Thursday, February 19, 2015

चंद्रमा मनसो जात:
अंतत: प्रो कागभुशुंडि और उलूक ने आल इंडिया एल टी सी के तहत मध्य भारत में घूमने की योजना बनायी।  आकाश मार्ग से उड़ते हुए जब प्रो काक और उलूक जीरो माइल पर पहुंचे तो उन्होने विश्राम की योजना बनाई । इस बार दोनों का ठौर था किष्किंधा विवि । दोनों मित्रों ने जगह तलाशने के लिए किष्किंधा विवि की एक परिक्रमा की। घूमने-फिरने के बाद कुछ-एक वृक्ष दिखाई दिये । गोधूलि वेला का समय था। दोनों मित्र एक वृक्ष के आमने–सामने की डाली पर अपना डेरा जमाया। सदा की भाँति डाली पर बैठते ही दोनों के बीच अकबक शुरू हुआ।
काक ने कहा लगता है कि इस विवि में मोदी के स्वच्छता अभियान का कुछ ज्यादा ही असर पड़ा है। उलूक ने पूछा –वह कैसे? काक ने कहा – देखिये न ! काँट-छांट के नाम पर लगभग सभी पेड़ों को बेतरतीब ढंग से काट दिया गया है। इन पेड़ों का संतुलन बेढंगा हो गया है। हवा एक तेज झोंका भी इनके लिए काफी होगा। वह क्यों? उलूक ने पूछा । वह इसलिए कि इस पथरीली भूमि पर उगे वृक्षों की जड़ें बहुत गहरी नहीं होती। अत: खतरा सदा ही बना रहेगा - काक ने खखांरते हुए कहा । रात्रि घिर गई थी। उलूक को अब सब कुछ साफ-2 दिखने लगा था । उसने पूछा –मित्रवर विवि में तो रंग-रोगन हो रहा है। आखिर ये क्या बला है? काक गंभीर हो गया । उसने कहा कि विवि को अपनी नाक बचानी है । कुछ दिनों पहले ही  स्थापना दिवस मनाया गया था ।असल में  इस विवि के महत्वाकांक्षा के सत्रह वर्ष पूरा हो रहें है।  किष्किंधा विवि उत्सव-धर्मी विवि है। स्थापना काल से ही मुक्त-हस्त से आयोजनों पर खर्च करता रहा है। अब यह बालिग हो रहा है। इसका कैशोर्य जाता रहा। देखते नहीं कल तक जो पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाते थे,उनको भी पाम्ही आ गई है।
इनकी पढ़ाई-लिखाई की बात सुनकर यहाँ के स्थायी निवासी डा गरुड़ भी उनके बगल में आ गये। दुआ-सलाम के बाद परिचय हुआ। श्येन सुपर्ण ने बताया कि कुछ दिनों पहले ही वह शिक्षा विभाग के कंक्रीट के जंगलों मे चक्कर खाकर गिर गया था। कुछ दयालु बंधुओ ने मेरे लिए दाना-पानी की व्यवस्था की और जंगल विभाग को सूचित कर दिया कि एक दुर्लभ प्रजाति का श्वेत उल्लू यहाँ पाया गया है । यह खबर विवि मे आग की तरह फैल गई। लोगबाग शुभ मानकर मेरे दर्शन के लिए उमड़ पड़े। मैं दर्द से कराह रहा था और ये तंत्र-मंत्र-ज्योतिष से मेरे शुभ दर्शन  के पक्ष में तर्क गढ़ रहे थे। खैर यह सब चल ही रहा था कि किसी ने खबर दिया कि  विवि प्रशासन ने आनन-फानन में स्ट्रांग रूम में एक बैठक बुलाई है । मेरे कान खड़े हो गए। मैंने अपना ध्यान उधर कर लिया।बैठक में तय हुआ कि इस बार स्थापना दिवस के अवसर पर किष्किंधा विवि  का मंथन कार्यक्रम प्रमुख  होगा । बैठक कक्ष में और जो कुछ हुआ वह तो वहाँ उपस्थित सज्जन ही जानें । पर बाहर निकलकर धुरंधरों ने एक दूसरे से आगे निकलने की योजना पर काम करना शुरू किया। एक बुजुर्ग आचार्य ने कंधे पर बैग संभालते हुए ज्ञान दिया-पूर्वजों ने कहा है कि तीन उड़ान के बाद तीतर पकड़ाई देता है।यह गूढ रहस्य है। अपन का फील्ड-अनुभव है। सच तो यह है भाई कि विवि में शिक्षण का काम तो बचा नहीं । रही सही कसर इन्टरनेट ने पूरा कर दिया। भारत के किसी भी विवि के ग्रंथालय रजिस्टर से इसकी पुष्टि की जा सकती है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा तक हर जगह गैर शैक्षणिक कार्यों में रूचि बढ़ती गई। प्राथमिक शिक्षा मे  हेडमास्टर क्लर्क बन कर मिड-डे-मील (?) से लेकर पोशाक-टाट पट्टी-टेबल बेंच की दलाली शुरू कर दिया है । खंड शिक्षा अधिकारी /बेसिक शिक्षा अधिकारी  से निकटता उसका प्राथमिक ध्येय हो गया। उच्च शिक्षा  का मामला थोड़ा भिन्न किस्म का है। उधर जो कार्य रोंआ गिराकर करते/कराते हैं  उसे यहाँ कालर उठाकर करते/कराते हैं। केन्द्रीय विवि है तो और भी मजे हैं। यहाँ शिक्षकों का वजन ज्ञान से नहीं पद-पदभार-अतिरिक्त प्रभार से मांपा जाता है। सुबह से शाम तक यही जुगाड़-तिकड़म चलता रहता है कि किस-किस समिति में घुसा जाय। यदि आप समिति विहीन हैं तो इसका साफ संदेश है कि विवि प्रशासन में आपकी पैठ नहीं है।  अत: येन-केन-प्रकारेण कुलपति वंदना से दिन की शुरुआत करने की कोशिश होती है। मैं तो यहाँ यह सब देखकर हैरान हूँ कि गांधी के कर्मभूमि पर अवस्थित इस विवि को आखिर हो क्या गया है?गरूड़ के शांत होते ही दोनों एक साथ बोल उठे-राजन! चुप क्यों हो गए और भी कुछ बताइये। गरूड़ ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा-अभी मुझे एक विद्वान द्वारा रचित  गद्य-मृदंग-वंदना याद आ रही है ।  मैंने यहाँ देखा है कि शिक्षक बंधु-बांधवी इसका पाठ कुल-गोत्र-स्थान-काल के हिसाब से करते रहते हैं। वह गद्य-मृदंग-वंदना इस प्रकार है - हे प्रधानमंत्री के सखा,मुख्यमंत्री के मीत,हे हमारे प्रभु,तुम्हारी दशमुख के ग्यारहवें मुख-जैसी मनोहर आकृति पर सरस्वती प्रेमासक्त है,लक्ष्मी तुमसे रात-दिन नजर लड़ाती है और पार्वती तुम्हें प्रेमपत्र भेजती है....”। तुलसीदास ने कहा भी है-मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा/पंचम भजन सो वेद प्रकासा। जब यह मंत्रोच्चार समूह स्वर में उच्चरित होता है तो लगता है कि समस्त सृष्टि के पोर-पोर में रस भर गया है ।  तो जीना तो है उसी का जिसने ये राज जाना पर अमल करते हुए शिक्षक बंधुओं ने पहले तो समितियों में जगह बनाई फिर तमाम तरह के सुझाव आदि देने के लिए गणेश-परिक्रमा शुरू कर दिया। इसका भी एक अलग आनंद है । समिति के कर्णधारों ने सर्वप्रथम अपने वैचारिकी के लोगों के साथ बैठक की, पुनश्च मंथन के लिए कमर कसा।
काक ने कहा – राजन इस विवि की खासियत के बारे में कुछ बताइये। आप तो यहाँ के पुराने अखड़िए हैं । गरूड़ ने उन्हें आराम करने की सलाह दी और कहा कल सुबह बात होगी।
प्रो काकभुशुंडी ब्रह्ममुहूर्त में उठने के आग्रही हैं।वे सुबह उठकर  टहलने निकल गए । रास्ते में कुछ लोग टहलते हुए दिखे। गांधी हिल पर कुछ लोग आसन-प्राणायाम भी करते दिखे। विवि के पवित्र  सुबहे-वर्धा  से वह इतने प्रसन्न हुए कि इसके दोनों कैम्पसों का चक्कर लगा डाला। हालांकि उत्तरी कैंपस में विद्यार्थी लगभग नहीं के बराबर टहलते दिखे। इससे उनको कुछ निराशा भी हुई कि वर्तमान पीढ़ी को आखिर हो क्या गया है? मोबाइल-इन्टरनेट में युवा पीढ़ी अपनी ऊर्जा को इस कदर बर्बाद कर रहा है जैसे किसी  ने इन पुंगव-वृषभों के जड़ों में मट्ठा डाल दिया हो। घूम फिरकर जब वे वापस लौटे तो वहाँ गरूड़ महाराज पधार चुके थे। गप-शप के बाद पुन: विवि पर बात आ गई। काक ने स्थापना दिवस के बारे बताने को कहा। गरूड़ ने अपने पंख फड़फाड़ाए और सुखासन पर बैठते हुए कहा-मित्रवर! यहाँ का स्थापना दिवस वैसे ही विवादित है जैसे इस विवि का उद्देश्य। जब-जब सत्ता बदलती है और उसके गण सक्रिय होते हैं,तब-तब दिवस-उद्देश्य को लेकर एक बहस चलायी जाती है। हर एक का अपना निजी एजेंडा होता है । वह उसी के तहत समीकरण बनाता है और अपना काम करता है। यद्यपि कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी के साथ अपने को एडजस्ट कर लेते हैं और उसका आनंद उठाते हैं। यही स्थापना दिवस पर भी हुआ । पंडाल से लेकर पुस्तक-भोजन-प्रदर्शनी तक में यही सब देखा गया । कुछ ऐसे थे जो प्रभारपाकर ऐसे प्रसन्न थे गोया उन्हें उच्चश्राइवा-ऐरावत की सवारी मिल गई हो। जो नहीं घुस पाये वह अपने तरीके से दुखी। पुस्तक प्रदर्शनी तो अद्भुत थी। अध्यापक-अधिकारी प्रकाशकों की चापलूसी कर रहे थे तो प्रकाशक इनकी। कुछ अध्यापक तो बाकायदा प्रकाशकों के भाषण सुनने के लिए लोगों सेमाहौल बनाने का आग्रह कर रहे थे। मजे की बात कि जो लोग सालभर में एक भी पुस्तक अपने पैसे से नहीं खरीदते है वह यहाँ लाखों रू की  पुस्तक खरीद-पन्ने पर हस्ताक्षर कर रहे थे।  ऐसा लग रहा था जैसे भारत के सभी  विद्वान किष्किंधा विवि में बरसाती मेढक की तरह उतरा गए हों ।   
भोजन-प्रदर्शनी से आपका क्या तात्पर्य है? उलूक ने जिज्ञासा प्रकट की। गरूड़ ने अपने टपकते लार को निगलते हुए कहा –बंधु! यहाँ भोजन-भट्टों  की कोई कमी नहीं है। वैसे इस विवि में भोजन-समिति का अध्यक्ष बनना सदैव ही लाभ का सौदा माना गया है। दावत से लेकर कूपन तक की इस दिव्य-यात्रा को मैंने बड़े नजदीक से देखा है। वर्धा के कई दुकानदार ऐसे मिलेगे जो यहाँ के लोगो को देखते ही बिल का मजमून समझ जाते हैं। यद्यपि कुछ ईमानदार ऐसे हैं जिनसे इनकी रूह भी काँपती है। तथ्य तो यह है कि किष्किंधा विवि इन्हीं शेषनागों के बल पर अभी तक खड़ा है।  
आप कल कुछ मंथन वगैरह का जिक्र कर रहे थे-काक ने कुरेदने की कोशिश की।
हाँ भाई! मंथन-चक्र तो जीवन मे चलता ही रहता है। विवि भी समय-समय पर अपने अंदर झाँकने की कोशिश करता रहता है। इसीलिए यह कार्यक्रम रखा गया था। पर हुआ क्या? यह तो बताइये-काक ने पुन: अपनी बात पर पर बल देते हुए कहा।  
गरुड़ वीरासन की मुद्रा में आ गए । उन्होने तनिक मुस्कान के साथ कहा- देख भाई ! किष्किंधा विवि  में संकाय सदस्य इसके अनुरूप ही हैं। यहाँ योद्धाओं की कमी नहीं हैं। एक से बढ़ाकर एक योद्धा-मंदिर-मंदिर प्रति कर सोधा/देखे जंह-तंह अगणित योद्धा। यहाँ का हर विभाग देवताओं से लैस है। यहाँ देवराज अनुवाद का जिम्मा लिए हैं तो पाणिनी पथ पर हनुमान व्याकरण-भाषा सिखाने में व्यस्त हैं। यहीं पर आपको चाँद-सूरज सोमरस और रमण-तृषा से परेशान दिखेंगे, मुरलीधर ठहाका के साथ प्रवेश से जूझते हुए नजर आएंगे। भयातुर गोविंद शोध को लेकर परेशान नजर आएंगे तो शंकर-शंभू वैर-प्रीति के दोराहे पर खड़े होकर समर्थन के लिए गुहार करते हुए नजर आएंगे । हिन्दी साहित्य के चारण युग की पैदाइश सुरेश सदा मंच को लेकर जूझते-हिलाते,हैरान-परेशान भागते नजर आएंगे तो दूसरी तरफ प्रो फेंकू पूरी कायनात को ही अपने अँकवार में लेने के लिए आतुर दिखाई देंगे । किसी भवन में दिव्य सुविधाओं से लैस सरदार शोकरहित हो चैन की  वंशी बजाते हुए एक बड़ी छलांग के लिए लंगोट पहन दंड-बैठक कर रहें है तो दूसरी तरफ शेर खाँ संतोष की रोटी तोड़ रहें हैं । किसी पर  निर्मल कृपा बरस रही है तो कोई केंद्र में बैठकर स्वच्छता अभियान चलवा रहा हैं। मारुतिनंदन भी राग-द्वेष के लोलक बन गणेश-परिक्रमा का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दे रहें हैं। लंबी फ़ेहरिश्त है। कहाँ तक कहें। 
पर उस दिन हुआ क्या? उलूक ने बीच में टोकते हुए कहा। धीरज रखने की सलाह देते हुए गरुड़ ने कहा-दरअसल इस विवि की एक खास परंपरा रही है मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की । इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण हैं। आदि-पुरुषों की अपनी समस्या है। वह यह सोचता है कि वृहस्पति और शुक्राचार्य से वे सीधे दीक्षित हुए हैं । तो ये सब जो छिटक कर बाहर से आए हैं उनकी क्या बिसात? उधर दूसरी तरफ कुछ शिक्षाशास्त्री योग-मनोविज्ञान को लेकर अवतरित हुएँ हैं। इनका मानना है कि विवि को सुधारने के लिए ही उन्हें यहाँ भेजा गया है। सो वे सुबह-सवेरे योग से लेकर दोपहर के स्व’-भोग तक का जिम्मा ले रखे हैं।
आप वीरासन पर क्यों बैठे हैं राजन! उलूक ने पूछा ।
गरूड़ ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- महोदय!युद्ध तो वीरासन पर बैठ कर ही लड़ा जा सकता है। इतिहास गवाह है कि विजयश्री उसी के हिस्से आई जिसने इस आसन को साधा। इस आसन को वही साध सकता है जिसके पास संयम-साहस-विद्या का त्रिक-बल हो। पटेल-नेहरू-राजगोपालाचारी आजादी की लड़ाई के दौरान कूटस्थ चैतन्य गांधी के इसी त्रिक-बल के प्रतीक हैं। इस विवि का दुर्भाग्य यह है कि यह हमेशा अपने अतीत रूपी कवच-कुंडल से मुक्ति की तलाश में भटकता रहता है। जो कोई भी मंच पाता है वह अपने को चारण-युग में धकेल कर अतीत-मुक्ति गान की टेर पकड़ लेता है। अतीत से ही न सीखते हैं प्रोफेसर साब । वरना इतिहास खुद को दुहराता है। कर्ण ने भी अहंकार वश अपने अतीत से मुक्ति पाने की कोशिश की थी । पर उसका हश्र क्या हुआ ? हम सब जानते हैं। और तो और इस विवि में सरस्वती भी परेशान हैं। वह अपने चीर को दोनों हाथों से लपेटते-खींचते दु:शासनों से परेशान हो कृष्ण की तलाश में इधर-उधर भटक रहीं हैं।
अरे!यह तो अनर्थ है। शासन-प्रशासन क्या कर रहा है?
क्या करेगा ? शासन-प्रशासन  तो धृतराष्ट्र.........तभी कुछ कुत्ते इनकी तरफ भौं-भौं करते हुए लपके ।   बचने के लिए ऊपर की डाली पर चढ़ गए। पर कुत्तों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी और बढ़ती जा रही थी उनकी कर्कश ध्वनि। कुत्ते भी शातिर थे। वे टूटे पेड़ों की निचली डालियों पर गिरते-पड़ते चढ़ने की कोशिश करने लगे। खतरे को भाँपते हुए तीनों विद्वानों ने वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी और उड़ चले किसी और ठौर की तरफ ।  

Wednesday, January 7, 2015

                                                         गांधी का मृत्यु बोध                      
   महात्‍मा गांधी की मृत्‍यु को लेकर एक सवाल मन में गूंजता रहता है कि वह किसी षडयन्‍त्र का परिणाम थी या प्रभु की लीला थी। प्रश्‍न चुनौतीपूर्ण और जटिल है । परिस्थितियां ऐसी है जिनमें इसका अनुत्‍तरित रह जाना स्‍वा‍भाविक है। मृत्‍यु के दस दिन पूर्व,जब उनकी सभा में बम फेंका गया था तो उन्‍होंने कहा था, 'मूर्ख तुम देखते नहीं कि इसके पीछे एक भयंकर और व्‍यापक षडयन्‍त्र है।'  यह षडयन्‍त्र चलताऊ नहीं 'भयंकर और व्‍यापक' था । फिर भी गांधी उस घटना से विचलित नहीं हुए। उनके मन में बम फेंकने वाले व्‍यक्ति के प्रति किसी तरह का आक्रोश भी नहीं था। हो भी क्‍यों? उन्‍हें तो मनुष्‍य की अच्‍छाई और बुराई का सटीक ज्ञान था। वे तो मानते थे कि हर एक मनुष्‍य के अंदर सद- असद प्रवृत्तियां सदैव रहती हैं। इनका द्वन्‍द्व ही मनुष्‍य को गलत कार्य के लिए प्रेरित करता है। सद़वृत्ति को जागृत करने के लिए सतत अन्‍वीक्षण,परीक्षण एवं साधना की जरुरत पड़ती है। गांधी तो गीता-पुत्र थे। उन्‍होंने अपनी हर जरुरत के लिए गीता का ही सहारा लिया। गीता-माता ने उन्‍हें 'समता' का सूत्र दिया था। गांधी ने उसे साधा था। अपने इसी साधना के बल पर उन्‍होंने विकारों पर नियंत्रण किया था। समता की साधना ने ही उन्‍हें मृत्‍यु के उसी रुप को जानने में सहायता की थी। उन्‍होंने कहा, 'मृत्‍यु तो छुटकारा है और उसका स्‍वागत उसी तरह किया जाना चाहिए जैसे कि किसी मित्र का किया जाता है।' इतना ही नहीं उन्‍होंने तो 'मृत्‍यु के समय ब्रह्ममय स्थिति की संभावना' का भी जिक्र किया है। लेकिन यह बोध रातों-रात उनके मन में नहीं उपजा था। इसके लिए उन्‍हें अपने को निरंतर खपाना पड़ा था। इसकी शुरुआत मरित्‍जबर्ग स्‍टेशन के उस काली रात से हुई जब उन्‍हें बिना कारण केवल रंग के आधार पर ट्रेन के डिब्‍बे से किसी 'वस्‍तु' की भांति नीचे फेंक दिया गया था। एक तो अंधेरी रात,ऊपर से कड़ाके की ठंड और गरम कपड़े रेलवे वालों के पास ही रह गए थे। वे रात भर ठिठुरते रहे। उन्‍हें बोध हुआ, 'कैसे कोई दूसरों को दुख देकर आनंद व संतोष की अनुभूति करता है।' उन्‍होंने मानवता के विरुद्ध चलने वाले इस जघन्‍य कृत्‍य के विरोध का निश्‍चय किया। अगली सुबह गांधी परिवर्तित हो चुके थे। शर्मीला गांधी जीवन के सत्‍व को पा चुका था। उन्‍होंने अपने अंदर निहित सदृप्रवृत्तियों को पहचान लिया था ।
               दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने सामने आने वाली हर बुराइयों को जमकर विरोध किया। इसके एवज में उन्‍हें कभी जेल की यात्रा करनी पड़ी तो कभी लात-घूसों का सामना करना पड़ा। परंतु गांधी हार मानने वाले नहीं थे। हर बार वे मजबूत होकर उभरे: 'जब-जब मुझ पर मार पड़ी है और मेरा अपमान हुआ है, तब-तब मुझे अपनी भूलों को ज्ञान हुआ है और नया ज्ञान मिला है। उनकी हार न मानने की प्रवृत्ति ने वहां के लोगों को और बौखला दिया। उन पर प्राणघातक हमला हुआ। वे वहां से किसी तरह बच निकले। पर परिजनों चिंता बढ़ गयी। उन्‍होंने एक पत्र में लिखा,'यहां जो  षडयन्‍त्र रचे जा रहे हैं उनको लेकर परेशान होने की जरुरत नहीं है। मेरी मृत्‍यु जिस दिन आनी है, उसी दिन आयेगी। कोई उसमें एक क्षण भी कम या ज्‍यादा नहीं कर सकता।' उन्‍होंने आगे कहा, 'मृत्‍यु से बचने का सर्वोत्‍तम मार्ग सदा मृत्‍यु के लिए तैयार रहना ही है।'
               जिन षडयन्‍त्रों से गांधी दक्षिण अफ्रीका में गुजरे थे, वे भारत में और विकराल रुप में सामने आये। परंतु उन्‍हें तो अब इसमें आनंद मिल रहा था। वे जीवन में मृत्‍यु और मृत्‍यु में जीवन देखने के आदी हो चुके थे। कई बार तो उपवास के दौरान अंग्रेजों ने उनकी मृत्‍यु की कल्‍पना भी कर ली थी। परंतु गांधी की आस्‍था उन्‍हें हर बार उस विषम स्थिति से उबार लेती थी : 'जिसे राम बचता है, उसे कौन मार सकता है।' गांधी कभी मृत्‍यु से नहीं घबराते थे। वे जीवन में ही मरजीवा बनने के लिए प्रयत्‍नशील थे। यह बड़ी जटिल प्रक्रिया है। उसके लिए उन्‍हें स्‍थूल और सूक्ष्‍म जगत से संघर्ष करना पड़ा था। मनोविकारों को अनुशासित करने में उन्‍हें अपने जीवन को खपाना पड़ा था। उन्‍होंने जिस दृढ़ता और एकनिष्‍ठ समर्पण के साथ उसका सामना किया वह अद्वितीय है।
               गांधी सही अर्थों में योगी थे। उन्‍होंने योग के तात्विक स्‍वरुप को समझा और साधा था। उसकी मूल चेतना में उनकी गहरी पैठ थी। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य से इसका परिचय भी दिया है: 'शास्‍त्रों के शब्‍दार्थ के पीछे पड़े रहकर हमें अपने धर्म की आत्‍मा का हनन नहीं करना चाहिए।' यह ठीक है कि 'शब्‍द निश्‍चय ही अर्थसूचक होते हैं, किंतु मानो वे सजीव हो, इस तरह उनके अर्थ में हृास और विकास होता रहता है,' इसलिए 'आदमी को केवल इन महान रचनाओं में निहित भगवान को ही पथप्रदर्शक के रुप में ग्रहण करना चाहिए। ' शास्‍त्र-मंथन और स्‍वानुभूति से जिस अनुशासन का नवनीत गांधी ने प्राप्‍त किया था, वह उनका पूरी तरह मार्ग-दर्शक था। उन्‍होंने कहा, 'जीवन को उसकी समग्रता में देखने और जीने का सफल प्रयास करना चाहिए । जीवन अविभक्‍त और अखंड इकाई है। उसे टुकड़ों में बांटकर देखना ठीक नहीं।' लेकिन यह तभी संभव होगा जब कथनी और करनी का भेद मिट जायेगा। भेद से प्रेरित दृष्टि जन्‍म-मरण के रहस्‍य को समझने में असमर्थ होती है। गांधी जैसे लोग तो इस दुनिया को एक रंग-मंच मात्र मानते हैं,और जागरुक ढंग से अभिनय-रत रहकर, अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह करते हैं। वे इस बात को जानते हैं कि 'जन्‍म और मृत्‍यु का चक्‍कर तो हमारे सा‍थ हमेशा ही लगा रहता है और यदि जन्‍म से हमें हर्ष होता है तो उस हर्ष को आने वाली मृत्‍यु के ज्ञान के जरिए काट देना चाहिए, और यदि मृत्‍यु का शोक हो तो भावी जन्‍म के ज्ञान से उस दुख का निकारण कर देना चाहिए।' यही निराकरण विवेक उत्‍पन्‍न करता है और जीवन को मृत्‍यु के पचड़े से बचाता है।
               महात्‍मा गांधी ने प्राणि-मात्र के अंदर ईश्‍वर से सजीव रुप को देखा। उन्‍होंने अपने में  सबको और सबमें अपने को देखा। उन्‍हें अपने मानसिक और शारीरिक यातना के माध्‍यम से ही उन करोड़ो लोगों के अभिशप्‍त  जीवन से एक अन्‍तर्दृष्टि प्राप्‍त हुई और उन्‍होंने अपनी  वेदना को उनकी वेदना से जोड़कर जीवन और मृत्‍यु के एक लोकोन्‍मुख व्‍यापक दर्शन का निर्माण किया जो उनके सत्‍य, अंहिसा और सत्‍याग्रह के अभिनव दर्शन का प्रेरक तत्‍व सिद्ध  हुआ। उन्‍होंने कहा, 'यदि हमें जीवन में भगवान का भय रहा है और हमने अपनी आत्‍मा की आवाज के खिलाफ कुछ नहीं किया है तो हमें मृत्‍यु का कोई भय नहीं होना चाहिए। उस स्थ्‍िाति  में तो मृत्‍य एक बेहतर परिवर्तन मात्र है, इसलिए वह एक स्‍वागतयोग्य परिवर्तन है इससे कोई शोक नहीं होना चाहिए।'
               इंसान के  जीवन का सपना  जितना स्‍पष्‍ट, मूर्त और लोक मंगलकारी होता है, उसकी मृत्‍यु की कल्पना  भी उतनी ही उदात्‍त, भयमुक्‍त और लोकहितकारी होती है। अध्‍यात्‍म में जीवन और मृत्‍यु को लेकर पर्याप्त विचार किया गया है और दोनों को बड़ा कष्‍टमय माना गया है- जनमत मरत दुसह दुख होई। इससे जन-जीवन में मृत्‍यु को लेकर बड़ा भय व्‍याप्‍त रहता है। गीता के अध्‍ययन, सत्‍य के प्रति दृढ़ आस्‍था और अहिंसा में एकान्तिक  निष्‍ठा के कारण गांधी ने अपने ढंग से मृत्‍यु का आदर्श  दिया- 'मृत्‍यु से मानव के सब प्रयत्‍नों का अंत नहीं हो जाता। यदि मृत्‍यु से प्रयत्‍नों का अंत हो जाता तो यह शाश्वत विधान, जिसे हम ईश्‍वर कहते हैं, एक विडम्‍बना मात्र बन जाता ।'  यह परम्‍परा से चले आ रहे विचारों पर आधारित है। फिर भी इसमें उनकी सत्‍याग्रह की अहिंसक भावना और लोक-हित के लिए कष्‍ट-सहन की तत्‍परता के कारणा गुणात्‍मक परिवर्तन आ गया है। वे कहते हैं, 'जो सत्‍याग्रही हैं, उन्‍हें तो न केवल मृत्‍यु के प्रति निर्भय रहना सीखना चाहिए, बल्कि  उसका सामना करने को तैयार होना चाहिए और जब कर्तव्‍य को पालन करते हुए हमारे सामने मृत्‍यु आये तब उसका स्‍वागत करना चाहिए। ................ मैं ऐसी ही मौत की कामना करताहूँ 
               भगत सिंह और अन्‍य क्रान्तिकारियों को लेकर उनके प्रति उनके विरोधियों ने जमकर दुष्‍प्रचार किया। जनता के बीच उन्‍हें दोषी साबित करने की कोशिश की गयी। भगत सिंह की फांसी के बाद जब लोगों ने गांधी को पंजाब जाने से रोका तो उन्‍होंने उसे अस्‍वीकार कर दिया। यह प्रस्ताव उनके सिद्धांत के विरुद्ध था । वे तो सदैव यह मानते रहे हैं कि 'एक ओर तो आप मरने के लिए अवश्‍य तैयार रहें और दूसरी और अपने वर्तमान कर्तव्‍य को निभाने में इस तरह संलग्‍न रहे; मानों कि आप अमर हैं, आपको कभी मरना नहीं हैं।' इसी आदर्श को अपनाकर उन्‍होंने अपनी यात्रा पूरी की। वे तो जीवनभर अपनी आस्‍था के बल पर 'मृत्‍यु को केवल चिर-निद्रा व विस्‍मृति मात्र  मानते रहे
               वैयक्तिक और राष्‍ट्रीय जीवन में 'देवासुर संग्राम चलता ही रहता है। कब हमें असुर भरमाता है और कब देवता रास्‍ता बताता है,यह हम सदा नहीं जान सकते।'इसलिए सदा जागरुक रहने की जरुरत पड़ती है। परंतु यह पथ आसान नहीं है। गांधी ने स्‍वीकार भी किया है, 'मै मार्ग जानता हूँ। वह सीधा और संकरा है। वह तलवार की धार की तरह है। मुझे उस पर चलने में आनंद आता है।' इस आनंद की रसानुभूति के लिए गांधी को तप करना पड़ा है। आस्‍था को मजबूत बनाना पड़ा है। वे कहते हैं, 'भविष्‍य की सरदारी का इजारा, ईश्‍वर ने अपने ही हाथ में रखा है। हमें उसने विश्‍वास रुपी नौका दी है। यदि उसमें हम बैठें तो सहज ही शंका रुपी समुद्र को पार कर जायेंगे।'
               गांधी की मृत्‍यु संबंधी अवधारणा के अनेक  पक्ष हैं। उन्‍होंने इस पर लगातार चिंतन-मनन किया है। इसके रहस्‍य को उन्‍होंने अपने तरीके से उद्घाटित भी किया है। संत मृत्‍यु के माध्‍यम से क्षण-भंगुरता पर प्रकाश डालकर, व्‍यक्ति को भगवान की ओर लगाने का प्रयास करते हैं। गांधी को देश की आजादी के लिए संघर्ष करना था, वे कृष्‍ण की भूमिका में थे। उनके चतुर्दिक आक्रमण हो रहे थे। वे एक कुशल नर्तक की भांति सारे आक्रमणों को बखूबी झेल रहे थे। उन्‍होंने उदात्‍त उद्देश्‍य की रक्षा हेतु अंहिसक ढंग से शहीद होने के आदर्श को सामने रखा। उन्‍होंने कहा, 'शहीद होने की कामना नहीं करनी चाहिए। वह तो तब विशेष महत्‍वपूर्ण और आनंद पूर्ण होता है जब अनपेक्षित ढंग से प्राप्‍त हो।'
               गांधी ने अपनी मृत्‍यु के बारे में आनंद हिंगोरानी से बातचीत के दौरान कहा था  कि 'मेरी जन्‍मकुंडली में लिखा है कि मेरी मृत्‍यु वीरोचित होगी।' आगे वीरोचित को और स्‍पष्‍ट करते हुए गांधी ने कहा, 'मेरी मृत्‍यु या तो फॉंसी के तख्‍त पर होगी,या हत्‍यारे की गोली से।' वह बातचीत 1933 की है- अर्थात् मृत्‍यु से करीब पन्‍द्रह वर्ष पूर्व। कितनी सटीक भविष्‍यवाणी है अपने मृत्‍यु के बारे में। संतों के साथ यही होता है। वे सब कुछ जानते हुए भी अपने कर्तव्‍य-पथ पर पढ़ते रहते हैं। वे जीवन और मृत्‍यु में कोई भेद नहीं मानते। उनकी दृष्टि में तो 'जीवित रहने के लिए मरना आवश्‍यक है। गांधी मृत्‍यु को विश्राम की एक अवस्‍था मानते हैं। कन्‍फयूशियस को उद्धृत करते हुए उन्‍होंने लिखा है: मृत्‍यु के द्वारा प्रत्‍येक व्‍यक्ति उसी में लीन हो जाता है जहां से वह आया था। प्राचीन काल के लोग मृत्‍यु को अपने  घर लौटना और जीवन को घर से बाहर रहना मानते थे। गांधी तो ज्ञानी थे। वे घर लौटने और घर से बाहर होने के रहस्‍य से भली भांति परिचित थे। इसलिए उनकी दृष्टि में 'मृत्‍यु का अर्थ शरीर की समाप्ति है। उसके भीतर रहने वाली आत्‍मा की नहीं।'
               आजादी के साथ ही मुल्‍क के बंटवारे का षड्यंत्र फिर अपने रौद्र रुप में मानवता के समक्ष प्रकट हुआ। अभूत पूर्व हिंसा और रक्‍तपात का नंगा नाच चला। गांधी को चैन कहां। वे चल पड़े उस घिनौने कृत्‍य से निबटने। इतिहास खूनी कलम से लिख जा रहा था। सरकारी मशीनरी असहाय थी। देश में आसुरी प्रवृत्तियां गतिशील थीं। मनुष्‍य दुष्‍कर्म और निरीह बच्‍चों की हत्‍या में समाधान खोज रहा था। यह सब गांधीके लिलए असहय था। सामूहिक विध्‍वंस के इस खेल में गांधी ने खुद को झोंक दिया। वे दंगाग्रस्‍त इलाकों में अकेले घूमने लगे - 'तेरे साथ कोई भी नहीं आता है, तो भी तू अकेला ही चलता जा। तेरे साथ ईश्‍वर तो है।'
               उन्‍होंने अपने भोजन और विश्राम के लिए भी अपने को दुश्‍मनों के आश्रित कर दिया। यह उनके अंहिसा की अग्नि परीक्षा थी। इसका सामना करने लिए उनमें अंतर्निहित शक्ति उमड़ पड़ी। वातावरण सामान्‍य होने लगा। कत्‍ल और लूट करने वाले उन्‍हें अपना हथियार सौंपने लगे। प्रत्‍येक समुदाय के लोग उनके साथ हो गये। कई आश्‍चर्यजनक घटनाएं घटी। एक गांव में एक उन्‍मादग्रस्‍त व बदनाम व्‍यक्ति गांधी के समक्ष आ खड़ा हुआ। उसने गांधी की गर्दन पकड़ ली और उसे दबाकर उनकी हत्‍या करने का प्रयत्‍न करने लगा। गांधी ठहरे परम साधु । वे तो साधना की उस उच्‍चतम अवस्‍था में थे जहां बैर भाव का अस्तित्‍व नहीं होता। वे सहज भाव से अडि़ग आस्‍था  के साथ चुपचाप खड़े रहे । अंततोगत्‍वा अंहिसा के इस बड़े साधक के समक्ष उसने खुद को असहाय पाया। वह रोते हुए उनके पैरों पर गिर पड़ा – अंहिसायां  प्रतिष्‍ठायां  तत्‍सन्निधौ वैरत्‍याग:।
               यह तो सर्वविदित है कि प्रकृति ही सर्वश्रेष्‍ठ वैद्य है। वही संपूर्ण है उसका विधान भी संपूर्ण है। गांधी को इसका  भान था। अक्‍सर 125 वर्ष जीने की इच्‍छा व्‍यक्‍त करने वाले गांधी अब अपनी उस इच्‍छा की छोड़ चुके थे। कभी बालू से कांग्रेस से बड़ा आन्‍दोलन खड़ा करने की ताकत रखने वाले गांधी वह कहते सुने गये कि अब उनकी कोई नहीं सुनता। स्‍पष्‍ट था कि वे अपने अंतकाल को जान गये थे। वे कहा करते थे,'ईश्‍वर ही जानता है उसे मुझसे क्‍या काम लेना है। उसे अपने काम के लिए जब तक आवश्‍यकता है, उससे एक क्षण भी अधिक वह मुझे रहने नहीं देगा।' संत का हृदय तो पूर्ण पारदर्शी होता है। यह तो अपने बारे में सब कुछ जान लेता है- अपरिग्रह स्‍थैर्य जन्‍मकथन्‍तासंबोध:। अपने अंतिम समय को गांधी जान गये थे। पर वे उसे चिंतित नहीं थे। हो भी क्‍यों ? सभी को किसी न किसी दिन मरना है। मृत्‍यु से कोई बच नहीं सकता। फिर उससे डरना क्‍या? गीता से भी उन्‍हें यही ज्ञान मिला था- वासंसि जीर्णांनि यथा विहाय नवनि गृहृतिनरो पराणि और 'जातस्‍य हि ध्रवोमृत्‍युध्रुवं जन्‍म मृतस्‍य च'। रही बात षडयन्‍त्र की, तो गांधी इससे भी विचलित नहीं थे। उनकी दृष्टि में 'भय अंहिसा के सिध्‍दांत के खिलाफ होगा।' उनका मानना था कि 'बहादुर की अंहिसा-भावना का प्रमाण  तो उनके मृत्‍यु के समय ही हो पायेगा। वह भी तब जब कोई हत्‍या  कर दे और वे उस हत्‍यारे के लिए प्रार्थना करते हुए मरें।
कथनी को करनी में बदलने का समय भी नजदीक आता जा रहा था। गांधी अंदर ही अंदर उसका अनुभव करने करने लगे थे। दिसंबर 1947 में उन्‍होंने कहा, 'इस आलीशान भवन में मैं -मित्रों से घिरा हुआ हूँ। परंतु मेरे भीतर शांति नहीं है।  मैंने 125 वर्ष जीने की अभिलाषा छोड़ दी है। चारों तरफ  घुप्‍प अंधकार छाया हुआ था । कल तक जो लोग गांधी  के इशारे पर सर्वस्‍व लुटाने को तैयार रहते थे, अब वे ही उनसे कतराने लगे थे। जीवन भर जिस गांधी ने सत्‍य के साक्षात्‍कार को अपना ध्‍येय माना था, उसी से लोग 'सत्‍ता की लालच' में झूठ बोलने लगे थे। गांधी तो सब कुछ जानते थे। फिर भी वे शांत थे। 'कोलाहल के बीच शांति की,अंधकार के बीच प्रकाश की और निराशा के बीच आशा की खोज करना' उन्‍होंने दक्षिण अफ्रिका में ही सीख लिया था।
               1930 में गांधी ने घोषणा की थी, ' मैं जानता हूँ कि यदि मैं स्‍वाधीनता' संग्राम के बाद भी जीवित रहा, तो शायद मुझे अपने देशवासियों से अंहिसक लड़ाइयां लड़नी पड़ें और वे उतनी ही उग्र हो सकती हैं जितनी उग्र मैं आज लड़ रहा हूँ। जनता उन्‍हें महात्‍मा के रुप में पूजती थी। उन पर जनता का भरोसा था। परंतु दूसरी तरफ षडयंत्रकारी और सत्‍ता-लोलुपों को यह बात पसंद नहीं थी। उन्‍हें अब गांधी पसंद नहीं थे। गांधी अब उन्‍हीं के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले थे। गांधी उनकी आखें की किरकिरी बने हुए थे। उन सबको लगता था कि किसी प्रकार गांधी से मुक्ति मिलनी चाहिए, तभी समाज में उनका वर्चस्‍व फिर से कायम हो सकेगा। गांधी ने भी जान लिया था कि अब समय आ गया है, जब इस पुराने मंदिर को छोड़ दिया जाय। उनकी भाषा बदल गयी अब तो मेरी यही प्रार्थना है कि वह मुझे समय आने पर बहादुरी से मृत्‍यु का सामना करने की शक्ति दे। अब मृत्‍यु रुपी विश्राम की प्रतीक्षा में थे गांधी - न दैन्‍यं न पलायनम । मृत्‍यु से कौन बचा है? गांधी स्‍वयं को कृष्‍ण का पुजारी कहते थे । बात पूरी तरह से स्‍पष्‍ट थी । पुजारी की मृत्‍यु भी अपने आराध्‍य के तईं  ही होगी। पर दूसरे कैसे इसका अनुभव करें? इसमें दूसरे का अनुभव काम नहीं आता। इसमें तो स्‍वंय जलना पड़ता है। गांधी जल रहे थे। उन्‍होंने कहा, 'मै भट्ठी में पड़ा हूँ। चारों ओर आग धधक रही है।'
               नोआखली के बाद अब दिल्‍ली की बारी थी। यहां भी सांम्‍प्रदायिक दंगा अपने पूरे शबाब पर था। क्‍लान्‍त और जर्जर गांधी ने पुन:शक्ति संजोयी ओर इस जघन्‍य कृत्‍य के खिलाफ उठ खड़े हुए। उन्‍होंने 'उपवास' शुरु कर दिया। लोग चिंता में पड़ गये। बापू ने यह क्‍या किया? वे कमजोर थे। अत: लोगों की चिंता बढ़ती जा रही थी। परंतु ब्रम्‍हचर्य की साधना करने वाले गांधी के पास अद्भूत ताकत आ गयी थी ब्रम्‍हचर्य प्रतिष्‍ठायां  वीर्यलाभ:। अन्‍तत: शांति-स्‍थापना के साथ ही उनका उपवास टूटा। बापू बच गये। लोग प्रफुल्लित थे। पर बापू नहीं क्‍योंकि 'बचना सबको अच्‍छा लगता है, इसलिए बच जाते है तो ईश्‍वर का उपकार मानते हैं। किंतु सच पूछा जाये तो हर हालत में और हर समय उसका एहसान ही मानना चाहिए। इसी का नाम समत्‍व है।' और गांधी तो पचास वर्षों से इसी समत्‍व की साधना कर रहे थे। वे तो तुलसी के 'हानि-लाभ जीवन-मरन यश-अपयश विधि हाथ- मूलमंत्र को हृदयंगम कर चुके थे। इसलिए उन्‍हें मृत्‍यु से किसी प्रकार का भय नहीं था।उन्‍हें तो मृत्‍यु में शांति की दरकार थी। गांधी ने मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा की थी। वे जानते थे कि मोक्ष हेतु कर्म का सर्वथा क्षय होना भी आवश्‍यक है। अत: इस नश्‍वर शरीर का त्याग भी जरुरी है। उन्‍होंने कहा भी 'किसी-न किसी बहाने उन्‍हें पुराना मंदिर छोड़ना पडे़गा। फिर इच्‍छा हो तो नये मंदिर में जा बसें या यदि यह पिंजड़ा एकदम छोड़ना ही पडे़ तो वायु में वास करें और स्‍वतन्‍त्रता का सुख लूटें।'
जैसे-जैसे गांधी का अंतिम समय नजदीक आता जा रहा था, वे लोगों को संकेत करते जा रहे थे। मृत्‍यु से ठीक दो महीने पहले 'हरिजन' में उन्‍होंने लिखा, 'जब समय अयेगा-जिसकी कल्‍पना की जा सकती है- तो मैं अपना परामर्श सुस्‍पष्‍ट शब्‍दों में लिखकर छोड़ जाउंगा, किसी को उसका अनुमान लगाने की आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी।' और,उन्‍होंने एक पत्रकार के यह पूछने पर कि 'आपका संदेश क्‍या है? 'एक कागज पर स्‍पष्‍ट शब्‍दों में गांधी ने लिखकर दिया : 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।' परामर्श उन्‍होंने दे दिया। यह परामर्श (अथवा संदेश) सार्वकालिक और सार्वजनीन है। इस संदेश में ऋषियों की वाणी सन्निहित है। इससे संतों की जीवन-दृष्टि समझी जा सकती है। वह जीने की कला है। इस संदेश में सर्वोदय की अभीप्सा है। परंतु गांधी का थोड़ा-सा कार्य अभी भी शेष था- संगठन के ढांचा का प्रारुप। जिस कांग्रस को उन्‍होंने 'कुछ मुट्ठीभर जन' से जन-मानस तक पहुंचाया था उसके लिए भी परामर्श देना था। वक्‍त कम था। उधर अंतिम वेला भी सन्निकट थी। गांधी ने कभी कहा था कि 'सच्‍ची मित्रता में मिलने यहां तक कि पत्र-व्‍यवहार की भी कोई जरुरत नहीं होती। उन्‍होंने मृत्‍यु को सदा मित्र ही माना था। अत: एक सच्‍चे मित्र की भांति मृत्‍यु ने उन्‍हें अपना मूक संदेश भेज दिया था। इसीलिए वे जल्‍दी-जल्‍दी सब काम निपटा रहे थे।
               26 जनवरी 1948! मुलाकातियों का दौर जारी। सभी कार्य प्रतिदिन की भांति सुचारु रुप से किये जा रहे थे। दूसरों को क्‍या पता कि गांधी के मन में क्‍या चल रहा है। वे तो उन्‍हें रोज की ही भांति देख व सुन रहे थे। पर गांधी को तो जल्‍दी थी। कांग्रेस का मसौदा अभी भी पूरा नहीं हो पाया था। उन्‍होंने लिखा, 'मेरा सिर चकरा रहा है, फिर भी मुझे पूरा करना ही होगा। - मुझे भय है कि आज मुझे देर रात जागना होगा।' रात को जब वे सोने के लिए गये तो उन्‍होंने अपने सिर पर तेल मालिश करने वाले व्‍यक्ति से कहा, 'याद रखो कि अगर कोई आदमी गोली मार कर मेरे प्राण ले ले .... और मैं कराहे बिना उस गोली का सामना करूं  और राम नाम लेते हुए मेरे प्राण निकल जाये तो ही मेरा दावा सच्‍चा साबित होगा। दावा था सत्‍य के साक्षात्‍कार का । क्‍योंकि गांधी के दृष्टि में 'सच्‍ची बात का पता तो मरते समय ही लगता है।' ठीक ऐसी ही बात गांधी ने 28 जनवरी को राजकुमार अमृत कौर से कही थी। मृत्‍यु से दो दिन पहले की बात है यह। गांधी ने अपने मृत्‍यु के तरीके और व्‍यक्ति को बतला दिया। परंतु 'आवरण के कारण बुद्धि  बेचारी का बस नहीं चलता।'अत: लोग  उनके संकेत को नहीं समझ पाये।
               30 जनवरी 1948! रोज की भांति गांधी सुबह 3.30 बजे उठ गये। प्रार्थना के बाद रात का बचा काम पूरा किया। फिर अपने दैनिक कार्य में व्‍यस्‍त। सुबह के एक पत्र में गांधी पुन: लिखते हैं:'मृत्‍यु हमारा सच्‍चा मित्र है। आत्‍मा कल भी थी आज भी है और कल भी रहेगी।....' वे सुबह की सैर के लिए न जा सके। अत: कमरे में ही टहलने लगे। मनु बहन उनके साथ नहीं थी। वह चूर्ण तैयार करने में लगी थी। गांधी ने मनु बहन को संकेत किया: 'कौन जानता है रात पड़ने से पहले क्‍या होगा अथवा मैं जीता भी रहूंगा  कि नहीं। टहलने के पश्‍चात् फिर से लोगों से मुलाकात में व्‍यस्‍त। लोगों की समस्याओं को सुन रहे थे, उसका निराकरण कर रहे थे। तीसरे पहर जब कुछ मौलाना बंधु उनसे निवेदन करने आये कि शायद गांधी सेवाग्रम से 14 फरवरी तक दिल्‍ली लौट सकेंगे। गांधी ने कहा, 'मुझे आशा  तो जरुर है। परंतु मुझे भरोसा नहीं कि मैं परसों भी दिल्‍ली छोड़ सकूंगा।' वक्‍त के प्रति अत्‍यन्‍त पाबंद गांधी ऐसा क्‍यों कह रहे थे, लोग समझ नहीं पाये। इतना ही नहीं, पत्रकारों के यह पूछने पर कि अखबारों में खबर है कि आप एक फरवरी को सेवाग्राम जानेवाले हैं ? गांधी ने कहा,'हां अखबारों ने तो घोषणा की है।..... लेकिन मैं नहीं जानता कि वह गांधी कौन है?
               वक्‍त तेजी से गुजर रहा था। गांधी लगभग सारे कार्यों को अंजाम दे चुके थे। उन्‍हें अपने मित्र (मृत्‍यु) की पदचाप स्‍पष्‍ट सुनायी दे रही थी। फिर भी वे शांत थे -'हममें श्रध्‍दा तो होनी ही चाहिए कि हम समझ लें कि जीवन को ठीक ढंग से बिताने के बाद आने वाली मृत्‍यु पहले से अच्‍छे और अधिक समृध्‍द जीवन का आरंभ होती है।'सरदार पटेल और नेहरु के बीच कुछ मतभिन्‍नता थी। उसी संदर्भ में पटेल गांधी से बात करने आये थे। बातचीत कुछ लंबी चली। प्रार्थना में दस मिनट  देर हो चुकी थी। प्रार्थना में किसी तरह का देर गांधी को पसंद नहीं था -'प्रार्थना आत्‍मा का आहार होती है। अत: उसमें किसी भी तरह का देर नहीं होना चाहिए।' मनु बहन ने उनका ध्‍यान घड़ी की तरफ दिलाया।गांधी ने पटेल से विदा ली और अपने कदम फुर्ती से प्रार्थना स्‍थल की तरफ  बढ़ा दिया। रास्‍ते में ही उनसे किसी ने कहा कि कठियावाड़ से आये दो कार्यकर्ता मुलाकात का समय मांग रहे है। गांधी ने अपने समानान्‍तर अपने अतुलनीय मित्र 'मृत्‍यु' को चलते देखा।उन्‍होंने कहला भेजा-उनसे कह दो कि प्रार्थना के बाद आ जायें। मै जीवित रहा तो उनसे उस समय मिलूंगा। इसके बाद गांधी स्‍वभावानुकूल मौन हो गये।प्रार्थना स्‍थल में पहुँचने के बाद यही नियम था। ............... और जब गांधी के होंठ खुले तो उनके मुंह से शांत और मंद स्‍वर में 'राम-रा..... म' शब्‍द निकले । 

Monday, December 1, 2014

विवेकानंद और गांधी : अध्यात्म और राजनीति का विरल संयोग
                                                                                
भारतीय आर्ष-चिंतन ऋषि-प्रसूत है । यही कारण  है कि इस देश में  हमेशा से ही ऋषियों/ संतों को सुना-गुना गया है। जब-2 इस देश पर संकट आया है भारतीय मनीषा ने अपने चिंतन से न केवल उसे समृद्ध किया बल्कि अभय होने में भी मदद की है। 19 वीं सदी भारत के लिए कई मायनों मे महत्वपूर्ण है । इस समय भारत पर एक खास किस्म का संकट था। भारतीय अस्मिता (व्यक्तित्व ) नदी में डूबते बच्चे की भांति अपनी अंतिम सांस ले रही थी। चारो तरफ गहरी हताशा छायी हुई थी। भारत जो कभी अपनी स्पंदनमान संस्कृति(vibrant culture) और धनी सभ्यता (Reach culture) के  कारण विश्वगुरु कहा जाता था, अपनी चमक खो चुका था । अब वह दया का पात्र बन चुका था ।  कभी वेद-उपनिषद और तर्क शास्त्र पर भरोसा  रखने वाला भारत अंधविश्वासों,रूढियों,जातियों,प्रतिबंधों,मुझे मत छूओ आदि  के भँवर में फंस चुका था ।  ईसाई मिशनरियाँ अपने खतरनाक इरादों के साथ भारतीय आकाश पर गिद्धों की भांति मंडरा रहीं थी। भारत विश्व-अदालत में अपना मुकदमा लगातार हारता जा रहा था। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था उसका  आत्मविश्वास का खोना । ठीक  ऐसे समय पर उसके त्राण के लिए विश्व-अदालत में चार वकील उसका पक्ष रखने के लिए सामने आते हैं-विवेकानंद,रवीन्द्रनाथ,आनंद कुमारास्वामी और गांधी । पहले ने उसकी दार्शनिक महिमा को सामने रखा,दूसरे ने साहित्यिक महिमा को,तीसरे ने कलात्मक गरिमा को और चौथे ने भारत की आत्मा को।(पत्रमणिपुतुल के नाम:कुबेरनाथ राय,पृ. 34)अर्थात इन चारों ने मिलकर न  केवल भारतीय अस्मिता की रक्षा की अपितु उसे ऊंचे धरातल पर प्रतिष्ठित भी किया । परिणामत: भारत की एक बार पुन: धाक जमनी शुरू हुई ।
वर्ष 1893 भारतीय इतिहास का अद्भुत पन्ना है। अगर हम इसे पलटें तो हमें आश्चर्यजनक घटनाएँ दिखती हैं। एक तरफ  विवेकानंद ने शिकागो में अपना परचम लहराते हैं तो दूसरी तरफ एक 24 वर्षीय युवक समुद्री जहाज पर रोजी-रोटी की तलाश में समुद्र की अनंत दूरी को अपने में समेटने का प्रयास कर रहा था । एनी बिसेंट भारत पर मुग्ध होकर यहीं की होने आई  तो  अरविंदो  अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी कर अपने देश लौट आए । महान पुरुषों की यह विशेषता होती है कि वे प्राय:अपने जीवन के आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान प्राप्त होने पर ही जीवन के अन्य क्षेत्रों में पदार्पण करते हैं। ईसा ने शत्रु पर भी प्रेम की बात कही । बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त होने पर मैत्री और करुणा की बात कही । गांधी ने अंतरात्मा की आवाज की बात कही और  विवेकानंद ने गुरु के अंतरंग वृत्त में प्रवेश करने के बाद अपनी बात सुनाई ।
विवेकानंद और गांधी के व्यक्तित्व में बड़ा मजेदार साम्य है। एक सन्यासी-योद्धा था तो दूसरा योद्धा-सन्यासी । एक राजसी व्यक्तित्व और ओजस्वी वक्तृता का धनी था जिसने दुनिया के समक्ष वेदान्त का परचम लहराया  तो  दूसरे  अधनंगे फकीर ने अपनी  शांत और निभृत आवाज के द्वारा एक अद्भुत सिद्धांत सत्याग्रह का आविष्कार किया और भारत को मुक्ति का रास्ता दिखाया । एक को दुनिया ने स्वामी नाम से पुकारा  तो दूसरे को बापू-महात्मा के नाम से ।
 दोनों मनीषियों का जन्म 19वीं सदी के छठे दशक में हुआ था । नरेन का जन्म एक उच्च शिक्षित शैव परिवार में हुआ था । पिता उच्च न्यायालय में कार्यरत थे। माता भी पढ़ी लिखी परंतु  धार्मिक महिला थीं। नरेन पर माता का प्रभाव ज्यादा पड़ा । माता ने शिव का मंत्र भी दिया । मजबूत कद-काठी के धनी नरेन को संगीत,अध्यात्म,विज्ञान,खेल-कूद आदि विषयो में गहरी रुचि थी । वे किशोरावस्था मे ही परिव्राजक सन्यासी बनने का सपना देखने लगे थे। दूसरी तरफ छह वर्ष छोटे मोहन को इन विषयों में कोई खास रुचि नहीं थी। पिता पढे लिखे  जरूर थे। माता धार्मिक महिला थीं । धाय माँ ने इन्हे राम का मंत्र दिया था । शरीर से दुबले-पतले मोहन स्कूल से मौका मिलते ही घर की तरफ दौड़ जाते थे। किसी खास विषय में रुचि कभी पैदा नहीं हुई। परीक्षा पास करना इनके लिए सदैव दु:साध्य कार्य बना रहा। पर पिता की ईमानदारी,निष्ठा आदि ने इन पर गहरा प्रभाव डाला । नरेन और मोहन दोनों माँ के निकट अधिक रहे । इनका प्रभाव भी  इन पर अधिक पड़ा । दोनों ने इसे मुक्तकंठ से स्वीकार भी किया है ।
19 वीं सदी में भारत की दुर्दशा को दोनों गहराई से महसूस कर रहे थे । वे अनुभव कर रहे थे कि सामाजिक,नैतिक और धार्मिक तीनों स्तर पर भारत अपने एकमात्र पैर पर बस खड़ा भर रह गया है। समाज में घोर अंधविश्वास,छूआछूत, जातीय विषमता आदि बुराई घर कर गई थी । यह ठीक है कि इनके पूर्व राजाराम आदि लोगों ने एक अलख जगाने की कोशिश की थी। पर वे पश्चिम से इतने आक्रांत थे कि अपनी ही जड़ों को भूल गए थे । पर स्वामी-महात्मा तो एक दूसरी ही मिट्टी के बने थे। प्रारम्भ में ये दोनों भी पश्चिम से अभिभूत हुए थे पर जल्दी ही ये उससे मुक्त हुए- समस्त पाश्चात्य जगत एक ज्वालामुखी पर बैठा है जो कल फूट सकता है और कल उसके टुकड़े-2 हो सकते हैं।  ...यदि आध्यात्मिक आधार नहीं बनाया गया तो समस्त यूरोपीय सभ्यता अगले पचास वर्ष में ध्वंस होकर चूर-2 हो जाएगी।(आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 116) गांधी ने भी लिखा वह सभ्यता नुकसान देह है और उससे यूरोप की प्रजा पामाल होती जा रही है। इस सभ्यता की सच्ची पहचान तो यही है कि इसमें मनुष्य वाह्य खोजों में और शरीर के सुख में धन्यता सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं-... शरीर सुख कैसे मिले यही आज की सभ्यता ढूंढती है, और यही देने की वह कोशिश करती है। परन्तु वह सुख भी उन्हें नहीं मिल पाता।(हिन्द स्वराज ) हाँ उनकी अच्छाइयों को स्वीकार करने में तनिक हिचक भी नहीं  दिखलाई। पर जो कुछ किया संग्रह-त्याग के विवेक के साथ। अपनी कमियों को हिमालयन-ब्लंडरकहने में कोई झिझक भी नहीं  हुई।  लालकिले से पालम तक सिमट चुके मुगल सल्तनत की भांति धर्म भी  मुझे मत छूओ तक ही सिमट चुका था। विवेकानंद ने इस पर गंभीर प्रहार किया और कहा-भारत के विनाश पर उसी दिन मुहर लग गई जिस दिन हमने म्लेच्छ शब्द का आविष्कार किया और दूसरों से संपर्क तोड़ लिया ।(आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 116)  विवेकानंद ने छूआछूत को एक बुराई के रूप में स्वीकार किया तो गांधी ने अश्पृश्यताको एक आंदोलन में ही बदल दिया।
दोनों के मन में भारत के प्रति असीम प्यार था-निस्संदेह मुझे भारत से प्यार है,पर प्रत्येक दिन मेरी दृष्टि अधिक निर्मल होती जाती है। .......हम तो उस ईश्वर के सेवक हैं जिसे अज्ञानी मनुष्य कहते हैं।(आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 112)  अफ्रीका से लौटते समय गांधी ने कहा – अब मैं कर्मभूमि से देवभूमि की तरफ लौट रहा हूँ। 
विवेकानंद ने एक बार अपने गुरु से निर्विकल्प  समाधि के अनुभव की बात कही। गुरु ने उन्हें झिड़कते हुए कहा-तुम्हें लज्जा नहीं आती। मेरे तो इच्छा थी कि तुम एक महान वृक्ष के समान बढ़ोगे। किन्तु मैं देखता हूँ कि तुम केवल अपनी ही मुक्ति के इच्छुक हो।(जीवन सत्य शोधनम:शिवकरन सिंह(अप्रकाशित)) गुरु-इच्छा की पूर्ति विवेकानंद ने पूरी भी की । विवेकानंद ने लिखा-मैंने तपस्या करके यही सार समझा है कि जीव जीव में वे अधिष्ठित है ;इसके अतिरिक्त ईश्वर कुछ भी नहीं है। जो जीवों के प्रति दया करता है,वही व्यक्ति ईश्वर की सेवा कर रहा है।(आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 111)  इसमे कोई संदेह नहीं है कि विवेकानंद द्वरा शुरू किए गए प्रयास  को ही पूर्णता प्रदान करने के लिए गांधी ने जन्म लिया था। उन्होने स्पष्ट शब्दों में घोषित किया था-मैं मानव जाति की सेवा द्वारा ईश्वर दर्शन का प्रयत्न कर रहा हूँ,क्योंकि मैं  जानता हूँ कि ईश्वर न तो ऊपर स्वर्ग में है न नीचे किसी पाताल में। वह तो हर एक के हृदय में विराजमान है।(महात्मा गांधी की धर्मदृष्टि :मनोज कुमार राय पृ. 115)
 वस्तुत:विवेकानंद ने हिन्दुत्व  के उन मूलभूत तथ्यों  पर बल दिया था जिनका प्रतिपादन  वेदान्त/उपनिषद ने मनुष्य की अंतर्निहित  दिव्यता-भव्यता-एकता को बढ़ावा देने के लिए किया था।  सत्य-शांति-सामंजस्य मनुष्य का ध्येय होना चाहिए । संभव है कि  रास्ते अलग-2 हों । वे कहते हैं-सब-कुछ एक है। कोई अंतराय नहीं है,एकता ही नियम है। .....जीवन एक तरंग मात्र है। जो ईश्वर को तरंगित करता है वही तुम्हें भी तरंगित करता है।(आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 101)   गांधी के मन में भी हिन्दू धर्म के लिए असीम श्रद्धा थी। पर यह अंधश्रद्धा नहीं थी। परंपरा उनके लिए बंदरिया का मृत शिशु न होकर देशज खाद की तरह थी जिस पर  भविष्य के रंग -बिरंगे फूल लहलहायेंगे। उन्होने जाति-प्रथा,कर्मकांड,अंधविश्वास आदि को सिरे से ही खारिज कर दिया।  दोनों ने अपने धर्म पर न केवल  पुनर्चिंतन किया अपितु इसे युगधर्म के समनुरूप बनाने  की कोशिश की।  किसी ने गांधी से पूछा कि उनका धर्म क्या है? उन्होने कहा-मेरा धर्म हिन्दू धर्म है जो मानवता का धर्म है और मेरे लेखे इसमे सभी धर्मो का समावेश हो जाता है। गांधी के लिए धर्म और नैतिकता एक दूसरे के पर्याय हैं। मैं  हिन्दू क्यो हूँ  का जबाब देते हुए गांधी ने कहा- मैंने इसे सबसे सहिष्णु पाया है। उसमे सैद्धांतिक कट्टरता नहीं है...इसके कारण इसके अनुयायी को आत्माभिव्यक्ति का अधिक से आधी अवसर मिलता है यह वर्जन शील नहीं है। अत: इसके अनुयायी न सिर्फ दूसरे धर्मो का आदर करते है,बल्कि सभी धर्मो की अच्छी बातों को पसंद कराते अहि । अहिंसा सभी धर्मो में है, मगर हिन्दू धर्म में इसकी उच्चतम अभिवक्ती हुई है। हिन्दू धर्म न सिर्फ मनुष्यो की अककतमकता में विश्वास करता है बल्कि सभी जीवधारियों की एकात्मकता मे विश्वास करता है। (महात्मा गांधी की धर्मदृष्टि :मनोज कुमार राय पृ. 115)  
प्रथम द्रष्टया तो देखने में लगता है कि दोनों अलग-2 मंच पर खड़े हैं। एक गेरुआ वस्त्र पहनकर शिकागो में वेदान्त के सूक्ष्म सिद्धांतों पर बात कर रहा है जो विशुद्ध धार्मिक है । तो दूसरी तरफ धवल भगई लपेटे सत्य-अहिंसा-कष्ट-सहन पर आधारित सत्याग्रह की आवाज बुलंद करता है जो पूर्णत:राजनीति का विषय है। स्वराज गांधी के लिए सिर्फ पराधीनता से मुक्ति का ही मार्ग नहीं था। अपितु यह असली रूप में आत्मानुशासन ही है जिसके जरिये वे सर्वविभु का साक्षात्कार करना चाहते थे। वे लिखते हैं-जिसे मैं प्राप्त करना चाहता हूँ वह आत्मसाक्षात्कार है....मेरा जीना भ्रमण करना ....या मेरे राजनीतिक जीवन के जो भी कार्य रहे हैं, उनके केंद्र में यही प्रयत्न निहित हैं। .....मेरी  राष्ट्र की सेवा भी मेरे आत्मा को मनोविकारों से मुक्त करने की शिक्षा का एक माध्यम है।  (महात्मा गांधी की धर्मदृष्टि :मनोज कुमार राय पृ. 114)  
 विवेकानंद राजनीति से परहेज करते थे। उन्होने साफ तौर पर कहा –मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूँ न ही राजनीतिक कार्यकर्ता । मुझे  केवल  स्पिरिट की परवाह है। ........मेरे लेखन अथवा भाषण से कोई राजनीतिक निष्कर्ष न निकाला जाय।(27 सित1894 को बोस्टन में दिया गया भाषण) इसके पीछे उनका क्या तर्क है,इस पर कभी उन्होने कुछ कहा नहीं। अत: हम सिर्फ यह कह सकते हैं कि इस तेजस्वी स्वामी ने अपने लिए देश-काल-परिस्थिति को ध्यान में रखकर एक लक्ष्मण रेखा खींच रखा था। हालांकि उन्होने एक अवसर पर कहा था- संसार में डूबकर कर्म का रहस्य सीखो। संसार-यंत्र के पहियों से भागो मत। उसके भीतर खड़े होकर देखो वह कैसे चलता है। (आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ. 101)  और गांधी उनके इसी कथन को शिरोधार्य  करते हुए राजनीति में सदेह घुसकर उसके साँड-भैंसोंसे दो-दो हाथ किया।
भगवान बुद्ध ने किसी राजा से  कहा था –यदि किसी निरीह पशु के होम करने से तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है तो मनुष्य के होम से और किसी उच्च फल की प्राप्ति होगी। राजन उस पशु के पाश को काटकर मेरी आहुति  दे दो ,शायद तुम्हारा अधिक कल्याण हो सके। विवेकानंद और गांधी  दोनों के सामने The dumb  Indian masses’ का करुण चेहरा सदैव भासता रहता था। उन्होने देखा कि भारतीय आबादी सचमुच में एक गूंगी भीड़ मे बदल चुकी है। वह देश जो कभी अपनी सांस्कृतिक संपदा,अपनी परंपरा-शक्ति,ग्रहणशीलता और उसमे निहित आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए जाना जाता है वह सामाजिक पिछड़ापन,गरीबी,अंधविश्वास और मानसिक जड़ता का शिकार हो चुका था।  उसे फिर से सक्रिय-तेजस्वी,गर्व से चलने लायक बनाने के लिए उनकी नसों में सिर्फ पांचजन्य  प्राण फूकने की जरूरत  है।  विवेकानंद ने कहा –उठो,जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रूको। जड़ता और भेद को दूर करने के लिए विवेकानंद और गांधी ने अथक प्रयास किया। गांधी एक कदम और आगे बढ़े- सारे देश के सामने एक ऐसी राष्ट्रीय उपासना होनी चाहिए जिसे देश का एक-2 बालक भी कर सके। धार्मिक और पांथिक उपासनाएं तो  हैं ।  लेकिन उनसे भेद पैदा होता है। देश में एक अभेद  उत्पन्न करने वाली उपासना चाहिए। सबको लगे कि मैं देश के लिए  कुछ कर रहा हूँ।  गजब का विचार है । कहाँ से चले थे और  कहाँ  आ गए- गांधी के मैजिक बैंड से मैं देश के लिए  कुछ कर रहा हूँ ,की धुन निकल रही है और यहाँ मैं अपने लिए कर रहा हूँ,अपने परिवार के लिए कर रहा  हूँकी मुनादी हो रही है।किसी ने कभी गांधी को हिमालय जाने की सलाह दे डाली। बापू ने कहा –मेरी तपस्या  का हिमालय वहीं है जहां अभी दरिद्रता पड़ी है। मुझे उसे मिटाना है, शोषण दूर करना है,दुख निवारण करना ही। देश मे एक भी आदमी जब तक जीवन की आवश्यकाताओं से वंचित है तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी और मैं पाँव सिकोडकर नहीं बैठूँगा।   (महात्मा गांधी की धर्मदृष्टि :मनोज कुमार राय पृ. 117) विवेकानंद ने भी निर्भ्रांत शब्दों में कहा – मैं समाधि जैसे देश में नहीं  रहना चाहता। मैं मनुष्यों की दुनिया में एक मनुष्य बन कर रहना चाहता हूँ।  (आधुनिक भारतीय चिंतन : नरवड़े पृ.99) । मैं ऐसे ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो स्वर्ग में तो मुझे अनंत आनंद देगा, पर इस जगत में मुझे रोटी भी नहीं दे सकता का उद्घोष करने वाले विवेकानंद हों अथवा आत्मसाक्षात्कार चेतन जगत की निष्काम और शुद्ध सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैको जीवन का लक्ष्य मानने वाले गांधी हों , दोनों के लिए सेवा ही सर्वोपरि है। तुलसी ने भी कहा है-सिर भर जाऊँ उचित अस मोरा। सबतें सेवक धरम कठोरा॥। धर्म इनके जीवन का केंद्रीय तत्व था। पर यह अपने उदात्त रूप में था-‘.....वह हाँ या ना की तिजोरी नहीं है,विधि-निषेध का भंडार नहीं है। जो धर्म का,अहिंसा का,नीति का पालन करना चाहता है उसे तलवार की धार पर चलाना । धर्मपालन ऐसी कुछ सही सलामत वस्तु नहीं । यह तो अनुभवों की खान में दबा हुआ रत्न है। उसे करोड़ो जीवों में ,कोई कोई ही खोज लाते हैं। जो सही सलामती रूक्का मांगता है उसके लिए धर्म नहीं है।   (महात्मा गांधी की धर्मदृष्टि :मनोज कुमार राय पृ. 71)
कह सकते हैं कि योद्धा- संन्यासी को  उनके धर्म का मार्ग मिल गया था। वे उस पर चले । धर्म के साथ दोनों की मुठभेड़ भी हुई। पर यह मुठभेड़ दुर्घटना नहीं एक दूसरे को जानने-समझने का सायास प्रयास था । धर्म ने इनको  रूपांतरित किया और इन दोनों ने धर्म के धूल-धक्कड़ को झाड़कर उसे वर्तमान काल की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाया । महाकवि टैगोर ने भी कहा है -
भजन,पूजन,साधना ,आराधना सब छोड़ दो ।
वह वहाँ है जहां कठोर धरती पर किसान खेती करता है ।  
उन्हीं की भांति पवित्र वस्त्र त्याग कर धूल मे आ जाओ ।
पसीने से लथपथ कर्म में उनसे मिलो और एक हो जाओ ।   

आज जरूरत है इन सन्यासी-योद्धा के कर्म-वचन से  नि:सृत संदेश को अपने जीवन में उतारने की ।  और यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी । क्या हम ऐसा कर पायेंगे ?