Thursday, September 15, 2016

शेरपुर : क्रांतिकारियों की तीर्थस्थली
(18 अगस्त 1942 के संदर्भ में)
मनोज कुमार राय
          उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल का आजादी की लड़ाई में बड़ा योगदान रहा है। सन् 1942 की अगस्त क्रांति के इतिहास में महाराष्ट्र में सतारा, बंगाल में मिदनापुर और उत्तर प्रदेश में बलिया तथा गाजीपुर का नाम आदर के साथ लिया जाता है। कहते हैं कि राजा गाधि के नाम पर ही गाजीपुर जिले का नाम पड़ा है । इसी जिले का एक गाँव शेरपुर है। गंगा किनारे बसा  विशाल आबादी वाला यह गाँव अपने मनमौजीपन और पहलवानी के लिए विख्यात रहा है। किंवदंती के अनुसार इस गाँव के लोग शेर और वनसुअरों के साथ भी दो-दो हाथ करने से नहीं चूकते थे। मुख्यत: किसानी पर निर्भर इस गाँव के लोगों को तितिक्षा और धैर्य घुट्टी में मिली है। यह गाँव आज भी अपने क्रोड़ में एक उज्ज्वल अतीत की उदात्त परम्परा को संजोये हुए है ।1857 से लेकर 1947 तक भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में इस गाँव का योगदान उल्लेखनीय रहा है।
स्‍वतंत्रता के सिवाय कुछ भी नही और करो या मरो का मंत्र जब गांधी ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ऐतिहासक भाषण में दिया तो अगले दिन पूरे देश में यह जंगल के आग की तरह फैल गया । गांधी ने उस भाषण में कहा था -सत्‍याग्रह में धोखे, जालसाजी या किसी प्रकार के झूठ के लिए जगह नहीं है। मैं पूर्ण स्‍वतंत्रता के सिवाय किसी चीज से संतुष्‍ट होनेवाला भी नहीं। .....  यह एक छोटा सा मंत्र मैं आपको देता हूँ। आप इसे अपने हृदय पटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्वांस के साथ उसका जप किया कीजिए । एक मंत्र है : करो या मरो। डेढ़ हजार किमी की दूरी पर स्थित यह गाँव जैसे उनके इसी मंत्र का इंतजार कर रहा था। शेरपुर के लोगों ने इस मंत्र को सचमुच में अपने हृदय पटल पर अंकित कर लिया था ।
 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान अंग्रेजों भारत छोड़ो पर देश के कोने-कोने से लोग स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने के लिए आगे आ रहे थे। शेरपुर गाँव भला इसमें कब पीछे रहता। डा शिवपूजन राय जो एक प्रतिष्ठित भूमिहार (आर्य) परिवार से आते थे, ने इस अलख को गाँव के जन-जन तक पहुंचा दिया । कुशाग्र और मेधावी डा शिवपूजन राय  के इस अभियान में उनका साथ दिया शेरपुर के ही एक नौजवान श्री सीताराम राय ने जो उस वक्त काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक (अर्थशास्त्र)की पढ़ाई कर रहे थे। विश्वविद्यालय में भी भारत-छोड़ो का नारा गूंज रहा था। उस समय वहाँ के कुलपति डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे । विद्यार्थियों के प्रति उनके मन में अपार  स्नेह था। विदेशी शासन में भी समय आने पर वे विद्यार्थियों के साथ खड़े हुए और पुलिस को परिसर में घुसने से मना कर दिया। उनके इस व्यक्तित्व से वहाँ के विद्यार्थी बहुत प्रभावित थे। श्री सीताराम राय जी जिनकी अवस्था करीब 19 वर्ष थी ब्रोचा छात्रावास के अंतेवासी थे। वे वहाँ से असबाब-समान लेकर क्रांति की ज्योति जगाने गाँव आ गए । डा राय के नेतृत्व में गाँव में उत्साह चरम पर था। जवानों की टोली गाँव-गाँव घूम रही थी। अंतत: यह तय हुआ कि मुहम्मदाबाद स्थित तहसील पर तिरंगा फहराकर आजादी की घोषणा की जाय। उन दिनों गुलामी के बेड़ियों को उतार फेंकने का यह बड़ा प्रतीक मान जाता था। शेरपुर गाँव मुहम्मदाबाद तहसील से लगभग आठ किमी पूरब में स्थित है। बारिश का मौसम था। नदी भी अपने उफान पर थी। 18 अगस्त 1942 को शेरपुर गांव के नवयुवक देश को आजाद कराने की ललक अपने दिलों में संजोये मुहम्मदाबाद तहसील  की  ओर चल पड़े। उनके पीछे हजारों की संख्या में पूरा गांव उमड़ पड़ा। कुछ लोग तहसील पर शीघ्र पहुँचने की फिराक में खेत-खलिहान के रास्ते चल दिये। बाढ़ ने उनके रास्ते में बाधा पैदा की । पर आजादी का जोश  भला  बाधा को कैसे स्वीकार करने लगा। सदियों से हिन्दुस्तानी किसान और नदी सहजीवी रहे हैं। वे लोग भागड़ और खेत में तैरते-कूदते-फाँदते अंतत: बड़की बारी तक पहुँच गए। वहीं पर डा शिवपूजन राय ने एक बैठक की और अपनी योजना बतायी। गांधी ने महज दस दिन पूर्व ही अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था-“लेकिन कोई भी काम गुप्‍त रुप से नहीं करना चाहिए। यह एक खुली बगावत है। इस संघर्ष में गुप्‍त रुप से काम करना पाप है। स्‍वतंत्र आदमी किसी गुप्‍त आदोलन में शामिल नहीं होता। लेकिन वर्तमान संघर्ष में हमें खुल्‍लम खुल्‍ला कार्यवाही करनी है और अपनी छाती पर गोलियां खानी हैं और भागना नहीं है।” डा साहब तो पक्के गांधीवादी थे।
 गांधी के इस कथन को कि अगर हम विचार,शब्‍द और कर्म में पूर्ण अंहिंसा का आश्रय लेंगे तो भारत की आजादी अवश्‍य प्राप्‍त होगी’, पहली बार सुनकर इतिहास के प्रो जे.बी. कृपलानी गांधी के पास चले गये थे और क्रोध में कहा था : “मि. गांधी आप बाइबिल या गीता के ज्ञाता हो सकते हैं, पर आपको  इतिहास का तनिक भी ज्ञान नहीं है। कोई भी राष्‍ट्र अपने को बिना हिंसा के मुक्‍त नहीं कर पाया है।” गांधी मुस्‍कराये और सुधारते हुए धीरे से कहा,“आप इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते। इतिहास के संदर्भ में सबसे पहले आपको यह जानना चाहिए कि अगर कोई चीज भूत में नहीं घटित हुई है तो उसका अर्थ यह नहीं कि वह भविष्‍य में भी नहीं घटित होगी।”  डा शिवपूजन राय विज्ञान के विद्यार्थी थे। उनको गांधी के इतिहास बोध पर तनिक भी संदेह नहीं था। उन्होने वहीं बड़की बारी में आंदोलनकारियों से अपना विचार साझा किया । तत्पश्चात जुलूस दो भागों में बांट गया। एक जत्था नगर के बाहर-बाहर तहसील भवन के पीछे पहुंचा और दूसरा जत्था जिसमें अधिकांश नवयुवक थे, मुख्य सडक़ से होते हुए तहसील भवन की ओर चला जिसका नेतृत्व अमर शहीद डा शिवपूजन राय कर रहे थे।  
गांधी ने अपने भाषण में कहा था कि ‘आज उसमें जीवन का कोई चिन्‍ह शेष नहीं है। उसके जीवन के रस को निचोड़  लिया गया है। यदि उसकी आंखों की चमक को वापस लाना है तो स्‍वतंत्रता को कल नहीं बल्कि आज ही आना होगा’। डा राय के मन में यह बात  हथौड़े की तरह चोट पहुंचा रही थी। वे यह जानते हुये कि जिन लोगों से उनका सामना होने वाला है वे हथियारों से लैस हैं, लोगों का आह्वान किया वे अपने हथियार आदि को यहीं फेंक दे और निहत्थे सामने छाती पर गोली खाने के लिए आगे बढ़ें। डा साहब का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था। लोगों ने कस्बे से एक मील पहले ही लाठी-डंडे आदि सभी हथियारों को फेंक पूर्ण अहिंसक क्रांति के लिए तहसील भवन की ओर कूच किया । श्री सीताराम राय जी बताते थे कि वहाँ तैनात सरकार के नुमाइंदों ने  क्रूरता का खुला प्रदर्शन करते हुए जुलूस पर ही गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। भगदड़ मचना स्वाभाविक था। लेकिन आजादी के दीवाने गोलियां अपने सीने पर झेलते हुए कदम आगे बढ़ाते रहे। डा शिवपूजन राय जो हाथ में तिरंगा लिये सबसे आगे-आगे चल रहे थे । तहसीलदार ने बिना किसी चेतावनी के पहली गोली उनके एक जांघ में और दूसरी गोली दूसरे जांघ में मारी। पहलवानी शरीर फिर भी आगे तिरंगा लेकर आगे बढ़ता रहा। अंतत: उनके सीने पर भी दो-तीन गोलियां दाग दी। डा साहब बेदम होकर गिर पड़े। लेकिन इस दौरान उनके साथ चल रहे वंश नारायण राय ने तिरंगे को अपने हाथ में ले लिया और उसे तहसील पर फहराने की जिद में आगे बढ़े । उनका भी वही हश्र हुआ जो डा राय का हुआ था । एक-एक करके रामबदन उपाध्याय, वशिष्ट राय, ऋशेश्वर राय, नारायण राय, वंशनारायण द्वितीय और राजनारायण राय (सभी शेरपुर निवासी) ने शेरों की तरह अग्रेजों की गोलियां अपने सीने पर झेलते हुए प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन तिरंगे को झुकने नहीं दिया । शहीदों ने सिपाहियों की बंदूकें छीनकर भी उसे फेंक दिया पर उससे वार नहीं किया। गांधी के अहिंसक आंदोलन के प्रति इससे बड़ी श्रद्धा और क्या हो सकती थी । अंत में जिंदा शहीद के नाम से विख्यात श्री सीताराम राय ने उस तिरंगे को तहसील भवन पर लहरा ही दिया। श्री सीताराम राय  को भी हाथ और पेट में गोलियां लगी थी। सिपाहियों ने उन सभी नौ शवों को कठवा मोड़ के पुल से नीचे फेंकने के फिराक में थे। लेकिन डा शिवपूजन राय का शरीर बहुत भारी था। उनका शव पुल के किनारे पर लगे नुकीले लोहे में फंस गया था। इस प्रक्रिया में काफी समय लग गया । तब तक घायल श्री सीताराम राय को होश आ गया था। उधर से ही एक सरकारी अधिकारी गुजर रहा  था। उसे देखकर उन्होने अँग्रेजी में कहा-मि मुनरो अभी मैं जिंदा हूँ।  उस अधिकारी ने वहाँ से उनको उठाया और जेल भेज दिया। आजादी की इस लड़ाई में शेरपुर के नौजवानों की शहादत के साथ-साथ जिले के अन्य क्षेत्रों सैदपुर, सादात, नंदगंज के नौजवानों ने भी अपना दमखम दिखाया था।  शहीदों की यह शेरपुर की धरती किसी तीर्थ स्थली से कम नहीं हैं। आज 18 अगस्त है । आज इन अष्ट शहीदों के बलिदान की 75वीं वर्षगांठ है। आजादी के इन वीर सपूतों को याद करने का दिन है। आइये हम सभी उनकी याद में यह प्रतिज्ञा करें कि उनके बलिदान को हम व्यर्थ नहीं जाने देंगे। जय हिन्द!

   

Thursday, July 14, 2016

 आरक्षण का जातिवादी व्याकरण
यथार्थ  !
बचपन में पिताजी ने कणाद ऋषि की कथा बताते हुए यह बात समझाने की कोशिश की थी कि अन्न के एक-एक कण का आदर करना चाहिए । सभ्यता के आरंभ से ही हमारे ऋषियों-मुनियों ने अन्न के आदर सहित सम्पूर्ण पर्यावरण की सीख हमें दी है। जब थोड़ा और बड़े हुए और खेत-खलिहान की तरफ जाना हुआ तो देखा कि सचमुच में गांव के कई भाई-बंधु पशुओं के गोबर से अन्न का दाना बीन रहे हैं। मन में कौतूहल हुआ कि क्या ये लोग ही कणाद ऋषि के सच्चे वाहक हैं? गाँव में ही यह भी देखा कि परंपरागत भोज की समाप्ति के बाद जूठे पत्तलों में बचे अन्न के दानों के लिए मनुष्य और कुत्ते दोनों संघर्ष कर रहे हैं। क्या ये सचमुच में अन्न के आदर के लिए संघर्ष कर रहे हैं? उत्तर था या है – नहीं। नहीं तो, फिर वह कौन सी मजबूरी है जो मनुष्य को इतना हेय बना देती है । आज जब हम 21वीं सदी के दूसरे दशक के मध्य में हम सीना ठोंककर कह रहे हैं कि हम भी मंगल पर जाने की क्षमता रखते हैं। उधरइसरो नित-नवीन ऊचाइयाँ को छूने के लिए बेताब है। तब भी ऐसी भीषण और वीभत्स परम्पराएँ विद्यमान हैं।क्या यह उनके मानवाधिकार का हनन नहीं है? क्या उन्हें भी एक सामान्य जीवन जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? क्या उन्हें अपना जीवन जीने के लिए उनकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होनी चाहिए । तमाम उपलब्धियों के बावजूद ये प्रश्न विचलित करने वाले हैं।
एक यथार्थ यह भी !
 सरकारी नौकरियों  में जाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुए गली-कूँचों के 8*10 के कमरों में मेरिट में आने के लिए रात-दिन हाड़-तोड़ परिश्रम करते विद्यार्थी अपनी जिंदगी के स्वर्णिम एक युग झोंक दे रहें हैं। लाखों की संख्या में बैठने वाले परीक्षार्थियों में से कुछ हजार ही सफल हो पाते हैं। उन्हें जब यह पता चलता है कि उनसे कम अंक प्राप्त करके भी उनका साथी सफल हो गया है तो उसे दिन में ही तारे नजर आने लगते हैं। कुछ अगले साल के तैयारी में लगते हैं तो कुछ निराश-हताश घर लौट जाते हैं। क्या यहाँ भी संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर अथवा का सवाल नहीं उठता है? क्या यहाँ भी मानवाधिकार का हनन नहीं हो रहा है? यह सवाल भी परेशान करने वाला है।  

एक कड़वा सच और!
यह एक तथ्य है कि सैकडों वर्षों से भारतीय समाज व्यवस्था असमानता और शोषण पर आश्रित रही है। शुचिता,वर्ण और जाति समगोत्रीय थे। समाज के स्तरभेद के ऐतिहासिक विकास के कालक्रम में शुद्धता –अशुद्धता के विचार के साथ आर्थिक-राजनीतिक समीकरण भी गूँथे हुये थे। सत्ता के सामने समाज व्यवस्था झुकने को मजबूर थी। कर्म का समाज दर्शन ऊपरी स्तर पर स्वीकृत था पर श्रम को उसका सही सामाजिक मूल्य प्राप्त नहीं हो पा रहा था। एक खास वर्ग ने बड़ी चालाकी से गरीबी को भाग्यवाद से जोड़ने में सफल रहा । कुबेर की मन पवन की नौका पर सवार होकर सदियों तक  सागर पार कर सुदूर इलाकों में भारतीयता की सुगंध फैलाने वालों पर बिजली गिरा दी जाती है-खबरदार,समुद्र यात्रा करके आचार विचार मत भ्रष्ट करो। तभी कोई अदृश्य मनु फतवा दे डालता है-समुद्र यात्रा कराने-करने वाला ब्राह्मण धार्मिक कल्पों के कराने का आधिकारी नहीं। उधर एक आर्य पुरोहित हमें लगातार समझाता रहा –मणि-माणिक-अर्थ-काम के लोभ से क्या फायदा। यह सब माया है। मैं तो तुम्हारी थाली में ही समुद्र उतार देता हूँ। इसमे हाथ डालो और जीवन की सबसे कीमती चीज अनंत फल यानी मोक्ष प्राप्त कर लो। फलस्वरूप भारतीय इतिहास में करीब हजार वर्षों तक सामाजिक संगठन, विवाह, खान-पान,शिक्षा-दीक्षा और आचार-विचार के क्षेत्र में जीवन निषेध और जीवन जिजीविषा के लिए चली  लंबी लड़ाई के अंत में निषेध जीत गया, और जिजीविषा हार गई । फिर भी गतिशील निषाद मन शायद ही इसे पूरी तरह स्वीकार किया हो। उन्नीसवीं शती में फिर से एक बार निषाद मन गंगा में डुबकी लगा कर उठ खड़ा हुआ। इस बार वह पहले से ज्यादा सतर्क और सावधान था। राममोहन राय,ईश्वरचंद, दयानंद,विवेकानंद,गांधी,नेहरू और अंबेडकर उसी अव्याहत जिजीविषा की जीवंत साँस बनकर हमारे सामने उपस्थित हुए।
आजादी की लड़ाई के दौरान ही आधुनिक भारत के निर्माता भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयों को लेकर भी संवेदनशील थे। गांधी और अंबेडकर तो इस जटिल मुद्दे को लेकर अपने-2 तरीके से न केवल आंदोलन चलाया अपितु आमने-सामने भी हुए । पर हजार वर्षों से डी एन ए में घुसी बीमारी एक झटके में कहाँ खत्म होने वाली थी। पुरातनपंथी तो गांधी-अंबेडकर पर अपनी लाठी भाँजने से नहीं चूकते थे।
आजादी के संघर्ष के दिनो से ही हमारे संविधान निर्माताओं के मन-मस्तिष्क में प्रजातन्त्र, समता, सामाजिक न्याय, बंधुत्व, एकता आदि के आदर्श सक्रिय थे। यह ठीक है कि कुछ आदर्श पश्चिम से भी लिए गए जो उनके(पश्चिम) दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रक्रियाओं की उपज थे । लेकिन इसमें  संविधान निर्माताओं के अध्ययन और अनुभव की देन को नकारना भी असंभव है। संविधान की उद्देशिका को पढ़कर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक बड़े नामी राजनीतिशास्त्री ने लिखा-
“ जब मैंने इसे पढ़ा तो मुझे ऐसा लगा कि मैने अपनी सारी पुस्तक में जो कुछ कहने का प्रयास किया है वह इसमे बहुत थोड़े शब्दों में रख दिया गया है और इसे मेरी पुस्तक का मूल स्वर माना जा सकता है।”
यह कथन संविधान निर्माताओं की निष्ठा को प्रमाणित करता है। वे भारत को एक आधुनिक भारत के रूप में बढ़ते देखना चाहते थे। गांधी ने स्वयं कहीं लिखा है-  "It is against the fundamental principles of humanity, it is against the dictates of reason that a man should, by reason of birth, be denied or given extra privileges"



भारत में जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था और संवैधानिक प्रावधान :
व्यक्तिमात्र को ब्रह्म का प्रतिरूम मानने, नारी को शक्ति मानने,महाकरुणा का सिद्धांत प्रतिपादन करने तथा दरिद्र में नारायण का दर्शन करने वाले देश में सदियों से ऐसी प्रथाएँ चलती आ रहीं थीं जो किसी भी सभ्य देश अथवा मानवता के मस्तक पर कलंक का धब्बा हो सकता है। अनुसूचित जाति के लोग तथाकथित सामाजिक दबाबों के चलते इन निकृष्ट प्रथाओं के सैकड़ों वर्षो से वाहक बने रहे।  आजादी के तुरंत बाद संविधान ने इस आमानवीय प्रथाओं पर तुरंत रोक लगाया जो मनुष्य को मनुष्य से ही हेय समझने में सहायक बनी हुई थी । यह एक तथ्य है कि वैदिक काल में व्यक्ति के वर्ण की पहचान उसके सामाजिक/आर्थिक कर्तव्य अथवा पेशा से होता था और यह वर्ण जाति का सूचक नहीं था। एक वर्ण से दूसरे वर्ण में जाने की मनाही नहीं थी। तथापि कालांतर में जन्म के साथ ही जाति का निर्धारण होने लगा और प्रत्येक जाति ने अपने से नीचे एक जाति की खोजबीन की और स्वयं को उससे श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की । वस्तुत: यह एक किस्म का चालाकी भरा अघोषित नियम /मनोवैज्ञानिक खेल था जो निचले तबके को विरोध करने से रोकता था । संविधान सभा के विद्वान सदस्यों  ने इस दर्द को ठीक तरह से समझा और उसने इन लोगों को समाज में उनका वाजिब हक और प्रतिष्ठा कैसे मिले इस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया । उन्होने उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए  संविधान में कुछ आवश्यक प्रावधान दिए  ।  
संविधान के अनुच्छेद 14 से लेकर अनु 17 तक में गांधी के उपरोक्त कथन और उसकी व्याप्ति को संपूर्णता में लिया गया है  । अनु 14 वस्तुत: एक समतावादी समाज की निर्मिति पर बल देता है जिसमे यह कहा गया है कि विधि के समक्ष सभी समान हैं और बिना किसी विभेद के विधि के समान सरंक्षण के हकदार हैं। अनु 15  राज्य को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, मूलवंश , लिंग,जन्मस्थान या इनमे से किसी एक आधार पर विभेद न करे। लेकिन भारत की ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियाँ ऐसी रही हैं कि इनमे विसंगतियों का का जड़ जमना स्वाभाविक था। उन विसंगतियों को दूर करने तथा एक सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखने के लिए संविधान ने कुछ नई व्यवस्था दी जिससे दौड़ में पीछे रह गए भाई-बंधु भी स्वतन्त्रता के साथ आधुनिक सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकें और समानता तथा बराबरी तक पहुँच सके । यह नई व्यवस्था ही आरक्षण है और वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। ध्यान देने की बात है कि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां  यह व्यवस्था लागू है। संविधान का अनु 15(4) राज्य को क्रमश: शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के कुछ वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के  लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है । यह नीति उन्हें न केवल पदों को आरक्षित करने की शक्ति देता है अपितु उम्र/शुल्क/शैक्षणिक योग्यता/अवसर  आदि में भी छूट देने के साथ-2 वजीफा आदि भी प्रदान करती है जिससे वे प्रतियोगी दौड़ में शामिल हो सकें। राज्य/सरकार ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अभ्यर्थियो के  साथ साक्षात्कार में भेदभाव न हो इसके लिए प्रत्येक साक्षात्कार बोर्ड मे उनके एक प्रतिनिधि का होना भी आवश्यक है। कार्मिक मंत्रालयनेअपने हाल के निर्देश में यह प्राव्धान किया है कि यदि किसी संस्था आदि में दस से अधिक पदो का चयन होना है तो उसके साक्षात्कार बोर्ड में  महिला और पिछ्डे वर्ग के विशेषज्ञो का भी होना  जरूरी है.  
राजनीति में उनकी सहभागिता हो तथा उनकी राजनीतिक हैसियत में वृद्धि हो इसके लिए संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों  के लिए लोकसभा  में भी राज्यवार जनसंख्या अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है ।(अनु 330 और 334)  इसी तरह राज्य, जिला,प्रखण्ड और गाँव में भी उनके जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण किया गया है।

संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण की यह नीति सरकारी संस्थानों अर्थात सरकारी नौकरियों, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा हेतु प्रवेश और त्रिस्तरीय कार्यपालिकाओं में लागू है । इसमें प्राइवेट सेक्टर को शामिल नहीं किया गया है। समय के साथ सरकार ने इसका दायरा बढ़ाते हुए मकान,दुकान और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के आबंटन में भी लागू किया है। यद्यपि कि कुछ क्षेत्रों में जैसे रक्षा,न्यायपालिका में इसे लागू नहीं किया गया है।
आरक्षण का भीतरी झोल:   
ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि दौड़ में पीछे छूट गए लोगों को मुख्यधारा में आने के लिए संविधान में मुकम्मल व्यवस्था के गई है। संविधान में उल्लिखित प्रावधानों का स्पष्ट उद्देश्य था कि आरक्षण पा रहे जातियों/वर्गों का लोक सेवा,सरकारी उपक्रम और शिक्षण संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व बढ़े और एक सुंदर और समरस भारत का निर्माण संभव हो सके । परंतु आंकड़े कुछ और कहते हैं। सरकार और स्वयं के प्रयास से सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों,अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की संख्या में सकारात्मक वृद्धि हुई है जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक हैसियत बढ़ी है। लेकिन जिनकी हैसियत बढ़ी है वे अब इसे दूसरों के लिए छोड़ने को कत्तई तैयार नहीं है। अब तो आरक्षण पाने के लिए अन्य जातियाँ भी अपने को इस दौड़ में शामिल कर चुकी हैं।
यह एक तथ्य है कि आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान भी प्रत्येक समुदाय/वर्ग में समाहित सभी जातियों के लिए बराबर का अवसर दे पाने में असफल रहा है। फलस्वरूप विभिन्न जातियाँ और जनजातियाँ जो इसकी हकदार थीं समान रूप से इसका लाभ नहीं उठा पायीं । उनकी भी अब आँख खुल गई है। अब वे भी मुखरित हो रहें हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है इन समुदायों के भीतर ही एक प्रकार का ईर्ष्या-द्वेष पनप रहा है। जिन जातियों/समुदायों में कुछ शिक्षित हुए हैं अब वे अपने हक के लिए पैंतरेबाजी कर रहें हैं। यह पैंतरेबाजी एक स्वाभाविक क्रिया है। अनुसूचित जाति के अंदर चमार (उत्तर प्रदेश),महार (महाराष्ट्र),रामदासी(पंजाब) ने आरक्षण का अधिकांश फायदा ले लिया है। इसी तरह  जनजातियों में मीणा लोगों ने अधिकांश लाभ उठाया। आरक्षण की सही पहुँच की समस्या पिछड़े वर्गों को लेकर भी है। आरक्षण के इस दौड़ में तमाम जातियाँ कूद पड़ीं जो राजनीतिक तौर पर न केवल मजबूत थीं अपितु इतिहास में भी वे दबंग और मजबूत मानी जाती रही हैं । आज जब हम इस विषय पर चर्चा कर रहें हैं तो ये जातियाँ राजनैतिक तौर पर सर्वाधिक मजबूत लोगों में शामिल  हो चुकी हैं। केरल में एझवा,तमिलनाडु में नादार और थेवर, कर्नाटक में लिंगायत और वोकालिंगा, मध्य भारत में लोध और कुर्मी, बिहार और उत्तरप्रदेश में यादव और कुर्मी ,राजस्थान और हरियाणा में जाट अपनी सामाजिक,आर्थिक हैसियत के बावजूद आरक्षण का लाभ लेने वाली जातियों में सम्मिलित हैं।  इन जातियो की राजानैतिक हैसियत किसी से छुपा नहीं है. फिर भी इनमे से कोई भी जाति किसी भी प्रकार आरक्षण-दौड से बाहर नहीं होना चाहती हैं।

समस्या कहाँ है-
संविधान का अनु 15(4) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग’, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। शर्त यह है कि उसे इसका समाधान हो जाय कि कथित जाति/वर्ग का लोक सेवा में उचितप्रतिनिधित्व नहीं है। स्वाभाविक है कि कोई एक मानदंड तो इस वर्ग का निर्धारण नहीं कर सकता है। एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि अमुक जाति/वर्ग पिछड़ा है, का विनिश्चय केवल जाति के आधार पर नहीं की जा सकती है। चित्रलेखा बनाम मैसूर के मामले में न्यायालय ने यह स्थापना दी कि पिछड़ा वर्ग के निर्धारण के लिए जाति एक प्रासंगिक कारण हो सकता है। एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए जाति और निर्धनता दोनों प्रासंगिक है। (के एस जयश्री बनाम केरल) स्पष्ट है कि न्यायालय इस मामले में अपनी सीमाओं को पहचानते हुए उचित रास्ते की तलाश करता हुआ दिखता है। इन निर्णयों में एक स्वस्थ समाज की रचना की छटपटाहट भी दिखती है। लेकिन उसके खुद के हाथ संविधान से बंधे हुए हैं ।  पिछड़े वर्ग में आने वाली जातियों की पहचान आदि वस्तुत: राज्य का मामला है। राज्य के साथ राजनीति का चोली-दामन का संबंध है। और वह हर हाल में इस झुनझुने को छोड़ना नहीं चाहती।  

आरक्षण और प्रतिभा :
बुनियादी तौर पर यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि आरक्षण मूलत:  व्यक्ति के उस मौलिक अधिकार/मानवाधिकार का उल्लंघन जिसमे उसे जन्म से ही समानता का अधिकार और अवसर की समानता मिलनी चाहिए । यह मानीखेज है कि प्रत्येक व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी क्षमता/प्रतिभा के आधार पर चाहिए । इसलिए प्रत्येक  व्यक्ति  को खुले तौर अपनी प्रतिभा के बल पर विभिन्न सेवाओं ,शैक्षणिक संस्थानों आदि में स्थान बनाने देने का अवसर मिलना चाहिए जिससे वह समाज में अपनी रचनात्मक योगदान दे सके । इस प्रयास में सफलता अथवा असफलता उसकी व्यक्तिगत होगी न कि संस्थागत। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आरक्षण वस्तुत: प्रतिभा की जगह प्रतिभाहीन लोगों को अवसर देती है जो अंतत: मानदंड’(स्टैंडर्ड) को ही नीचे गिराती है और अक्षमता को बढ़ावा देती है। यह तर्क एक सीमा/क्षेत्र तक ही सही है। बहुत से अध्ययनों से यह साबित हो गया है कि प्रशासन में कम पढ़े लिखे लोग भी बेहतर साबित हुए है बनिस्बत टापरों के । लेकिन इसके विपरीत एक तर्क और भी है कि प्रतियोगिता तो समान लोगों के बीच में होना चाहिए । जब समान वातावरण ही उपलब्ध नहीं है तो प्रतियोगिता उचित कैसे मानी जाएगी । यह कोई बताने वाली बात नहीं है कि बहुत सारी योग्यता व्यक्ति के सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति पर निर्भर होती है।

वैसे भी लोक सेवाओं में आरक्षण का अर्थ वस्तुत: प्रतिनिधित्व नौकरशाही की व्यवस्था है जिसका सीधा अर्थ है समस्त समाज/वर्ग/जाति/क्षेत्र का लोक सेवा में उचित प्रतिनिधित्व हो जिससे कोई निर्णय लेते समय उस समाज विशेष के लोकाचार/प्रवृत्ति /संवेदना को भी ध्यान में रखा जा सके । ध्यान देने लायक एक और जो चीज है वह है पर्याप्त प्रतिनिधित्व का सही अर्थ समझना। इस पद- विशेष में यह अर्थ सन्निहित है कि इसके लिए (पद) आवश्यक अर्हता/दक्षता को बनाये रखते हुए व्यक्ति विशेष का चयन करना । प्रतिभा की कोई आत्यंतिक परिभाषा नहीं हो सकती । कला और सौन्दर्य की ही तरह इसकी भी कोई निरपेक्ष परिभाषा नहीं बन सकती । भारत जैसे विविधिता वाले देश में केवल तथाकथित प्रतिभा ही चयन का मानदंड हो, यह भी बहुत उचित नहीं है । भारत में यह खुली किताब की तरह है कि चयन में प्रतिभा नहीं,जाति/अर्थ/राजनीतिक संबंध ही प्रभावी हैं। इसके मकड़ जाल में उच्च शिक्षा से लेकर आयोग तक सब फंसे हुए हैं। शिक्षा जगत में तो चपरासी से लेकर चांसलर तक सबकी नियुक्ति पूर्व निर्धारित होती है। जिनके पास यह शक्ति-त्रयी उपलब्ध नहीं है उसका चयन असम्भव है । कहना न होगा कि आजादी के बाद सम्पूर्ण समाज में चौतरफा मूल्यों में आई गिरावट ने इसको और मजबूत ही किया है । आरक्षण समाधान का कोई दीर्घजीवी सिद्धांत नहीं हो सकता। यह तो भारत जैसे बहुलवादी देश की ऐतिहासिक परिस्थितियों की परिणति थी/है । पर राजनीति के लंबरदारों ने इस सुविधा का इस कदर दुरुपयोग किया है कि इसकी मूल भावना ही नष्ट हो गई । अब आरक्षण एक दुधारी हथियार की तरह  हो गया है। क्या मजाल जो कोई बिना मूंठ के इस तलवार  को  हाथ लगा सके।  

आरक्षण का व्याकरण : दर्द भी दवा भी
संभवत: सरकार की कोई भी नीति इतनी विवादित नहीं रही है जितना कि आरक्षण-व्यवस्था’ की नीति । यह एक सच्चाई है कि आरक्षण का लाभ बहुत से वे लोग  नहीं  उठा  पा रहे  हैं  जिनको  यह  मिलना  चाहिये । आरक्षण का लाभ उन्हीं लोगों को मिला जो पहले से ही समर्थ थे। प्रकृति की यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जहां बलशाली का लाभांश सदैव अधिक होता है। आरक्षण के द्वारा प्रत्येक वर्ग/जाति में एक अलग नव्य-द्विज पैदा हुआ और वह उसका लाभ उठाने में सफल  रहा है। अब तो आरक्षित वर्ग में पैदा हुए नव्य द्विजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ उठाते हुए स्वयं के लिए एक सीढ़ी का कवच तैयार कर लिया है।किसी  विद्वान ने इस स्थिति को ऊपरी स्तर पर विकास और निचले स्तर पर जड़-स्थिर की संज्ञा दी है। सवाल यहाँ यह उठता है कि क्या वह आरक्षण की सीढ़ी से चढ़ जाने के बाद भी वह अब भी समाजार्थिक रूप से पिछड़ा ही है? यह एक विचित्र विरोधाभास है कि यहाँ लाभार्थी अपने लाभ को व्यक्तिगत मानता है न कि जातिगत । वह यह मानता है कि जाति विशेष के अधिकांश लोगों की स्थिति तो जस की तस ही है । स्पष्ट है कि आरक्षणवादियों के बराबरी का व्याकरण कुछ अलग है। वह तर्क करता है कि यह आरक्षण उसे जाति के आधार पर दी गई है। वह भले ही पढ़-लिख कर अपनी शैक्षिक-आर्थिक हैसियत बढ़ा चुका है,परंतु उसकी सामाजिक स्थिति अभी भी नहीं बदली है। तर्क के तरकश से वह यह तीर भी चला देता है कि उसके वर्ग/जाति के आगे बढ़े लोग उस जाति विशेष के लोगों के अहंकार के तुष्टि करते हैं। मंडल कमीशन ने इसी बात की पुष्टि करते हुए कहा है-“ आरक्षण पिछड़े वर्गों के बीच यह भाव पैदा करता है कि देश चलाने में उनकी भागीदारी है”। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आरक्षण का मतलब जातियों के बीच की असमानता को कम करना है न कि जाति के भीतर की गैर बराबरी को खत्म करना ।उच्च जातियों में भी कुछ खास लोगों का ही पद-प्रतिष्ठा और शिक्षा पर कब्जा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो लोग पद पर नहीं हैं उन्हे आरक्षण मिलना ही चाहिए। इस प्रकार आरक्षित समुदाय में नव्य-द्विजों का उभरना वस्तुत: उस जाति के सामाजिक हैसियत की बढ़ोत्तरी का सूचक है जो उन्हे उच्च जातियो के समकक्ष खडी करती है।
समाधान के तरीके :
भारत एक बहुलतावादी और बहुसंख्या वाल देश है। यह इस देश की कमजोरी भी है और ताकत भी। आजादी के बाद सरकारों द्वारा दलित और पिछड़े वर्गों को मुख्य धारा में लाने के अनेक प्रयास हुए हैं। ये प्रयास सकारात्मक रहे हैं। आज यह एक सच्चाई है कि गांवों में भी उच्च जातियों की श्रेष्ठ-ग्रंथि अंतिम सांस ले रही हैं। आर्थिक ढांचे बदल चुके हैं। उच्च वर्गों की ज़मीनें उसी जगह के दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ले रहें हैं । गाँवो में प्रति व्यक्ति जमीन बीघा/विस्वा में बदल चुका है । खेती/जोत की जमीन अब प्रतिष्ठा की वस्तु नहीं रह गई है। ग्रामीण क्षेत्रो में शिक्षा और रोजगार में सब एक दूसरे को चुनौती देने को तत्पर हैं। समाज का हर तबका अब जाग चुका है। वह अपने  हक-हुकूक को अच्छी तरह समझने लगा है। इसमे कोई संदेह नहीं है कि आरक्षण ने कुछ जातियों के कुछ लोगों को ही फायदा पहुंचाया पर इच्छाएं सभी की जग गईं। नई पीढ़ी यह मानने लगी है कि  हमरे ही समुदाय के लोगो ने अवसर  पाते ही हमारे साथ अन्याय किया है  उधर तथाकथित उच्च जाति में जन्मी नई पीढी यह मान रही है कि इतिहास में जो कुछ हुआ हम उसके दोषी कैसे हो जाएँगे । प्राथमिक विद्यालय में पढ रहे कुछ बच्चो को जब वजीफा आदि की सुविधाये नहीं मिलती हैं तो उनके इस प्रश्नो का जबाब  देना मुश्किल हो जाता है कि तुम एक खास  जाति में पैदा हुए हो । यह एक तथ्य है कि कुछ इलाको को छोड दिया जाय तो शायद ही समाज में किसी से किसी प्रकार का खान-पान से लेकर रहन-सहन तक में कोई भेद भाव हो  रहा हो । हाँ यह जरूर है कि  आरक्षण को लेकर एक नये किस्म  का भेदभाव पैदा हो रहा है । युवा पीढ़ी को तब और कष्ट होता है जब वह देखता है कि हर तरह से मजबूत परिवार का विद्यार्थी आरक्षण का लाभ लेकर उसे पीछे छोड़ देता है । ऐसे में यह पीढ़ी या तो विदेश भाग रही है अथवा अवसाद की तरफ जा रही है।
  अब समय आ गया है कि आरक्षण नीति पर पुनर्विचार किया जाय । इसके लिए तटस्थ होकर कुछ ठोस उपाय करने होंगे। मेरी दृष्टि में कुछ उपाय निम्नलिखित हैं ।
1-     आरक्षण का प्रावधान लम्बवत न होकर क्षैतिज होना चाहिए। एक बार जिस  व्यक्ति ने  नौकरी में आरक्षण का लाभ उठा लिया है उसकी आने वाली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये । इसका लाभ यह होगा कि उसके पड़ोसी का लड़का भी उस जगह के लिए अपनी दावेदारी सुनिश्चित कर सकेगा और आरक्षण का दायरा अधिक परिवारो तक बढ सकेगा ।
2-      एक बार जिस व्यक्ति ने नौकरी में आरक्षण का लाभ उठा लिया है तो दुबारा वह किसी अन्य सेवा में  इसका हकदार नहीं होगा । इसका सबसे बड़ा लाभ होगा कि उसी के भाई-बंधु अगली बार उस सेवा में अपनी दावेदारी सुनिश्चित कर सकेंगे ।
3-     आरक्षण प्राप्त कर अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ा चुकीं जातियों को इस परिधि से बाहर किया जाय जिससे संविधान की आत्मा की रक्षा हो सके।
4-     क्रीमी लेयर के दायरे को नीचे किया जाय। क्रीमी लेयर का सूत्र वस्तुत: कुछ मजबूत लोगो को भी इसमे बनाये रखने की साजिश है । नीति आयोग के द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा को ध्यान में रखकर ही क्रीमी लेयर का सूत्र ईजाद किया था ।
कहना न होगा कि इस मामले में सरकार की गम्भीर और नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वह इस दिशा में ठोस और सुचिंतित कदम उठाएँ जिससे समाज में समरसता बनी रहे और प्रतिभा पलायन रुकने के साथ-2 मानवाधिकार का भी हनन न हो । लेकिन यह तभी होगा जब उसके पास राजनैतिक इच्छा शक्ति हो।

Monday, December 14, 2015

विमर्शों में कराहता गांधी-विमर्श
 बुद्ध-महावीर के काल से ही भारतीय सभ्यता में त्यागी-तपस्वियों के प्रति आदर-समर्पण का भाव रहा है।  इसी परंपरा की एक अभिन्न कड़ी महात्मा गांधी भी हैं। गांधी के जीवन-दर्शन पर  सर्वप्रथम उनके अभिन्न मित्र मि डोक और डा मेहता ने कलम चलाया था। डा मेहता ने तो भारतीय राजनीति के उस समय के एक बड़े नेता गोपाल  कृष्ण गोखले को  लिखा था - “ मुझे लगता है कि जिस किसी को भी अपने देश के लिए काम करने की इच्छा हो तो उसे गांधी और उसके संस्थानों/आश्रमों का अध्ययन करना चाहिए।” तब  गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपने लोगो के हक और हुकूक की लडाई लड़ रहे थे। गांधी-दर्शन पर  डोक और मेहता के द्वारा 1907 से शुरू हुआ लेखन आज  भी बदस्तूर जारी है।
गांधी पर सुचिन्तित अध्ययन-लेखन उनके जीवन काल में ही शुरू हो गया था। आजादी के बाद भी रचनाकार,समाज वैज्ञानिक,कलाकार अपने-2 तरीके से गांधी को व्याख्यायित भी कर रहे थे। पर एटनबरो की फिल्म गांधी’, जिसने कई आस्कर अवार्ड भी जीते थे, के आने के बाद तो जैसे गांधी अचानक ग्लोबल हो गए । गांधी-चिंतन के कई पक्ष जो अभी भी अनुछुए थे, उस पर लोगों ने अपनी कलम चलाई । गांधी एक अनुशासन के रूप में उभरकर सामने आए। दुनियां ने अपनी तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए गांधी की तरफ आशा भरी नजरों से देखा। समीक्ष्य पुस्तक का लेखक भी इससे अछूता नहीं है-“सवाल चाहे धर्म,राजनीति एवं शिक्षा का हो अथवा प्रौद्योगिकी,पर्यावरण एवं विकास का,सभी का जबाब एक है-गांधी’!’गांधी’, ‘सिर्फ गांधी और गांधी के सिवा कुछ भी नहीं’!!”(पृ10)
  यह महज संयोग नहीं है कि पुस्तक के लेखक का जन्म-वर्ष और रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी का परदे पर आने का वर्ष एक ही है। लगता है कि लेखक को  अभिमन्यु की तरह गर्भ में ही गांधी-चिंतन की घुट्टी पिला दी गई थी। वरना आसान नहीं होता है एक वर्ष के भीतर ही लगभग एक ही तरह के दो  पुस्तकों ( गांधी-चिंतन और गांधी-विमर्श )का सम्पादन-सृजन । गांधी के प्रति लेखक में गहरा आकर्षण है जिसे पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर देखा जा सकता है। यह लेखक की ईमानदारी ही  है कि उसने अपने आत्मकथन में यह स्वीकार किया है  कि-“ इस पुस्तक में प्रस्तुत विचार मुख्यत: गांधी के ही हैं,इसलिए एक तरह से इसका सारा श्रेय उन्हीं को जाता है।”(पृ 10) वरना आज की पेटेंट प्रिय दुनिया में आइडिया से लेकर संस्थान-उत्पाद तक हर जगह यह हमारा है की होड़ लगी हुई है।   
गांधी को पढ़ने-सुनने का अवसर मुझे भी मिला है । पर मेरे अनुभव कुछ भिन्न किस्म के रहें हैं। सच तो यह है कि गांधीअपने पर कलम चलाने वाले किसी भी लेखक से अंतहीन धैर्य और उदात्त कल्पना की मांग करते हैं। स्वयं उन्होने अपने जीवन में इस सिद्धांत का पालन किया था । जब उनसे (मुझसे) से नहीं रहा गया तभी लिखा। यह नहीं कि कभी पुस्तक मेलालगने वाला हो अथवा कोई साक्षात्कार-सम्मेलन नजदीक हो तो झट कलम उठाया और लिख मारा ।आजकल संचयनऔर रचनावली की बाढ़ सी आई हुई है। जिसे देखिये वही इस प्रक्रिया में अपने को झोंके हुए है। इस तरह के लेखन-संचयन पर हमारे एक आत्मीय आचार्य वागीश जी ने एक बार हास्य टिप्पणी करते हुए कहा था - “ संचयन में तो पेंसिल की जरूरत भी पड़ती है , रचनावली में तो उसकी भी जरूरत नहीं है।”  वस्तुत: रचना–प्रक्रिया में लेखक स्वयं को भूल जाता है। यह एक जटिल और श्रमसाध्य क्रिया है । प्लोतिनस ने इस प्रक्रिया की बड़ी सुंदर व्याख्या की है। उसने लिखा है- “बाहर से अपने को खींचकर भीतर ले जाओ और द्रष्टा बनकर वहाँ जो है,उसे देखो। अगर तुम्हें अंतर्निहित तात्विक सौंदर्य का अनुभव नहीं होता तो मूर्ति को सौंदर्य प्रदान करने के प्रयत्न में लगे शिल्पकार की विधि को अपनाओ। वह छेनी और हथौड़ी से पत्थर को विधिवत तराशते हुए तब तक काम में  लगा रहता है,जब तक मूर्ति बन नहीं जाती।”  
दरअसल गांधी केवल कलम-दवात-स्याही की वस्तु ही नहीं है। वह तो  कुछ और ही  हैं । गांधी  रुक्मिणी के श्रद्धा रूपी तुलसी दल से तुलने वाले हैं न कि सत्यभामा के हीरे-जवाहरात से। हीरे-जवाहरात से तौलने के भ्रम में ही हम अपना पथ भूल गए हैं। आजकल  यह फैशन में आ गया है जब मन कियागांधी को  राजनीतिक रूप से दोषी ठहरा दो  नहीं तो उनपर भक्ति भाव से कलम चला दीजिये। विमर्शों की इस भागमभाग में परिणाम यह हुआ कि गांधी  पर  पुस्तकों  की  बाढ़  सी  आ  गयी । सबसे आसान टापिक गांधी ही हो गए। हर कोई गांधी से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार बैठा है। पर यह क्या इतना आसान है ? टामसन के शब्दों में देखिये -“ तीन घन्टे  तक उन्हे  छाना  गया और  उनसे  जिरह  की  गई . ....यह   काफी  थका   देने  वाली  परीक्षा  थी , लेकिन  वह  एक  क्षण  के  लिये भी  विचलित या  निरूत्तर  नहीं हुए  ।  मेरे  हृदय में  पूर्ण  विश्वास  जम  गया कि परम  आत्म-संयम और  अनुद्विग्नता के मामले में संसार ने सुकरात के समय से आज तक इनकी टक्कर का पैदा नहीं  किया।”  सच  तो  यह  है  कि गांधी तक पहुंचने का रास्ता ध्यान-मौन-निष्काम कर्म के संकुल से होकर गुजरता है । जो  इस  रास्ते  से  गया उसे  एक दृष्टि  मिली  और  वह अपने  धुन  में रम गया।  उसे  न  कलम  चलाने  की जरूरत  पड़ी   न  विमर्शो  में  उलझना पड़ा ।  वह  तो एकला  चलो  रे  का  पथिक  बन  एक  राह  पकड़कर  किसी  रचनात्मक कार्य   की तरफ बढ़  गया। समीक्ष्य पुस्तक के लेखक ने इस ओर इशारा भी किया है –“गांधी विचार या हिन्द-स्वराज कहने से नहीं करने से करीब  आयेगा।” (पृ 135)
राष्ट्र से लेकर भूमंडलीकरण तक के तेरह अध्यायों में विभक्त गांधी-विमर्श में वाक्यांशों की भरमार है।आजकल जिन विमर्शों ने अपने घटाटोप में संगोष्ठी-कार्यशाला को घेर रखा है उससे संबन्धित तमाम उद्धरण जो गांधी द्वारा समय-समय पर यत्र-तत्र दिये गए हैं, उसे लेखक ने एक जगह प्रस्तुत कर एक श्लाघनीय कार्य किया है। इसे उसने स्वयं स्वीकार भी किया है -“गांधी-विमर्श की आवश्यकता एवं उपयोगिता स्वयंसिद्ध है।”(पृ 10) समीक्ष्य-पुस्तक लेखक ने हिंद-स्वराज की प्रशंसा में जमकर कसीदे गढ़ा हैं,पर हिन्द-स्वराज की ही एक प्रसिद्ध उक्ति पहले के लोग कम लिखते थे....... को नजरंदाज करते हुए सृजन-सम्पादन का कीर्तिमान रचने की ओर अग्रसर है। इस तरह की रचना एपीआईकी पूर्ति के लिए तो ठीक है पर कोई सार्थक अवदान देने में असफल साबित होती हैं जो किसी भी रचना की मुख्य प्रतिज्ञा होती है। गांधी-विमर्श के लेखक ने जिन चीजों का अपने लेखन में विरोध किया है उसी का अनुपालन वह करता हुआ दिखता है जो  उसके हड़बड़ी और प्रकाशन-लोभ को दर्शाता है। उसने स्वीकार भी किया है कि उसने समय–समय पर संगोष्ठी-पत्रिका में अपने  प्रस्तुत-प्रकाशित लेखों को क्रमवार इकट्ठा कर  पुस्तक का रूप दिया है।(पृ 10) सौन्दर्य-प्राण-सर्जन तो तब सामने आता है जब सही बोध क्रियाशील रहता  है इस बात को हर लेखक को ध्यान में रखना चाहिए ।


भारतीय कला का भागीरथ :आनंद कुमारस्वामी
                                                                                मनोज कुमार राय
 “माँ , इन चित्रों के सामने आप आँख मूंदकर हाथ जोड़े हुए क्यों खड़ी हैं? ये कौन लोग हैं?”
“ इनमें एक तुम्हारे पिता हैं और दूसरे भगवान कुमारस्वामी हैं।” नन्हें बालक के प्रश्नों का माँ ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।
“लेकिन मैंने तो अपने पिताजी को कभी देखा नहीं! अभी वे कहाँ हैं?”
माँ ने उत्तर दिया-“अब वे भगवान कुमारस्वामी के साथ हैं। ”
बालक ने कौतूहल से पूछा- क्या भगवान के छः मुख होते हैं?” माँ ने उत्तर देते हुए कहा-“हाँ। भगवान के छः मुख भी होते हैं और अनंत मुख भी। आपके पिता अब इन्हीं के साथ हैं। वे इन्हीं के उपासक थे। आपका नाम इसीलिए इनके नाम पर कुमारस्वामी रखा गया। आप भी आँख मूंदकर हाथ जोड़कर इन्हें प्रणाम करो।”
बालक ने आज्ञा का पालन किया । हिन्दू धर्म-दर्शन –चिंतन से यह उसका प्रथम परिचय था । गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- “बचपन में सीखी हुई बातें ही बाद के जीवन में प्रस्फुटित होती हैं।”
कुमारस्वामी का जन्म  22 अगस्त 1877 को श्रीलंका में हुआ था। इनके पिता मुथु कुमारस्वामी तमिल हिन्दू परिवार से थे। वे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। भारतीय दर्शन-खास तौर से बौद्ध दर्शन(उन्होने दो पाली ग्रन्थों का अँग्रेजी में अनुवाद भी किया था) और पाश्चात्य साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। कुमास्वामी को अपने पिता से संस्कार में ही नाम-अभिरुचि मिल गई थी। आनंदनाम बुद्ध के प्रिय शिष्य के नाम पर रखा तो कुमारस्वामी धर्म-देवता के नाम पर। बीच का नाम केंटिशमाँ एलिज़ाबेथ क्ले के गृह-प्रदेश का द्योतक है। कुमास्वामी मात्र दो वर्ष के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। एलिज़ाबेथ क्ले तब महज तीस वर्ष की थीं।  नन्हें शिशु को लेकर वे अपने मायका इंगलैंड लौट आईं । हिन्दू-चिंतन पद्धति से गहरे प्रभावित एलिज़ाबेथ क्ले ने अपना पूरा ध्यान बालक आनंद के शिक्षा-दीक्षा पर लगा दिया। उन्होने आनंद को भारतीय धर्म-दर्शन के अध्ययन हेतु प्रेरित किया। कुमारस्वामी ने भी अपनी माँ को निराश नहीं किया । माँ  की मृत्यु के पश्चात आनंद ने लिखा, “मुझे विश्वास है कि मैंने अपने अध्ययन और कार्य से माँ की इच्छा को कुछ हद तक पूरा किया है।”
कुमारस्वामी ने पहले वाइक्लीफ़ कालेज तथा बाद में लंदन विवि से अपनी शिक्षा पूरी की । उनकी शिक्षा मुख्यत: विज्ञान की थी,यद्यपि कि रस्किन आदि के प्रभाव में आ गए थे। “श्रीलंका की भौमिकी” पर डी एस सी की उपाधि प्राप्त करने वाले ये प्रथम श्रीलंकाई थे। पचीस वर्ष की अवस्था में ही इन्हें श्रीलंका के विज्ञानीय सर्वेक्षण के निदेशक पद पर नियुक्त किया गया। 1903 से 1906 के बीच इस पद पर कार्य करते हुए इंहोने श्रीलंका के गांवों की यात्रा की। सिंहल द्वीप के प्राचीन उद्योग धंधे ,कला,रहन-सहन,और जीवन की सुंदर जीवन पद्धति पश्चिम के प्रहार और जीवन में बढ़ती हुई  कुरूपता को देखकर कुमारस्वामी अत्यंत चिंतित हुए ।उन्होने अपनी नग्न आँखों से देखा कि किस तरह पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता ने  यहाँ की दस्तकारी और कला को नष्ट किया है। उन्हें कहना पड़ा-एशिया को बचाओ! उसका आदर्शवाद खतरे में है उनकी रुझान प्राच्य संस्कृति के विभिन्न पक्षों  विशेषकर ललित कलाओं की तरफ दिनोदिन बढ़ती जा रही थी। जल्दी ही उन्हे यह महसूस हुआ कि उनके जीवन का मूल उद्देश्य भौमिकी नहीं कला का क्षेत्र है। मातृभाषा की शिक्षा और प्राचीन कला और शिल्प के विषय में अपने देश-वासियों की रुचि जागृत करने के लिए उन्होने न केवल “सीलोन रिफ़ार्म सोसाइटी”(1905) की स्थापना की अपितु अपने संपादकत्व में सीलोन नेशनल रिव्यू नामक एक पत्र भी 1906 में प्रकाशित किया ।
वर्ष 1906 कुमारस्वामी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होने भौमिकी के क्षेत्र से स्वयं को पूरी तरह से कला-इतिहास के प्रति समर्पित कर दिया । एक सुबह उन्होने श्रीलंका की धरती को प्रणाम किया और वहाँ से नए क्षितिज की तलाश में भारत पधारे । भारत में कुछ महीने  गुजारने के बाद वे इंगलैंड चले गए । अगले दस वर्षों तक उन्होने भारतीय धर्म-दर्शन का गहन अध्ययन किया। लंदन में एक पुराना घर खरीदा और वहीं पर एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। पति-पत्नी मिलकर कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया । इस बीच उनका भारत और इंग्लैंड के बीच आवागमन होता रहा। वे टैगोर के निकट होने के साथ-2 वे भारत की आजादी-आंदोलन की तरफ भी आकृष्ट हुए । महात्मा गांधी से कुमारस्वामी बहुत प्रभावित थे । गांधी से उनकी मुलाकात लंदन में 1914 में हुई ।
कुबेरनाथ राय अपने एक निबंध जंबूदीपे-भरतखंडे में लिखते हैं-हमारी भारतीय साधना,शिल्प,साहित्य एवं दार्शनिक चिंता आदि की उच्चतम स्थितियों में चिन्मय भारत ही व्यक्त होता है।” कुमारस्वामी इसी चिन्मयता पर मुग्ध हैं। उनके लिए यह भौगोलिक सत्ता नहीं अपितु एक प्रकाशमय,संगीतमय भाव-प्रत्यय या चैतन्य-प्रतिमा का सहज बोध है। एक  बार एक कला आलोचक सर जार्ज बर्डवुड ने अपने एक व्याख्यान में बुद्ध मूर्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि पूरब के कलाकार मूर्ति-चित्र आदि बनाते तो जरूर हैं पर वे नहीं जानते कि सौंदर्य क्या है? यह मूर्ति सिवा बुरादा की खिचड़ी के अलावा कुछ नहीं है। कुमारस्वामी ने महसूस किया कि बर्डवुड आदि वस्तुत: पौर्वात्य कला-इतिहास के उत्पत्ति-औदात्य से कत्तई अपरिचित हैं। उन्होने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और कुछ ही समय बाद ओरिजिन आव बुद्ध इमेजनामक पुस्तक लिखकर करारा जबाब दिया। समय मिलते ही उन्होने पत्नी के साथ श्रीलंका की एक और  यात्रा की । इस यात्रा के परिणाम यह रहा कि कुमारस्वामी के पास नई पुस्तक के लिए विपुल मात्रा में सामग्री मिल गई। भारतीय कला परंपरा को लेकर उन्होने आर्ट एंड स्वदेशी नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक की प्रशंसा विश्व भर में हुई।
समय के साथ कला और सत्य के प्रति कुमारस्वामी का आग्रह बढ़ता जा रहा था। दुबारा 1910 में इंडिया ओरिएंटल सोसाइटी के निमंत्रण पर भारत आए और इलाहाबाद कला प्रदर्शन के संयोजक नियुक्त हुए । इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होने सामग्री-संग्रह के लिए उत्तर-दक्षिण की यात्रा की और की भारतीय कलाकृतियों- मूर्तियों- चित्रों का एक बड़ा खजाना इकठ्ठा कर  लिया। प्रदर्शनी के बाद इस संग्रह को वे भारतवर्ष के किसी कला-संग्रहालय को देना चाहते थे। उनके मन में यह बात बैठ गई थी कि भारत की सेवा का  माध्यम उनके लिए कला है। इसे मूर्त  रूप देने के लिए उन्होने बनारस में अपने लिए नौकरी की तलाश भी की। उनकी इच्छा थी की काशी में इस तरह का कोई संस्थान बने। उन्होने अपने द्वारा संग्रहीत कलाकृतियों को दान देने की भी पेशकश की।  इसके लिए उन्होने एक अपील भी निकाली। पर दुर्भाग्य से उस वक्त किसी संस्था,सरकार या मर्मज्ञ ने इस पर ध्यान नहीं दिया । डिलथे ने कहीं लिखा है कि -जीवन संयोग,भाग्य और चरित्र के ताने-बाने बुना एक रहस्यमय कपड़ा है।अंतत: भारतीय कला के इस भागीरथ की योग्यता की असल पहचान  सुदूर बैठे हार्वर्ड विवि के कला-पारखी प्रो रास ने समझा और उन्हे बोस्टन संग्रहालय के भारतीय कला विभाग के अध्यक्ष पद पर  कार्य करने का आमन्त्रण  भेजा । इस तरह अपने संग्रह सहित कुमारस्वामी अमरीका पहुँच गए । बोस्टन में लगभग “30 वर्षों तक विशुद्ध मनीषी के रूप में केवल मात्र सत्य और ज्ञान की लालसा से प्रेरित होकर अध्ययन और संग्रह, व्याख्या और विश्लेषण करते रहे।” यह उनके अविराम परिश्रम का ही फल था विश्व प्रसिद्ध ब्रिटेनिका विश्वकोश को अपने 14वें संस्करण में भारतीय कला को एक विषय के रूप में स्वीकार करना पड़ा। कुमारस्वामी ही वह पहले व्यक्ति हैं जिंहोने सर्वप्रथम राजस्थानी और पहाड़ी कला का ठीक मूल्यांकन किया और भारतीय कला में आनंद और सौंदर्य का अक्षय भंडार खोज निकाला । उनके लिये कला मन अथवा बुद्धि का कौतूहल मात्र  नहीं है । कला का सच्चा आसान इससे बहुत ऊंचा है और उतना ही अनिवार्य है जितना धर्म,अध्यात्म और दर्शन का


  कार्लाइल के शब्दों में बड़भागी वह है जिसे अपने जीवन का कार्य करने के लिए मिल जाय,उसे फिर किसी और वरदान की चाह नहीं करना चाहिए । इस मामले में कुमारस्वामी भाग्यशाली हैं। पिता का संस्कार ,माँ की इच्छा और स्वयम की अभिरुचि का कार्य ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया। इसमें उन्होने अपना शत-प्रतिशत लगा दिया । सृष्टि-स्थिति-प्रलय-तिरोभाव-अनुग्रह भाव से युक्त चिदम्बरम शैली के नटराज’-प्रतिमा की सांगोपांग व्याख्या पहली बार अभारतीय विश्व के सम्मुख भारतीय कला के भागीरथ आनंद कुमारस्वामी ने ही अपने निबंध संग्रह दी डांस आव शिव के माध्यम से रखा। उन्होने नटराज के इस नृत्य की तुलना लूसियन द्वारा उल्लिखित ईरास’(काम शक्ति)  सृष्टि-नृत्य से की है जिससे सृष्टि का सूत्रपात होता है। यद्यपि कि श्री कुबेरनाथ राय ने नटराज- नृत्य को उससे वृहत्तर कल्पना मानते हुए कहते हैं कि –“नटराज-नृत्य की कल्पना से कोई तुलना ही नहीं हो सकती।” एक योग्य उत्तराधिकारी से इससे बेहतर क्या उम्मीद हो सकती है कि वह अपने पूर्वजों की थाती को और भी पुष्ट-तुष्ट करे । कुमारस्वामी इस पर एकदम खरे उतरते हैं।
कुमारस्वामी इस बात से भी व्यथित हो जाते थे कि भारतीय अपने विरासत को न तो जानते हैं न ही उसे समझने की कोशिश करते हैं  । अध्ययन के लिये अमेरिका आये भारतीय  छात्रो  के एक  समूह  को  सम्बोधित  करते  हुए  उन्होने  कहा –“आपको  अपने भारतीय  संस्कृति ,परम्परा, और  गौरव शाली  अतीत  को कभी  नहीं  भूलना  चाहिये । आपको  एक  राजदूत  की तरह  कार्य करना होगा और आप कही  भी जायेँ आपको भारतीय बनकर  ही  रहना  चाहिये
कुमारस्वामी के मन में आत्मप्रचार  के लिए कोई जगह नहीं थी । इस मामले में वे अपने पूर्वजों के अनुयायी हैं । मंत्र-मूर्ति-काव्य आदि जो कुछ भी हो हमारे पूर्वजों ने नाम आदि पर कभी ध्यान नहीं दिया-त्वदीयम वस्तु गोविंदम तुभ्यमेव समर्पये। उनके एक मित्र ने उनसे आत्मचरित लिखने का आग्रह किया। उन्होने कहा-“आत्मचरित लिखने के विचार के लिए मेरे मन में कोई स्थान नहीं है। मैं एकांत में रहना चाहता हूँ. मेरे  बारे  में  लिखने  अच्छा होगा  कि आप  मेरी  पुस्तको के  बारे  में  लिखो । उनका मूल्यांकन करो । यही मेरे  लिये  पर्याप्त होगा । मैं भारतीय  संस्कृति का  पुजारी हूँ और इस परम्परा में मोक्ष के लिये आत्मकथा लिखना अनिवार्य नहीं है । मुझे इस पर पूरा विश्वास है । यह सिर्फ विनम्रता नहीं है ।  यह मेरे  जीवन का सिद्धांत है
कुमारस्वामी ने भारत की आजादी के शुभ अवसर पर  हार्वर्ड विवि में एक व्याख्यान दिया । आजादी की लडाई में गांधी के योगदान को सराहते हुए कहा -“ मुझे उस देश पर गर्व है जिसका झंडा  न केवल राष्ट्रवादी है अपितु मनुष्य और जगत के आपसी सम्बंधों की तरफ भी इशारा करता है बोस्टन के हार्वर्ड क्लब में अपने सत्तरवे जन्म दिन के अवसर पर  अयोजित विदाई समारोह में अपने भविष्य की योजना के बारे  में बताते हुए कहा-“ मेरा और मेरी पत्नी की अगले वर्ष भारत (अपने घर) लौटने की योजना है ये शब्द बताते हैं कि कुमारस्वामी भले ही अमेरिका में दशको तक काम  करते  रहे हो पर उनका भारत से आध्यात्मिक जुडाव समय के  साथ  और  गहराता ही गया। भारत के अन्य विख्यात कल-इतिहास मर्मज्ञ वासुदेव शरण अग्रवाल को एक पत्र में उन्होने लिखा-“ इस समय आत्मा पर एक महाग्रंथ लिखने में  लगा हूँ । उसके पूरा होने पर भारत लौटने की इच्छा है” पर दुर्भाग्य से  उनका यह सपना साकार नहीं हो पाया । भारतीय कला-गौरव का यह उद्धारक-मनीषी भारत-अपने घर- लौटने की इच्छा लिये हुए बोस्टन में ही 9 सितम्बर 1947 को सदा के लिये आंखे मूंद ली ।