगों से यह बात साझा की है कि ‘संस्था और सबके भले के लिए अपनी सीमा भर कोशिश की और विवि से (आप) संतोष पूर्वक घर लौट रहें हैं’। आपने यह एसएमएस उनसे भी साझा किया जिसके खिलाफ आपने स्वयं साजिश करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी । मैंने जब आपका एसएमएस पढ़ा तो मुफ़लर/गमछा डाले सूर्योदय होने के बाद आपके टहलते-खिलखिलाते ‘सुमधुर-यात्रा’ की यादे ताजा हो गई। संस्था के प्रति आपकी ईमानदारी का तो मैं भी कायल हूँ। संस्था की भलाई के लिए ही आपने विवि के खर्च पर सात समुद्र पार मारीशस-यात्रा का खतरा मोल लिया था । गोजर-बिच्छू,साँप-नेवला के लजीज भोज्य-पदार्थ के आग्रही देश चीन की भी यात्रा आपने की । वरना वहाँ कौन जाना चाहेगा ? लेकिन खतरा मोल लेकर भी विवि हित में आपने यह सब किया । आपकी यात्रा के पूर्व में तो कुछ लोगों ने मस्ती के लिए यात्रा की थी । पर  आपकी यात्रा तो  संस्था और राष्ट्र-भक्ति से भरपूर थी । जहां तक मुझे याद आ रहा है विवि में आगमन के कुछ ही दिनों बाद अपने छ्ठी इंद्रिय के कमाल से आपने यह जान लिया था कि एक ‘जाति विशेष’ के लोग इस विवि को ‘डिस्टर्ब’ करना चाहते हैं । इस विचार को  आपने अपनी ही जाति के एक अध्यापक से यह बात साझा की थी । (जबकि मगहर से आप त्याग-तपस्या करने आये थे) वो बिचारे ठहरे ‘सेकुलर’ जातिवादी । उनके पेट का गैस उबाल मारने लगा और उन्होने तुरंत मुझ जैसे जातिवादी व्यक्ति से इस बात की चर्चा की। उस दिन वे तनाव में थे। मैंने उनसे कहा-‘महाराज! यह तो बड़ी अच्छी बात कही है उन्होने । डॉ साहब तो मगहर से यहाँ इस विवि को ‘शांति’ का ही पाठ पढ़ाने आयें हैं । साहित्य की तो यही सही परिभाषा है । मैंने अपने  मित्र से कहा कि “ महाराज ,वहाँ उन्होने जाति विशेष के ‘चरणों’ में बैठकर वर्षों तक अपने को ‘जातीय लौह-कवच’ में संस्कारित किया है । तभी तो वे शिक्षाविद बनने के लिए  एक तरफ ‘व्योम’ मिश्र का  शिष्यत्व स्वीकार किया तो दूसरी तरफ राजनीति के क्षेत्र में ‘ज्ञानेश्वर’ मिश्र की चरण-वंदना की । दीनदयाल विवि के ‘शंकर’ ने अपने कंधे से राजनीति का झोला उतारकर इनके कंधे पर रखा था । ये तो बस अपने आचरण में उसे उतार रहे हैं” । मैंने उनसे कहा कि आप परेशान न हों । वैसे भी डॉ साहब धुरंधरों के बीच रहते हुए जातियों के गुण दोष को ठीक तरीके से समझते होंगे तभी ऐसा कहा होगा । डॉ साहब आप तो साहित्य के आचार्य हैं ।(हालांकि कुछ लोगों को लगता है कि आप आचार्य नहीं है। वे मूर्ख हैं। ब्राह्मण तो पैदाइशी आचार्य होता है। यूजीसी का नियम ब्राह्मणों पर लागू ही नहीं होता है) आप तो अमित-अनंत ज्ञान में डुबकी के बाद जातीय मणि-रत्न को लेकर  ही रामगढ-ताल से निकले हैं। फलस्वरूप अवसर मिलते ही आपने गुरु दक्षिणा स्वरूप ‘अ’ प्रमेय को ‘इतिसिद्धम’ तक पहुंचा दिया।  
            डॉ साहब आपको मंच से सुनना लोगों को कर्णप्रिय (?) लगता था। हमारे एक जानने वाले तो आपके भाषणों पर फिदा ही रहते थे। आपके मंच पर चढ़ते ही वे कहते थे कि अब देखो ! इस विषय पर गुरुजी चार घंटा बोलेंगे। यद्यपि कि एक बार भी आपको चार घंटा बोलने का अवसर नहीं मिल पाया। फिर भी किस्सागोई और स्वय हंसने-मुस्कराने की कला यह बता देती थी कि वक्त मिलता तो आप अवश्य ही शिष्य की बात को सच कर देते। वर्धा में आपका जातिगत राजनीति  का ‘अनुभव’ भी गाँव के ‘चौधरी’ के रूप में विकसित हुआ। आपने  अपने इलाके के जातीय-विद्वानों की विवि में झड़ी लगा दी । ‘अहो रूपं अहो ध्वनि’ की अनुगूँज से हिन्दी विवि भी वाह-वाह कर उठा । आपने ‘शंकर’ पर जरा सी ‘कृपा’ क्या की, कि तुरंत कोलकाता से आपको बुलावा भी आया (वरना किसी  जमाने  में ‘अहोम’ शासकों के राज्य में ‘शोध-जजमानी’ के लिए आप वर्षों तक छटपटाते रहे हैं)। सर आशुतोष मुखर्जी के शहर में आपने जब यह रहस्योद्घाटन किया कि ‘अंधेरा इतना पसरा हुआ है कि सच इसमें कहीं खो गया है’, तब वहाँ मुझे मुक्तिबोध का ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ अपनी संपूर्णता में उपस्थित होता दिखा । विवि की कार्य परिषद की बैठक में (जिसके आप भी मानद सदस्य थे) जब आपने अपनी जाति के एक नव नियुक्त सदस्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होते हुए देखा तो झूठ की झोली आपने वहीं पसार दी और कहा कि ‘नहीं ! यह बात गलत है । वे इस विवि में नहीं पढ़ाते हैं’। आपके इस आप्त वचन के बाद तो कार्य परिषद के कई सदस्य चाहकर भी ‘सच’ को बोल नहीं पाये। क्योंकि ‘झूठ’ ने अपना पाँव इतना लंबा कर लिया था कि ‘सच’ ने वहाँ से अपनी जान बचाकर भागने में ही भलाई समझी । ‘सच’ रूआँसे मन से वहाँ निकल भागा । मैंने स्वयं अपनी आँखों से उसे विद्यापीठ से रोते हुए निकलते देखा। एक बार मन हुआ कि उसे पुकारूँ लेकिन गला ही रुद्ध हो गया मेरा। आखिर मैं भी तो जातीय-दंश से पीड़ित ही हूँ न !
       अब देखिये न! जब से आप विवि में आए थे आपकी जाति-विशेष ने इतनी खूबसूरती से अपना पाँव पसार लिया कि किसी को पता ही नहीं चला। त्वरित टिप्पणी और तीसरी आँख लेकर पैदा हुए सोशल मीडिया तक को आपने भनक नहीं लगने दी। ‘कबीर’ के मगहर से जिस जाति की ‘चदरिया’ को लेकर आप वहाँ से आये थे उसे आपने यहाँ ‘ज्यों का त्यों’ धर दिया। ऊपर नभ-मण्डल में देवताओं ने भी साधु-साधु कहकर पुष्प वर्षा की। वर्धा का पंचटीला जातीय फूलों की गंध से मंह-मंह सुगंधित हो उठा। हालांकि महात्मा गांधी को विवि के ‘गांधी हिल्स’ से अपनी  लकुटिया के साथ चुपके से निकलते हुए मैंने देख लिया था । मैंने उन्हें आवाज भी दिया । पर उन्होने अपनी उसी पुराने अंदाज में होंठों पर तर्जनी रखकर चुप रहने का इशारा किया और  आगे बढ़ गये ।
 लोग कहते हैं कि गीता में जन्म से नहीं कर्म से जाति/वर्ण के निर्धारण होने की बात कही गयी है। लेकिन असली व्याख्या आपने अपने पुरुषार्थ से दिया कि जाति/वर्ण का निर्धारण कर्म नहीं जाति ही होती है। मगहर से लेकर सेवाग्राम तक की बेधड़क यात्रा से आपने इसे सिद्ध भी कर दिया है। अब कुछ लोग इसके खिलाफ पिपीहरी बजाएँ तो बजाते रहें। वर्धा में काम करते हुए भी आपकी ‘अर्जुन-आंखे’ मगहर विवि की तरफ ही लगी रही। क्योंकि वहाँ भी बीज(क) को बोना था। अध्यक्ष पद पर ज्योही एक जाति विशेष के बैठने की बारी आयी आपने आनन-फानन(?) में लौटने का फैसला ले लिया । मगहर विवि में होने वाली नियुक्तियों में आपके रहते दूसरे लोग हाथ बँटाले यह कैसे हो सकता है? आपने दुखी(?) मन से जाने का फैसला ले लिया । मजे की बात यह कि कई लोगो से आप अलग-अलग मिले और सभी से आपने  यह कहा कि ‘मै जा रहा हूँ । पर यह बात मैंने सिर्फ आपसे ही कहा है’। सभी अपना कालर उंचा कर रहे थे कि वे ही सबसे करीबी हैं आपके। लेकिन सच्चाई तो सिर्फ आप और हम जानते हैं। है न! भला अपनी जाति के बाहर किसी को करीबी समझा जाता है? जाति ही क्यों? अवसर पड़ने पर अपनी जाति को भी पटकनी देने में आपकी कोई शानी नहीं है। अब देखिये न! कुछ कर्मचारियों के मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाने में कई लोगों ने जमकर रगड घिस्स किया था ।  यह तो हम  सब  जानते हैं कि विवि के किसी भी नीति-निर्णय पर अंतिम मुहर कुलगुरु ही लगाते है। पर एक ब्राह्मण मनोवैज्ञानिक के नीचे से इस तरीके से आपने दरी खींच ली कि अगले को पता नहीं चला और सारा श्रेय स्वयं लेकर मगहर को चले गये। वरना सम कुलगुरु तो कुलगुरु  का छाया मात्र ही होता है। विवि के एक भव्य भवन के निचले तल के बरामदे में आपने एक अध्यापक से कितनी व्यावहारिक बात कही थी निजी स्वार्थ  को लेकर । जब  अपने यह कहा कि ये (कुलगुरु) तो अपना झोला उठाएंगे और कहीं निकल लेंगे । पर मेरा क्या होगा? मेरी तो  आंख  खुली की खुली  ही रह  गयी। उस  दिन हमने आपसे जाना कि आप तो  विवि और कुलगुरु के प्रति तो आप कभी ईमानदार ही नहीं थे। यही तो हमारी जातिवादी राजनीति की खासियत है।  मेरा भी सीना ‘छप्पन  इंच’  का  हो  गया।
 कबीर दास ने जात-पांत के खिलाफ भाषण चाहे जितना दिये हों, उन्हें भी हमारे पूर्वजों  ने मौका मिलते ही विधवा-ब्राहमणी के गर्भ का ही सिद्ध कर दिया । प्राइमरी से लेकर विवि तक यही गाथा पढ़ाई जा रही है। दूसरे किसी जाति के गर्भ से पैदा हुए होते तो न जाने किन-2 विशेषणों से नवाजे जाते। भोजपुरी क्षेत्र का होने के नाते आप खूब समझ रहें होंगे। परिणाम स्वरूप आजतक पता नहीं कितने अपने जाति के लोग ‘कबीर-लेड़ी’ से बाबा रामदेव की तरह चूरन-पंजीरी बाँट रहे हैं और दुकान चल भी रही है। इधर उत्तम अग्रवाल टाइप कुछ लोग कबीर को ‘वैश्य’ बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। पर सफल नहीं हो पाएंगे । अब दो हजारी द्विवेदी ने जिस पर अपना कलम चला दिया हो उस पर बनिए-बक्काड़ क्या कलम चलाएँगे?
असल बात जो यह है कि ‘सारे भारत में नैतिकता और सच्चाई आज जाति सापेक्ष हो गई है’, बहुत कम लोग ही समझ आते हैं। इस देश के अंदर,एक विशिष्ट वर्ग के अंदर ‘उदात्त व्यक्तित्व’ की प्रतिष्ठा हुई है और वे व्यक्तित्व बहुआयामी हैं। इसमे अरुंधति राय जैसी कुछ अराजक-प्रबुद्ध भी हैं जो इस बात को समझते हैं । उसने कहीं कहा है कि ‘संघ भी राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवाद ही करता है’। दरअसल ये वो सिरफिरे हैं जो भारत की तासीर को नहीं समझते हैं और इस तरह का वक्तव्य देते रहते हैं। ढाई हजार वर्षों से इस तरह के विरोध के हमलोग आदी हो चुके हैं । क्या कर लिया लोगों ने विरोध करके? आज भी अपने गाँव में जो सूप-सूपेली बीनने वाला ‘डोम’ है, वह दक्षिण दिशा के दुर्गंध युक्त वातावरण में खौरहे कुत्ते और सूअरों के बीच ही अपना जीवन–यापन कर रहा है । और हम लोग देखते ही देखते 21 वीं सदी में‘मंगल’ पर जाने की तैयारी कर चुके  हैं । वे ही क्यों ? अन्य जातियाँ भी मालिक और बाबा कहकर आशीर्वाद लेने तो आती ही हैं। बड़ी खूबसूरती से हमारे पूर्वजों ने ‘इस जन्म में सेवा करो अगले जन्म में मेवा मिलेगा’ का जन्म से लेकर मरण तक ऐसा लौह-चक्रव्यूह बनाया है कि ‘फ्रायड-युंग-एडलर’ की तिकड़ी भी इसे नहीं तोड़ पा रही है।
जातीय महीरुह कितनी महत्वपूर्ण होते हैं इसे आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार के चयन कर्ताओं में आप भी एक सदस्य हैं। तिवारी जो आपके वरिष्ठ सहयोगी रहे हैं ,यदि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष न रहते तो आप कैसे वहाँ रहते? हिन्दी विवि में भी आगमन तो इसी महीरूहों के ही शाखा-सूत्रों के ही माध्यम से हुआ था। आपके ही शहर के एक बड़े विद्वान ‘त्रिपाठीजी’ ने एक दिन दूरभाष पर मुझसे बड़ी ही मासूमियत से पूछा कि ‘डॉ साहब विवि क्यो छोड़कर चले गए? मैंने उनसे कहा कि वे संभवत: अध्यक्ष बनने के लिए गए हैं। वे इससे संतुष्ट नहीं हुए। हालांकि सच्चाई उनको पता रही होगी। पर वे मुझसे कुछ और जानना चाह रहे होंगे। पर अपन भी जातीय खेल का पुराना खिलाड़ी है। ‘गूगली’ को ‘गली’ से निकाल दिया।  
आपने एक और महत्वपूर्ण कार्य इस विवि में किया है जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। वह है मित्रता की परिभाषा । ज्ञान के प्रमुख स्रोत तो ब्राह्मण ही रहे हैं। मित्रता का जो नया पैमाना आपने बनाया है उस पर हम सब सौ-सौ बार फिदा हैं। हों भी क्यों न? सिंह एक ही साथ तिवारी- शुक्ला और राय दोनों के मित्र कैसे हो सकते हैं? आपके इस मासूमियत भरे सवाल और उसके पीछे के तर्क पर ‘विश्वामित्र की संतान’ के होश ही उड़ गये। अब तो आपके इस ‘कृष्ण’ ज्ञान पर ‘शिरीष’ के फूल भी उग आए हैं। विवि में आकर आपने जातिवाद का जो नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ा है, वह सचमुच काबिले तारीफ है । भारत के बारे में डा लोहिया ने एक बार कहा था- ‘भारत’ एक ‘आइडिया है,एक‘शिवोहम’ जैसी आइडिया’ । आप तो दुनियाँ की नजर में  लोहियावादी ही हैं। लोहिया के इस विचार को भी किस तरह से जाति की तरफ मोड़ा जा सकता है इसकी कला हमलोगों ने आपसे सीखी है। अब कोई ‘माई का लाल’ ऐसा नहीं है जिसे हम लोग आपके ज्ञान-सहयोग से धूल न चटा दें। वर्धा प्रवास के दौरान आपके द्वारा लोहियावादी-समाजवादी जातिवाद के ‘इनोवेटिव’ ज्ञान से हम सब बहुत लाभान्वित हुए ,इसके लिए आपका बार-2 आभार ।
खैर! पत्र लंबा हो गया। त्रुटि को सुधार कर पढ़िएगा । आपके जाने के बाद मन बड़ा दुखी-दुखी सा रहता है। यहां की तो दीमकें भी फूट-फूट कर रोईं थी । हम सबके मन में एक ही सवाल कौंधता है –हाय!अब हमलोगों का कौन मार्गदर्शन करेगा? पता नहीं किस बेवकूफ ने लिखा है-अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे /तोड़ने ही होंगे मठ और  गढ़ सब   ..... खतरा तो हम लोग आपके साथ मिलकर उठाते थे। खैर! आप अपने मिशन में वहाँ भी सफल हों। यही मेरी शुभकामना है। कभी अवसर मिले तो जरूर  इधर आइएगा । हम सबको आपका इंतजार रहेगा ।
आपका अपना ही
चिन्मय भारत